IAS संतोष वर्मा पर कार्रवाई की मांग वाली PIL खारिज, हाईकोर्ट ने पूछा- अब कोर्ट क्या करे?
समझें क्या है पूरा मामला
- IAS संतोष वर्मा के कथित विवादित बयान के खिलाफ दायर PIL खारिज।
- दामोदर यादव को भी पक्षकार बनाने का आवेदन भी कोर्ट ने नामंजूर किया।
- हाईकोर्ट ने कहा FIR पहले से दर्ज है, कानून अपना काम करेगा।
- NSA के तहत कार्रवाई का आदेश देने से कोर्ट ने किया इनकार।
- विभागीय कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार को पक्षकार न बनाए जाने पर भी राहत नहीं मिली।
AJAKS के प्रदेश अध्यक्ष एवं IAS संतोष वर्मा के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि FIR पहले से दर्ज है।
NSA के तहत कार्रवाई का आदेश नहीं दिया जा सकता। साथ ही विभागीय कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार को पक्षकार भी नहीं बनाया गया है।
विवादित बयान से शुरू हुआ पूरा मामला
AJAKS के प्रदेश अध्यक्ष और आईएएस संतोष वर्मा ने नवंबर 2025 में कथित विवादित बयान दिया था। इस बयान को लेकर अधिवक्ता अभिषेक दुबे ने जनवरी 2026 में जबलपुर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि इस बयान से पूरे ब्राह्मण समाज का अपमान हुआ है। इसके साथ ही कई जगह विरोध प्रदर्शन भी हुए। बाद में अप्रैल 2026 में दामोदर प्रसाद यादव को भी इस मामले में पक्षकार बनाने के लिए अलग आवेदन लगाया गया।
संतोष वर्मा के खिलाफ एनएसए की मांग
याचिकाकर्ता ने संतोष वर्मा के खिलाफ ये मांगे की थी।
- याचिकाकर्ता ने IAS संतोष वर्मा के खिलाफ FIR की मांग की।
- भारतीय न्याय संहिता की धाराओं और NSA कार्रवाई की मांग की।
- अखिल भारतीय सेवा आचरण नियमों के तहत जांच की मांग की।
- ब्राह्मण समाज कल्याण हेतु राज्य सरकार से दिशानिर्देश मांगे गए।
- वरिष्ठ IAS अधिकारी को सार्वजनिक मंच से बयान देने से बचना चाहिए।
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज कर दी पूरी याचिका?
25 जून 2026 को जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस विजय कुमार शुक्ला की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई की। आज 29 जून को आदेश अपलोड हुआ और याचिका और अंतरिम आवेदन दोनों खारिज कर दिए। कोर्ट ने साफ कहा कि जिस FIR की मांग की जा रही थी। जो कि पहले से दर्ज है, इसलिए इस संबंध में कोई नया आदेश देने की जरूरत नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत कार्रवाई करना संबंधित सक्षम प्राधिकारी का अधिकार है। ऐसे मामलों में कोर्ट सीधे निर्देश जारी नहीं कर सकता।
भारत सरकार को ही नहीं बनाया पक्षकार
वहीं, किसी एक विशेष समुदाय के कल्याण के लिए सरकार को समयबद्ध दिशानिर्देश बनाने का आदेश देना भी न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। इन सभी कारणों के आधार पर कोर्ट ने पूरी जनहित याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट की आखिरी टिप्पणी कानून अपना काम करेगा
आदेश के अंत में डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि प्रतिवादी के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई निर्धारित तरीके से आगे बढ़ेगी । यानी हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों की जांच एजेंसियां करेंगी। कानूनी प्रक्रिया आगे भी संबंधित एजेंसियों द्वारा ही संचालित होगी। जनहित याचिका में मांगी गई राहत का कोई आधार नहीं मिला।
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