IAS अफसरों पर कार्रवाई अटकी: वेदप्रकाश शर्मा, एनबीएस राजपूत और विनोद शर्मा केस में GAD के पाले में फैसला
नगर निगम ग्वालियर से जुड़े बहुचर्चित अपराध क्रमांक 283/2017 में तीन वरिष्ठ आईएएस वेदप्रकाश शर्मा, एनबीएस राजपूत और विनोद शर्मा के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति का मामला एक बार फिर प्रशासनिक पाले में अटक गया है। नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने अपना स्पष्ट अभिमत देते हुए कहा है कि उपलब्ध रिकॉर्ड और नियमों के आधार पर आरोप प्रमाणित नहीं होते, इसलिए अभियोजन स्वीकृति देना उचित नहीं लगता। अब अंतिम फैसला सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) को लेना है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला ग्वालियर नगर निगम में आर्थिक सहायता (स्वेच्छानुदान) से जुड़े निर्णयों और परिषद के ठहरावों को लेकर उठा था। आरोप यह था कि तत्कालीन महापौर, पार्षद और प्रशासनिक अधिकारियों ने आर्थिक सहायता देने में नियमों का उल्लंघन किया। इसी आधार पर 2017 में अपराध दर्ज हुआ और बाद में इसमें तत्कालीन आयुक्तों की भूमिका भी जांच के दायरे में आई।
किन ठहरावों पर विवाद?
जांच और विभागीय पत्राचार में तीन प्रमुख ठहराव सामने आए:
- ठहराव क्रमांक 51 (15 जून 2010): आपात स्थिति में आर्थिक सहायता देने के लिए महापौर को अधिकृत किया गया।
- ठहराव क्रमांक 375 (16 सितंबर 2013): आर्थिक सहायता प्रक्रिया को सरल बनाने और समिति के जरिए राशि तय करने का प्रावधान।
- ठहराव क्रमांक 328 (25 मार्च 2013):परिषद का निर्णय, जिसे विभाग ने विधिसम्मत माना।
नगरीय विकास विभाग का क्या कहना है?
विभाग ने अपने ताजा अभिमत में साफ कहा है:
- परिषद को समिति बनाने का अधिकार कानून में स्पष्ट है
- आर्थिक सहायता तय करने में समिति की भूमिका पर कोई स्पष्ट रोक नहीं
- सभी ठहराव मध्यप्रदेश नगर पालिक निगम अधिनियम, 1956 के अनुरूप हैं
- रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं मिला जिससे आरोप सिद्ध हों
- तीनों आईएएस अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति देना उचित नहीं है।
GAD ने क्या पूछा था?
सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ने पहले कुछ अहम सवाल उठाए थे:
- 2010 और 2013 के ठहरावों का स्पष्ट उल्लेख क्यों नहीं?
- क्या परिषद आर्थिक सहायता तय करने के लिए समिति बना सकती है?
- स्वेच्छानुदान की प्रक्रिया और गाइडलाइन क्या हैं?
इन सवालों के जवाब में नगरीय विकास विभाग ने विस्तृत अभिमत भेजा है।
अब आगे क्या?
फिलहाल गेंद पूरी तरह GAD के पाले में है। नगरीय विकास विभाग ने अभियोजन स्वीकृति के खिलाफ राय दे दी है
लेकिन अंतिम निर्णय GAD ही लेगा। केस बंद होगा या कोर्ट तक जाएगा,यह अब प्रशासनिक निर्णय पर निर्भर है।
क्यों अहम है यह मामला?
यह केस नगर निगमों में आर्थिक सहायता वितरण की प्रक्रिया को लेकर बड़ा उदाहरण है। इसमें यह तय होगा कि नीतिगत निर्णय और आपराधिक जिम्मेदारी की सीमा क्या है। साथ ही, यह भी साफ होगा कि प्रशासनिक फैसलों पर अभियोजन की सीमा कहां तक है।
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