क्षेत्राधिकार के असमंजस में कोर्ट कर रहे मामले खारिज, हाईकोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान
समझें क्या है पूरा मामला...
- छिंदवाड़ा फैमिली कोर्ट ने क्षेत्राधिकार का हवाला देकर कई मामले खारिज किए हैं।
- जिला बार एसोसिएशन ने इसे हाईकोर्ट के सामने उठाया है।
- हाईकोर्ट को पता चला कि यही परेशानी दूसरे जिलों में भी है।
- कोर्ट ने पूरे मामले का स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई शुरू कर दी है।
- अंतिम फैसला आने तक केवल क्षेत्राधिकार के आधार पर कोई मामला खारिज नहीं होगा।
फैमिली कोर्ट में भी क्षेत्राधिकार का विवाद
किसी मामले की जांच को लेकर दो पुलिस थानों के बीच सीमा या क्षेत्राधिकार का विवाद सामने आना तो आम बात है। कई बार फरियादी इसी कारण भटकते रहते हैं। अब ऐसा ही मामला अदालतों में भी दिखाई दिया है।
मध्य प्रदेश के कई फैमिली कोर्ट अपने ही क्षेत्राधिकार को लेकर असमंजस में हैं। इसका असर सीधे उन लोगों पर पड़ रहा है, जो पारिवारिक विवादों में न्याय की उम्मीद लेकर अदालत पहुंचते हैं। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है।
छिंदवाड़ा से शुरू हुआ मामला
पूरा विवाद छिंदवाड़ा से शुरू हुआ। जिला बार एसोसिएशन ने हाईकोर्ट को बताया कि प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट छिंदवाड़ा ने कई लंबित मामलों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि ग्रामीण क्षेत्र के मामलों की सुनवाई उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आती।
छिंदवाड़ा बार एसोसिएशन का कहना है कि छिंदवाड़ा शहर और ग्रामीण तहसील का मुख्यालय एक ही स्थान पर है। इसलिए पूरी तहसील के पारिवारिक मामलों की सुनवाई फैमिली कोर्ट छिंदवाड़ा में ही होनी चाहिए।
दूसरे जिलों में भी सामने आई वही परेशानी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने यह तथ्य भी आया कि यह समस्या केवल छिंदवाड़ा तक सीमित नहीं है। राज्य के कई जिलों के फैमिली कोर्ट भी अपने अधिकार क्षेत्र को लेकर भ्रम की स्थिति में हैं। इसी वजह से एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने इस पूरे मुद्दे को स्वतः संज्ञान में लेकर व्यापक सुनवाई शुरू कर दी।
7 मार्च 2025 की अधिसूचना पर टिका पूरा विवाद
बार एसोसिएशन ने अदालत को बताया कि 7 मार्च 2025 की अधिसूचना में साफ लिखा गया है कि फैमिली कोर्ट का अधिकार नगर निगम या नगर पालिका क्षेत्र के साथ जिला मुख्यालय की तहसील सीमा तक रहेगा। इसके बावजूद अलग-अलग जिलों में इस नियम की अलग-अलग व्याख्या की जा रही है। इसी कारण लोगों के मामले प्रभावित हो रहे हैं।
हाईकोर्ट ने दिया बड़ा अंतरिम आदेश
खंडपीठ ने स्पष्ट आदेश दिया कि जब तक इस संदर्भ पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक प्रदेश का कोई भी फैमिली कोर्ट केवल क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के आधार पर किसी भी लंबित मामले को खारिज नहीं करेगा। यह आदेश उन हजारों परिवारों के लिए राहत माना जा रहा है, जिनके मामले लंबे समय से अदालतों में लंबित हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ताओं को बनाया न्यायमित्र
हाईकोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता संजय अग्रवाल और वरिष्ठ अधिवक्ता हेमंत श्रीवास्तव को न्यायमित्र नियुक्त किया है। साथ ही राज्य की सभी बार एसोसिएशनों को अपनी राय रखने की अनुमति दी गई है। महाधिवक्ता या अपर महाधिवक्ता भी राज्य सरकार का पक्ष अदालत के सामने रखेंगे।
पूरे प्रदेश के लिए तय होगा एक नियम
अब हाईकोर्ट इस कानूनी सवाल का अंतिम जवाब देगा कि जिला मुख्यालय वाले क्षेत्रों में फैमिली कोर्ट का वास्तविक क्षेत्राधिकार क्या होगा। इस फैसले के बाद पूरे मध्य प्रदेश के फैमिली कोर्ट के लिए एक समान व्यवस्था बनने की उम्मीद है। इससे लोगों को अदालतों के चक्कर लगाने की परेशानी कम होगी और न्याय प्रक्रिया भी अधिक स्पष्ट बनेगी।
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