IAS अफसरों के बाद BJP नेताओं को क्लीन चिट देने की तैयारी, स्वेच्छानुदान मामले में बड़ा मोड़
समझें पूरा मामला...
- IAS अधिकारियों को अभियोजन स्वीकृति नहीं देने का प्रस्ताव तैयार हुआ।
- तत्कालीन महापौर और भाजपा नेताओं को राहत मिलने की संभावना।
- लोकायुक्त की सहमति मिलने पर क्लीन चिट का रास्ता साफ होगा।
- मामला 2010-14 की स्वेच्छानुदान सहायता वितरण से जुड़ा।
- विभागीय जांच में भ्रष्टाचार नहीं, केवल प्रशासनिक और प्रक्रियागत अनियमितता।
ग्वालियर नगर निगम के चर्चित स्वेच्छानुदान सहायता मामले में बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक मोड़ आता दिख रहा है। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने पहले ही तीन IAS अफसरों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति नहीं देने का प्रस्ताव सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) को भेज दिया है।
अब उसी आधार पर तत्कालीन महापौर समीक्षा गुप्ता और अन्य भाजपा नेताओं को भी राहत देने की तैयारी शुरू हो गई है। हालांकि अंतिम फैसला अभी बाकी है। GAD की सहमति के बाद प्रस्ताव लोकायुक्त के पास जाएगा और वहां से मंजूरी मिलने पर ही क्लीन चिट का रास्ता साफ होगा।
नेताओं तक पहुंच सकती है क्लीन चिट
सूत्रों के मुताबिक नगरीय प्रशासन विभाग ने अपनी कानूनी समीक्षा में माना है कि मामले में प्रक्रिया संबंधी अनियमितताएं तो हो सकती हैं, लेकिन भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आपराधिक अपराध साबित करने के पर्याप्त आधार नहीं मिले।
इसी निष्कर्ष के आधार पर विभाग ने पहले तीन IAS अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति निरस्त करने का प्रस्ताव तैयार किया। अब इसी तर्क को आधार बनाकर तत्कालीन महापौर समीक्षा गुप्ता और अन्य जनप्रतिनिधियों को भी राहत देने पर विचार किया जा रहा है।
GAD के फैसले पर टिकी पूरी फाइल
फिलहाल मामला सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के पास विचाराधीन है। यदि GAD नगरीय प्रशासन विभाग की राय से सहमत अथवा असहमत होता है तो प्रस्ताव लोकायुक्त संगठन को भेजा जाएगा। इसके बाद लोकायुक्त को तय करना होगा कि विभागीय निष्कर्षों से सहमति जताई जाए या नहीं।
यानी फिलहाल किसी को क्लीन चिट नहीं मिली है, लेकिन फाइल जिस दिशा में बढ़ रही है, उससे राहत के संकेत जरूर दिखाई दे रहे हैं।
लोकायुक्त सहमत नहीं हुआ तो मामला सीएम कमेटी तक पहुंचेगा। इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि लोकायुक्त विभागीय प्रस्ताव से असहमति जताता है तो मामला सीधे शासन स्तर पर जाएगा।
सूत्रों के अनुसार ऐसी स्थिति में फाइल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के समन्वय वाली उच्चस्तरीय समन्वय समिति (Coordination Committee) के पास भेजी जा सकती है। यानी अंतिम निर्णय से पहले अभी एक और महत्वपूर्ण प्रशासनिक पड़ाव बाकी है।
क्या था पूरा विवाद?
मामला वर्ष 2010 से 2014 के बीच ग्वालियर नगर निगम की महापौर स्वेच्छानुदान निधि से आर्थिक सहायता वितरण से जुड़ा हुआ है। लोकायुक्त का आरोप था कि आर्थिक सहायता वितरण के लिए निगम परिषद की पूर्व अनुमति नहीं ली गई और नियमों से हटकर प्रक्रिया अपनाई गई। जांच में दावा किया गया कि सहायता राशि बांटने के लिए बनाई गई समिति ने निर्धारित अधिकारों से बाहर जाकर निर्णय लिए।
किन लोगों पर लगे थे आरोप?
लोकायुक्त जांच में जिन नामों को आरोपी बनाया गया था, उनमें शामिल हैं-
- समीक्षा गुप्ता (तत्कालीन महापौर)
- डॉ. अंजलि रायजादा (तत्कालीन पार्षद)
- वेद प्रकाश शर्मा (तत्कालीन आयुक्त)
- एनबीएस राजपूत (तत्कालीन आयुक्त)
- विनोद शर्मा (तत्कालीन आयुक्त)
लोकायुक्त ने इन सभी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अभियोजन स्वीकृति की मांग की थी।
विभागीय जांच में कैसे बदला पूरा मामला?
नगरीय प्रशासन विभाग की कानूनी समीक्षा में कई अहम तथ्य सामने आए। समीक्षा में कहा गया कि नगर निगम अधिनियम के तहत परिषद को विशेष समिति गठित करने का अधिकार प्राप्त है। इसलिए समिति का गठन अपने आप में अवैध नहीं माना जा सकता।
इसके अलावा रिकॉर्ड में ऐसा कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला कि परिषद ने अपने वित्तीय अधिकार पूरी तरह समिति को हस्तांतरित कर दिए थे। यही बिंदु अभियोजन स्वीकृति के खिलाफ सबसे मजबूत आधार बनकर सामने आया।
भ्रष्टाचार नहीं, प्रक्रिया संबंधी अनियमितता का मामला?
विभागीय परीक्षण में यह राय सामने आई कि मामला अधिकतम प्रशासनिक और प्रक्रियागत अनियमितताओं का हो सकता है। फाइल में यह भी दर्ज किया गया कि कुछ निर्णय अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर लिए गए, लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों से आपराधिक भ्रष्टाचार या व्यक्तिगत लाभ की मंशा स्पष्ट रूप से साबित नहीं होती। यही कारण है कि विभाग ने अभियोजन स्वीकृति पर पुनर्विचार का सुझाव दिया है।
46.31 लाख रुपए के वितरण पर उठे थे सवाल
जांच से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 2010 से 2014 के बीच लगभग 46.31 लाख रुपए की सहायता राशि वितरित की गई थी। यह सहायता बीमारी, गंभीर उपचार, कैंसर, ऑपरेशन और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की मदद के लिए दी गई थी। हालांकि, सहायता वितरण की प्रक्रिया और अधिकारों के इस्तेमाल को लेकर बाद में विवाद खड़ा हुआ।एक नजर में पूरा मामला
- मामला: ग्वालियर नगर निगम स्वेच्छानुदान सहायता वितरण।
- अवधि: 2010 से 2014।
- कुल राशि: 46.31 लाख रुपए।
- जांच एजेंसी: लोकायुक्त संगठन।
- आरोप: नियम विरुद्ध आर्थिक सहायता वितरण।
- विभागीय निष्कर्ष: प्रथम दृष्टया भ्रष्टाचार प्रमाणित नहीं।
- वर्तमान स्थिति: GAD और लोकायुक्त स्तर पर अंतिम निर्णय बाकी।।
राजनीतिक मायने क्यों बड़े हैं?
यह मामला केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं रह गया है। यदि IAS अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति निरस्त होती है और वही आधार नेताओं पर भी लागू होता है, तो तत्कालीन महापौर और अन्य जनप्रतिनिधियों को भी बड़ी राहत मिल सकती है।
दूसरी तरफ यदि लोकायुक्त विभागीय राय से असहमति जताता है तो मामला फिर नए कानूनी और प्रशासनिक विवाद में बदल सकता है।फिलहाल सबसे बड़ी नजर GAD और उसके बाद लोकायुक्त के फैसले पर टिकी हुई है, क्योंकि वही तय करेगा कि यह मामला क्लीन चिट पर खत्म होगा या फिर नए मोड़ के साथ आगे बढ़ेगा।
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