जनसंवाद के लिए पहुंचे आईएएस स्वप्निल वानखड़े, गांव में बिताई रात, आलम ऐसा की 90% कलेक्टर नहीं उतरे फील्ड पर
मध्य प्रदेश के दतिया जिले से एक ऐसी खबर आई है जो आमतौर पर सरकारी दफ्तरों से नहीं आती। यहां के कलेक्टर आईएएस स्वप्निल वानखड़े और एसपी सूरज वर्मा जिले के ग्राम बीकर पहुंचे। वे न सिर्फ चौपाल लगाकर ग्रामीणों से मिले, बल्कि पूरी रात गांव में ही रुके।
रात में गांव के एक बुजुर्ग कलेक्टर से मिलने पहुंचे। उनके एक साल के पोते का जन्मदिन था और वे चाहते थे कि साहब घर आएं। कलेक्टर वानखड़े ने बताया कि उस बुजुर्ग ने बुलाया तो मैं मना नहीं कर सका।
बच्चे को दिया आशीर्वाद
कलेक्टर और एसपी रात 10 बजे उस बुजुर्ग के घर पहुंचे। छोटे बच्चे को गोद में लिया और पूरे परिवार के साथ कुछ वक्त बिताया। दतिया कलेक्टर स्वप्निल वानखड़े ने इसे जुड़ाव और विश्वास का सशक्त अनुभव बताया।
सुबह पैदल निकले गलियों में
अगली सुबह कलेक्टर और एसपी पैदल ही गांव की गलियों में निकल पड़े। कलेक्टर कई किसानों के घर गए। चाय पी, खेती-बाड़ी की बातें कीं और परिवार का हाल जाना। इस दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना (Kisan Kalyan Yojana) और अन्य सरकारी योजनाओं की जानकारी भी ग्रामीणों को दी।
छोटे किसान और सब्जी बेचने वाले दुकानदारों से भी मुलाकात हुई। उनकी रोजमर्रा की दिक्कतें सुनी गईं।
ग्राम चौपाल में दर्ज हुई शिकायतें
शाम को ग्राम चौपाल लगाई गई। ग्रामीणों ने सफाई, मूलभूत सुविधाओं और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर अपनी बात रखी। कलेक्टर ने संबंधित अधिकारियों को साफ निर्देश दिए कि समस्याओं का हल फाइलों में नहीं, जमीन पर होना चाहिए।
आईएएस स्वप्निल वानखड़े की यह जनसंवाद वाकई काबिले तारीफ है, लेकिन इसके उलट जमिनी आंकड़े कुछ अलग की बया कर रहे हैं। जानें क्या बता रहे आंकड़े...
औपचारिकता में बदला जनसंवाद
मध्यप्रदेश में प्रशासनिक व्यवस्था को गांवों तक पहुंचाने की मंशा और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा फर्क सामने आया है। सीएम मोहन यादव ने बार-बार निर्देश दिए थे कि अधिकारी गांवों में जाएं, चौपाल लगाएं और लोगों की समस्याएं सुनें। वहीं, नतीजा उलटा रहा।
एक प्रतिष्ठित अखबार में छपी खबर के मुताबिक, स्थिति यह है कि करीब 90 प्रतिशत कलेक्टरों ने अपने पूरे कार्यकाल में कभी किसी गांव में रात नहीं बिताई। जो कुछ अधिकारी गांव गए भी, उनका दौरा अधिकतर औपचारिकता तक सीमित रहा।
वीडियो बनवाया और लौट आए
कुछ जिलों के अफसरों ने तो गांवों में वीडियो और फोटोग्राफी की औपचारिकताएं निभाईं और वापस शहर आ गए। असली जनसंवाद की जगह कैमरे के सामने दिखावे ने ले ली। ग्रामीण इलाकों में प्रशासन की मौजूदगी न के बराबर रही।
प्रदेश के अधिकांश जिलों में अधिकारी मुख्यालय तक सिमटे रहे। कई जिलों में लोगों को शहर के वार्डों और बस्तियों में भी कम ही देखा गया है। पुलिस महकमे के अफसरों में भी यही स्थिति देखने को मिली है।
मुख्यमंत्री ने क्या कहा था?
जनसंवाद से क्या होता फायदा
यदि जनसंवाद की पहल सही तरीके से लागू होती तो इसके कई फायदे होते। ग्रामीणों की समस्याओं की वास्तविक और प्रत्यक्ष समझ विकसित होती। मौके पर ही त्वरित समाधान संभव होता।
सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की असली स्थिति सामने आती। स्थानीय अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ती। ग्रामीणों को जिला मुख्यालय के चक्कर नहीं लगाने पड़ते। प्रशासन और जनता के बीच भरोसा मजबूत होता और भ्रष्टाचार व लापरवाही पर अंकुश लगता।
ये कलेक्टर, जो जनता के बीच दिखे
इस निराशाजनक तस्वीर के बीच कुछ कलेक्टरों ने अपना फर्ज जरूर निभाया है।
रीवा के कलेक्टर आईएएस नरेंद्र सूर्यवंशी 13 अप्रैल को जवा के जतरी गांव पहुंचे और वहां लोगों से संवाद कर उनकी समस्याएं सुनीं।
सीधी के कलेक्टर आईएएस विकास मिश्रा ने अप्रैल के पहले और दूसरे सप्ताह में सिंहवल, अमिलिया, कोदौरी, हटवा आदि गांवों में पहुंचकर रात में चौपाल लगाई और लोगों की समस्याएं सुनकर कार्रवाई की।
बड़वानी कलेक्टर आईएएस जयति सिंह भी हाल ही में शासकीय जनजातीय कन्या आश्रम बघाड़ी में रात रुकी थीं। वहां छात्राओं से संवाद किया, उनकी समस्याएं सुनीं और समाधान के लिए निर्देश दिए।
टीकमगढ़ के कलेक्टर आईएएस विवेक श्रोत्रिय हाल के दिनों में जिले की टोरिया ग्राम पंचायत में रात्रि चौपाल लगाने पहुंचे थे। पंचायत भवन में ही रुके और विकास कार्यों की जानकारी ली, समस्याएं सुनीं।
निवाड़ी की कलेक्टर आईएएस जमुना भिड़े जनसंवाद के लिए गांव नेपुरा पहुंची थीं। पीडीएस (Public Distribution System), पानी और पेंशन संबंधी शिकायतें मिलीं और उन्होंने समस्याएं सुनते हुए निर्देश दिए।
अब जरूरत है सख्त निगरानी की
यह पूरी तस्वीर बताती है कि सिर्फ निर्देश देने से काम नहीं चलता। जब तक ऊपर से जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक जनसंवाद जैसी जरूरी पहलें जमीन पर नहीं उतरेंगी। गिनती के कलेक्टरों ने जो किया, वह मिसाल जरूर है। इसके बावजूद यह काफी नहीं है।
सरकार को चाहिए कि वह ऐसे दौरों की नियमित निगरानी करे। जो अधिकारी जनता के बीच नहीं जाते, उनके खिलाफ कार्रवाई हो। तभी जनसंवाद की पहल सार्थक बन सकती है।
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