ग्वालियर में तैयार होता है असली खादी तिरंगा, जानें मध्यभारत खादी संघ का इतिहास

Manya Jain | Aug 14, 2026, 14:45 IST
gwalior khadi tiranga red fort journey
ग्वालियर का मध्यभारत खादी संघ 1930 से तिरंगा बना रहा है। गांधीजी के आंदोलन से प्रेरित इस संस्था का बना ध्वज लाल किले पर फहरा चुका है और अब 18 राज्यों में जाता है।

समझें क्या है पूरा मामला

  • ग्वालियर की मध्य भारत खादी संघ संस्था 1930 से तिरंगा बना रही है।
  • यह संस्था गांधीजी के चरखा आंदोलन से प्रेरित होकर शुरू हुई थी।
  • 2016 में इसे मानक तिरंगा बनाने की मंजूरी मिली।
  • यहां बना तिरंगा लाल किले पर भी फहराया जा चुका है।
  • अब यह तिरंगा देश के करीब 18 राज्यों में भेजा जा रहा है।

चरखा आंदोलन से शुरू हुई यात्रा

मध्य भारत खादी संघ की शुरुआत 1930 में हुई थी। यह गांधीजी के चरखा आंदोलन और स्वदेशी भावना से प्रेरित थी। संस्था का मकसद खादी और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना था। इसी दौर में यहां कपड़े और झंडे बनने लगे।



बाबू तख्तमल जैन का इस संस्था की नींव में बड़ा योगदान माना जाता है। वे मध्यभारत के पहले मुख्यमंत्री भी रहे थे। शुरुआत से ही यहां खादी और स्वदेशी उत्पादों पर काम होता रहा।



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2016 में मिली राष्ट्रीय ध्वज बनाने की मंजूरी

संस्था के अध्यक्ष वासुदेव शर्मा के मुताबिक राष्ट्रीय ध्वज को निर्धारित मानकों के अनुरूप बनाने के लिए पहले भी प्रयास हुए, लेकिन अनुमति नहीं मिल सकी। कई सालों की कोशिश के बाद आखिरकार 2016 में मंजूरी मिली। इसके बाद पहला मानक तिरंगा तैयार हुआ और लाल किले पर फहराया गया।



इसके बाद से ग्वालियर के बने झंडे कई बड़ी इमारतों पर लगते रहे हैं। सचिवालय और हाईकोर्ट जैसी जगहों पर भी यहां का तिरंगा इस्तेमाल हो चुका है।



राष्ट्रीय पर्वों पर करोड़ों का कारोबार

शुरुआती दौर में संस्था का कारोबार सीमित था। पहले यह करीब 15 से 20 लाख रुपए तक होता था। अब स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस मिलाकर यह आंकड़ा एक करोड़ रुपए से ज्यादा पहुंच जाता है। इस साल अब तक करीब 60 लाख रुपए के तिरंगे बिक चुके हैं।



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अब 18 राज्यों तक पहुंच रहा तिरंगा

ग्वालियर में बना तिरंगा अब मध्यप्रदेश के अलावा करीब 18 राज्यों में भेजा जा रहा है। इस बार स्वतंत्रता दिवस पर संस्था को 70 से 80 ऑर्डर मिले हैं। त्योहार नजदीक होने से समय पर सप्लाई पूरी करना बड़ी चुनौती बन गया है।



संस्था के मुताबिक इस बार मांग पिछले साल से ज्यादा है। हर घर तिरंगा जैसे अभियानों ने भी लोगों में झंडे के प्रति रुचि बढ़ाई है।



86 साल का सफर, आज भी जारी

चरखे से शुरू हुआ यह सफर आज अशोक चक्र वाले मानक तिरंगे तक पहुंच चुका है। जब ग्वालियर का बना तिरंगा लाल किले पर लहराता है, तो शहर की पहचान भी पूरे देश तक पहुंचती है। यह कहानी सिर्फ एक झंडे की नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और लगन की भी है।



एक्सपर्ट कोट्स

वासुदेव शर्मा, अध्यक्ष, मध्य भारत खादी संघ


राष्ट्रीय ध्वज को निर्धारित मानकों के अनुसार बनाने के लिए पहले भी प्रयास हुए, लेकिन अनुमति नहीं मिल सकी। लगातार कोशिशों के बाद 2016 में मंजूरी मिली।



FAQ

  1. ग्वालियर की तिरंगा फैक्ट्री कब शुरू हुई?
    मध्य भारत खादी संघ की शुरुआत 1930 में गांधीजी के चरखा आंदोलन से हुई थी। यह संस्था स्वदेशी भावना से प्रेरित थी।
  2. इस संस्था को राष्ट्रीय ध्वज बनाने की मंजूरी कब मिली?
    संस्था को 2016 में मानकों के अनुरूप तिरंगा बनाने की मंजूरी मिली। इसके बाद पहला तिरंगा लाल किले पर फहराया गया।
  3. ग्वालियर का तिरंगा अब कहां-कहां सप्लाई होता है?
    यह तिरंगा अब मध्यप्रदेश के अलावा करीब 18 राज्यों में भेजा जा रहा है। इस साल स्वतंत्रता दिवस पर 70 से 80 ऑर्डर मिले हैं।

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