बिना घूस सरकारी काम नहीं: 19 महीनों में पकड़े गए 37 रिश्वतखोरी अफसर
समझें क्या है पूरा मामला...
- ग्वालियर में लोकायुक्त ने 19 महीनों में 37 रिश्वतखोर अधिकारी पकड़े।
- सबसे ज्यादा मामले राजस्व विभाग और नगर निगम से जुड़े हैं।
- एक पटवारी ने रिश्वत लेने के लिए निजी ऑफिस खोल रखा था।
- नगर निगम का अफसर रिटायरमेंट से एक दिन पहले रिश्वत लेते पकड़ा गया।
- लोकायुक्त एसपी ने लोगों से बिना डर शिकायत करने की अपील की।
प्राइवेट ऑफिस में घूसखोरी
ग्वालियर में सरकारी दफ्तरों में बिना पैसे काम कराना अब मुश्किल होता जा रहा है। लोकायुक्त पुलिस की कार्रवाई में हर महीने कोई न कोई अफसर रिश्वत लेते पकड़ा जा रहा है। इनमें से कुछ मामले तो हैरान करने वाले हैं। सिरसौद गांव की हल्का पटवारी रेखा शाक्य ने सरकारी दफ्तर से अलग एक प्राइवेट ऑफिस बना रखा था। वह इसी ऑफिस से जमीन से जुड़े काम के नाम पर लोगों से पैसे मांगती थी। मंशाराम नाम के शख्स ने अपनी बहन की जमीन के सीमांकन और पत्नी सावित्रीबाई के नाम नामांतरण के लिए आवेदन दिया था।
आरोप है कि पटवारी ने इसके बदले 15 हजार रुपए मांगे। पहले ही 3500 रुपए ली जा चुकी थी। शिकायत के बाद लोकायुक्त ने ट्रैप लगाया और पटवारी को रंगे हाथ पकड़ लिया। जांच में सामने आया कि रकम लेने में उसके पति कृष्णकांत की भूमिका भी थी। मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज हुई है।
रिटायरमेंट से पहले रिश्वत
एक मामला तो नौकरी के आखिरी दिन का है। ग्वालियर नगर निगम के कार्यपालन यंत्री सुशील कटारे 31 जुलाई को रिटायर होने वाले थे। 30 जुलाई की दोपहर उन्होंने ठेकेदार सचिन पचौरी से 6 हजार रुपए लिए। उसी वक्त लोकायुक्त की टीम ने उन्हें पकड़ लिया। कटारे की नौकरी को 35 से 40 साल पूरे हो चुके थे। करीब 60 लाख रुपए का रिटायरमेंट फंड और पेंशन सामने था। लेकिन आखिरी दिन ली गई रिश्वत ने सब बदल दिया।
मामला ठेकेदार के करीब 36 लाख रुपए के भुगतान से जुड़ा था। आरोप है कि फाइल आगे बढ़ाने के लिए एक प्रतिशत कमीशन यानी 36 हजार रुपए मांगे गए थे। ठेकेदार पहले ही 30 हजार रुपए दे चुका था। बातचीत रिकॉर्ड होने पर उसने लोकायुक्त में शिकायत की। सत्यापन के बाद केमिकल लगे 6 हजार रुपए देकर ठेकेदार को भेजा गया। जैसे ही कटारे ने रकम जेब में रखी, टीम ने उन्हें दबोच लिया। नगर निगम के इतिहास में यह पहला ऐसा मामला बताया जा रहा है।
आम काम के लिए भी घूस
लोकायुक्त के पास पहुंची शिकायतों से पता चलता है कि सामान्य कामों के लिए भी रिश्वत मांगी जा रही है। नामांतरण, सीमांकन और नाम संशोधन जैसे काम भी इससे अछूते नहीं हैं। मालनपुर में पटवारी हिमांशु तोमर ने एक किसान से सीमांकन के बदले आठ हजार रुपए मांगे थे। 6 हजार की पहली किस्त लेते वह रंगे हाथ पकड़ा गया।
पिछोर में पटवारी दिग्विजय ने किसान शंकर लोधी से नामांतरण के लिए 25 हजार रुपए मांगे थे। इसमें से दो हजार रुपए एडवांस लिए गए थे। बाकी 23 हजार रुपए वसूलते हुए ट्रैप हुआ। इसी तरह पटवारी अमन शर्मा ने किसान संजय सिंह से नाम संशोधन के लिए 42 हजार रुपए मांगे। 14 हजार रुपए लेते हुए वह पकड़ा गया। कई शिकायतकर्ताओं का कहना है कि पैसे नहीं देने पर उनकी फाइल आगे नहीं बढ़ाई जा रही थी। परेशान होकर लोगों ने लोकायुक्त से संपर्क किया।
महिला कर्मचारी भी शामिल
रिश्वतखोरी में महिला कर्मचारी भी पीछे नहीं हैं। राजस्व विभाग से जुड़े एक मामले में महिला पटवारी को 15 हजार रुपए लेते पकड़ा गया। एक अन्य मामले में नापतौल निरीक्षक सौरभ शर्मा पेट्रोल पंप संचालक से 27 हजार 500 रुपए घूस लेते पकड़े गए। ये मामले बताते हैं कि रिश्वतखोरी किसी एक विभाग या पद तक सीमित नहीं है। पुरुष हों या महिला, छोटा पद हो या बड़ा, सभी स्तर पर यह समस्या दिख रही है।
विभागवार आंकड़े क्या कहते हैं
लोकायुक्त पुलिस के आंकड़ों के अनुसार सबसे ज्यादा मामले राजस्व विभाग से जुड़े हैं। इस विभाग में 19 अफसर पकड़े गए। नगर निगम में सात, पंचायत विभाग में तीन और पुलिस विभाग में दो अफसर घूस लेते पकड़े गए।
कृषि विभाग में भी दो मामले सामने आए। वन विभाग, महिला एवं बाल विकास, शिक्षा विभाग और नापतौल विभाग में एक-एक अफसर पकड़ा गया। कुल मिलाकर नौ विभागों के 37 अधिकारी-कर्मचारी 19 महीनों में रंगे हाथ पकड़े जा चुके हैं। यह आंकड़ा दिखाता है कि जमीन से जुड़े काम में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार हो रहा है।
एक्सपर्ट की राय
लोकायुक्त ग्वालियर के एसपी निरंजन शर्मा ने इस पूरे मामले पर अपनी बात रखी। उनके मुताबिक 2025-26 के करीब 19-20 महीनों में रिश्वतखोरी के खिलाफ लगातार कार्रवाई की गई है। उन्होंने बताया कि इनमें सबसे ज्यादा 19 कार्रवाई राजस्व विभाग में हुई।
यहां सीमांकन और नामांतरण जैसे कामों के बदले रिश्वत मांगने की शिकायतें सबसे ज्यादा मिली थीं। उनका कहना है कि लोकायुक्त हर शिकायत की गंभीरता से जांच करता है और सत्यापन के बाद ही ट्रैप कार्रवाई की जाती है।
क्या करेगी कार्रवाई अब
राजस्व विभाग और नगर निगम के कई अफसरों के खिलाफ पहले से लोकायुक्त और EOW (Economic Offences Wing) में जांच चल रही है। इसके बावजूद नए मामले सामने आना व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। 19 महीनों में 37 गिरफ्तारी बताती है कि कार्रवाई तो हो रही है, लेकिन समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। अब चुनौती सिर्फ घूसखोरों को पकड़ने की नहीं है।
असली चुनौती ऐसी व्यवस्था बनाने की है जहां आम आदमी को छोटे कामों के लिए जेब ढीली न करनी पड़े। लोकायुक्त पुलिस ने साफ अपील की है कि अगर कोई सरकारी कर्मचारी रिश्वत मांगे तो लोग बिना डर शिकायत दर्ज कराएं। सत्यापन के बाद ट्रैप कार्रवाई कर आरोपी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह खबर आम नागरिक के मौलिक अधिकार से जुड़ी है। भारतीय संविधान हर नागरिक को निष्पक्ष और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन पाने का अधिकार देता है। सरकारी दफ्तरों में रिश्वत मांगना इस अधिकार का सीधा उल्लंघन है। यह खबर पारदर्शिता बढ़ाने और जवाबदेही तय करने में मदद करती है।
इससे आम लोगों को यह भी पता चलता है कि लोकायुक्त जैसी संस्था कैसे काम करती है और शिकायत कैसे दर्ज कराई जा सकती है। खबर पूरी तरह तथ्यों पर आधारित है और सरकारी आंकड़ों तथा अधिकारी के बयान से सत्यापित है। इसमें किसी की निजता का उल्लंघन नहीं किया गया और सभी जानकारी सार्वजनिक हित में दी गई है। यह खबर लोगों को जागरूक बनाती है कि वे रिश्वत मांगे जाने पर चुप न रहें।
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