टैक्स समय पर जमा, फिर ब्याज क्यों? GST पोर्टल की व्यवस्था पर कर संगठनों ने उठाए सवाल
कमिश्नर की टेबल तक पहुंचा पोर्टल का विवाद
जीएसटी काउंसिल की आगामी बैठक से पहले मध्य प्रदेश के कर विशेषज्ञों ने पोर्टल (GST Portal) की कार्यप्रणाली को लेकर अपनी आपत्तियां सामने रखी हैं। एमपी टैक्स लॉ बार एसोसिएशन (MPTLB) और कमर्शियल टैक्स प्रैक्टिशनर्स एसोसिएशन (CTPA) ने GST कमिश्नर को बाकायदा ज्ञापन सौंपकर पोर्टल में तकनीकी बदलाव की मांग की है।
इस ज्ञापन की अहम बात यह है कि विवाद टैक्स चोरी या टैक्स नहीं चुकाने को लेकर नहीं, बल्कि टैक्स जमा होने के बावजूद कुछ परिस्थितियों में सिस्टम द्वारा ब्याज की गणना किए जाने के आरोप से जुड़ा है।
टैक्स जमा है तो सुधार पर ब्याज क्यों?
एसोसिएशन का कहना है कि कई बार करदाता निर्धारित समय पर टैक्स चुका देता है, लेकिन रिटर्न भरते समय किसी शब्द, विवरण या दूसरी जानकारी की एंट्री गलत हो जाती है। जब बाद में उस जानकारी को ठीक किया जाता है, तो पोर्टल कुछ मामलों में उसे कर देयता में देरी से जोड़कर ब्याज की मांग प्रदर्शित कर सकता है।
यहीं कर विशेषज्ञ व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि “टैक्स देर से जमा करना” और “पहले से जमा टैक्स से जुड़े रिटर्न की जानकारी सुधारना” दो अलग परिस्थितियां हैं। अगर दोनों को एक जैसी तकनीकी प्रक्रिया से देखा जाएगा, तो विवाद पैदा होना स्वाभाविक है।
ITC मौजूद, फिर भी ब्याज का सवाल
ज्ञापन में दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा इनपुट टैक्स क्रेडिट यानी ITC से जुड़ा है। कर विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ मामलों में संबंधित अवधि के दौरान करदाता के इलेक्ट्रॉनिक क्रेडिट लेजर में पर्याप्त ITC उपलब्ध रहता है। बाद में सामने आई कर देयता का समायोजन उसी उपलब्ध क्रेडिट से संभव होता है।
एसोसिएशन का पक्ष है कि ऐसी परिस्थितियों में, जहां पर्याप्त क्रेडिट पहले से उपलब्ध था, ब्याज की गणना करते समय इस तथ्य को ध्यान में रखा जाना चाहिए। विशेषज्ञों ने धारा 50 के तहत ब्याज की गणना को लेकर भी यही मुद्दा उठाया है। उनका तर्क है कि उपलब्ध ITC की सीमा तक वास्तविक आर्थिक प्रभाव और ब्याज देयता का परीक्षण अलग तरीके से होना चाहिए।
हालांकि ब्याज की कानूनी देयता हर मामले के तथ्यों, रिटर्न, भुगतान की प्रकृति और लागू GST प्रावधानों पर निर्भर कर सकती है। इसलिए एसोसिएशन की मांग को स्वतः अंतिम कानूनी निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
आठ साल बाद भी सिस्टम अंतर क्यों नहीं पहचान रहा?
यही इस पूरे मामले की सबसे अहम बात है। जीएसटी पोर्टल सिर्फ रिटर्न भरने की जगह नहीं है। टैक्स कितना बनता है, कितना क्रेडिट है और कितना भुगतान (Tax Payment) हुआ, ये सब इसी सिस्टम से जुड़ा है।
अब सवाल यह है कि पोर्टल टैक्स देर से जमा करने और सिर्फ रिटर्न की जानकारी सुधारने के बीच साफ फर्क क्यों नहीं कर पा रहा। MPTLB और CTPA भी यही मांग कर रहे हैं कि दोनों स्थितियों को अलग-अलग तरीके से देखा जाए।
अश्विन लखोटिया ने क्या कहा?
टैक्स लॉ बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अश्विन लखोटिया का कहना है कि कर व्यवस्था में वास्तविक कर देयता और उसके भुगतान को प्राथमिकता से देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक केवल रिटर्न में हुई शाब्दिक गलती को टैक्स भुगतान में हुई देरी के बराबर मानना उचित नहीं है।
यानी एसोसिएशन चाहता है कि पोर्टल का सिस्टम यह पहचान सके कि मामला वास्तव में सरकार को टैक्स देर से मिलने का है या सिर्फ पहले दाखिल रिटर्न की जानकारी ठीक करने का।
अब नजर GST प्रशासन के अगले कदम पर
ज्ञापन के बाद बड़ा सवाल यह है कि क्या पोर्टल में ऐसा तकनीकी बदलाव संभव होगा, जिससे अलग-अलग परिस्थितियों में ब्याज की गणना अधिक सटीक तरीके से हो सके। अगर एसोसिएशन की मांग स्वीकार होती है, तो इससे वास्तविक त्रुटि सुधार वाले मामलों में करदाताओं को राहत मिल सकती है और ब्याज को लेकर पैदा होने वाले विवाद भी कम हो सकते हैं।
लेकिन फिलहाल यह एसोसिएशनों की मांग और कानूनी-तकनीकी आपत्ति है। पोर्टल की व्यवस्था में बदलाव या ब्याज से राहत को अंतिम निर्णय मानना उचित नहीं होगा। GST के आठ साल बाद भी अगर पोर्टल टैक्स भुगतान में वास्तविक देरी और केवल रिटर्न सुधार के बीच फर्क नहीं कर पा रहा है, तो तकनीकी गलती की आर्थिक कीमत करदाता क्यों चुकाए?