DRT जबलपुर में हजारों केस लंबित, नियमित अधिकारी की नियुक्ति पर हाईकोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

Neel Tiwari | Oct 08, 2026, 16:54 IST
DRT जबलपुर में नियमित पीठासीन अधिकारी नहीं होने और हजारों मामलों की पेंडेंसी पर हाईकोर्ट ने सख्ती दिखाई है।
DRT जबलपुर की व्यवस्था पर सवाल उठे हैं। नियमित पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति का मामला अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पहुंचा चुका है। याचिका में हजारों मामलों के लंबित होने का मुद्दा उठाया गया है। जबलपुर हाईकोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांग है।

दोनों राज्यों का बोझ, फिर भी पद खाली

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने ऋण वसूली अधिकरण यानी DRT जबलपुर में लंबे समय से नियमित पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति नहीं होने पर सख्त रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस अल्पेश कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की डिविजनल बेंच ने WP 40948/2026 की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने पूछा है कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के मामलों का भारी दबाव होने के बावजूद DRT जबलपुर में नियमित पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति अब तक क्यों नहीं की गई।



नियमित अधिकारी नहीं, अतिरिक्त प्रभार से चल रहा काम

याचिका में बताया गया कि DRT जबलपुर का क्षेत्राधिकार पूरे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ तक है। पूर्व नियमित पीठासीन अधिकारी का कार्यकाल खत्म होने के बाद से पद खाली है। फिलहाल अहमदाबाद DRT के पीठासीन अधिकारी को जबलपुर का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। वे अहमदाबाद में अपने नियमित काम के चलते व्यस्त रहते हैं। ऐसे में जबलपुर में सीमित तारीखों पर ही जरूरी मामलों की सुनवाई हो पा रही है।



नीलामी और कब्जे वाले मामलों पर ही ज्यादा फोकस

याचिकाकर्ता का कहना है कि अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे अधिकारी जबलपुर में मुख्य रूप से नीलामी और भौतिक कब्जे से जुड़े बेहद जरूरी मामलों की सुनवाई कर पा रहे हैं। दूसरी ओर सामान्य मामलों में लंबी तारीखें मिल रही हैं। इससे DRT में पहले से मौजूद भारी पेंडेंसी और बढ़ रही है। इसका असर बैंक, वित्तीय संस्थानों के साथ आम लोगों पर भी पड़ रहा है।



हजारों मामलों की पेंडेंसी का उठाया मुद्दा

जनहित याचिका 'एडवोकेट यूनियन फॉर डेमोक्रेसी एंड सोशल जस्टिस' के सचिव अधिवक्ता आर. जी. वर्मा ने दायर की है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता पुष्पेंद्र कुमार शाह, परमानंद साहू और विवेक साहू ने पैरवी की। अधिवक्ताओं ने कोर्ट को बताया कि वैधानिक अधिकरण को लंबे समय तक कार्यवाहक व्यवस्था के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इससे लोगों को समय पर न्याय मिलने में परेशानी हो रही है।



अनुच्छेद 14 और 21 का भी दिया हवाला

याचिका में तर्क दिया गया कि लंबे समय तक नियमित पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति नहीं होने से संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 में मिले अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के उन दिशा-निर्देशों का भी हवाला दिया, जिनके अनुसार अधिकरणों में संभावित रिक्तियों को भरने की प्रक्रिया समय रहते शुरू की जानी चाहिए। याचिका में कहा गया कि इस मामले में केंद्र सरकार ने समय रहते नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी नहीं की।



अब केंद्र सरकार को देना होगा जवाब

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने केंद्रीय वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग सहित संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। अब केंद्र सरकार को बताना होगा कि DRT जबलपुर जैसे महत्वपूर्ण अधिकरण में नियमित पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति में देरी क्यों हुई और भारी पेंडेंसी के बीच कामकाज को नियमित करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

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