कांग्रेस आईटी सेल के गिरफ्तार कार्यकर्ताओं को कोर्ट में पेश करने का आदेश, ‘व्हाट्सएप फॉरवर्ड’ था गिरफ्तारी की जड़
News in short
- तीनों कांग्रेस कार्यकर्ताओं को साइबर क्राइम ब्रांच ने 20 अप्रैल की रात हिरासत में लिया।
- बिना एफआईआर और बिना मजिस्ट्रेट पेशी के हिरासत का आरोप।
- ‘व्हाट्सएप फॉरवर्ड’ को लेकर कार्रवाई, खुद पोस्ट बनाने का आरोप नहीं।
- हाईकोर्ट में तीन अलग-अलग बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दायर।
- 27 अप्रैल को जबलपुर हाईकोर्ट में तीनों को पेश करने का आदेश।
News in detail
जबलपुर हाईकोर्ट में कांग्रेस आईटी सेल से जुड़े तीन कार्यकर्ताओं की कथित अवैध गिरफ्तारी का मामला गरमा गया है। चीफ जस्टिस की बेंच ने मामले को गंभीर मानते हुए नोटिस जारी किए हैं। कोर्ट ने अब तीनों कार्यकर्ताओं को 27 अप्रैल 2026 को पेश करने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने भोपाल के पुलिस आयुक्त (Commissioner of Police) को कानून के उल्लंघन के आरोपों की जांच करने और अगली सुनवाई तक अपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है।
कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मामला हाईकोर्ट में गूंजा
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर मुख्य पीठ में बुधवार 22 अप्रैल 2026 को इस बहुचर्चित मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच के समक्ष हुई।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता ने दलील दी कि कांग्रेस आईटी सेल के तीनों कार्यकर्ताओं को पुलिस ने अवैध रूप से हिरासत में रखा है।
इस मामले का आदेश अब तक अपलोड नहीं हुआ है। कोर्ट से मिली जानकारी के अनुसार मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि तीनों कार्यकर्ताओं को 27 अप्रैल 2026 को जबलपुर हाईकोर्ट के समक्ष पेश किया जाए।
कार्यकर्ता के परिजन ने दायर की याचिकाएं
इस मामले में तीन युवकों को हिरासत में लिया गया है। बिलाल खान, इनाम अहमद और निखिल प्रजापति को पुलिस ने गिरफ्तार किया है।
इनमें बिलाल खान के भाई खिजर खान, इनाम अहमद के भाई अनाम अहमद और निखिल प्रजापति के मित्र उदय घनघट ने अलग-अलग बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दायर की हैं। सभी याचिकाओ की सुनवाई 22 अप्रैल 2026 को हाईकोर्ट में हुई, जो एक ही घटनाक्रम से जुड़ी हुई हैं।
देर रात घर से उठाए जाने का आरोप
याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि साइबर क्राइम ब्रांच भोपाल की टीम ने 20 अप्रैल की रात करीब 2 से 3 बजे के बीच तीनों युवकों को उनके घरों से जबरन उठाया।
यह कार्रवाई बिना किसी पूर्व सूचना और बिना वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए की गई। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस दौरान न तो कोई गिरफ्तारी मेमो दिया गया और न ही परिवार को स्पष्ट जानकारी दी गई।
24 घंटे में पेशी नहीं होने के गंभीर आरोप
मामले में सबसे गंभीर आरोप यह है कि हिरासत में लिए जाने के समय कोई एफआईआर दर्ज नहीं थी। इसके अलावा, 24 घंटे से अधिक समय बीत जाने के बावजूद आरोपियों को मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन माना जा रहा है। यह बिंदु कोर्ट में सुनवाई के दौरान विशेष रूप से उठाया गया।
पुलिस स्टेशन नहीं, PTRI में रखकर पूछताछ
याचिकाओं में यह भी दावा किया गया है कि तीनों युवकों को किसी पुलिस स्टेशन में रखने के बजाय भोपाल के जहांगीराबाद स्थित ‘पुलिस ट्रांसपोर्ट रिसर्च एंड इंस्टीट्यूट’ (PTRI) में रखा गया है। वहां उनसे पूछताछ की जा रही है, जिससे पुलिस की कार्यप्रणाली पर और भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
‘व्हाट्सएप फॉरवर्ड’ बना पूरे विवाद की जड़
पूरे मामले की जड़ एक कथित पत्र है, जो राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री Vasundhara Raje से जुड़ा बताया जा रहा है। पुलिस का दावा है कि यह पत्र सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया।
हालांकि, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि तीनों युवकों ने कोई पोस्ट तैयार नहीं की थी, बल्कि केवल पहले से इंटरनेट पर मौजूद संदेशों को व्हाट्सएप ग्रुप्स में फॉरवर्ड किया था।
जयपुर FIR से भोपाल गिरफ्तारी तक पूरा मामला
दरअसल, 15 अप्रैल 2026 के आसपास सोशल मीडिया पर राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के नाम से एक कथित फर्जी पत्र वायरल हुआ था, जिसमें RSS प्रमुख मोहन भागवत को संबोधित करते हुए महिला आरक्षण बिल और परिसीमन जैसे मुद्दों पर भाजपा की नीतियों की आलोचना की गई थी।
वसुंधरा राजे ने इस पत्र को पूरी तरह फर्जी और भ्रामक बताते हुए इसका खंडन किया, जिसके बाद जयपुर के सिविल लाइंस थाने में मामला दर्ज किया गया। जांच के बाद जयपुर पुलिस ने भोपाल से कांग्रेस समर्थित तीन कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेकर जयपुर ले जाया।
इस कार्रवाई पर कांग्रेस ने कड़ी आपत्ति जताई, वहीं कांग्रेस सांसद विवेक तन्खा की टीम ने इसे अवैध गिरफ्तारी बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी है। पुलिस का पक्ष है कि यह कार्रवाई भ्रामक सूचना फैलाने के साक्ष्यों के आधार पर की गई है।
सोशल मीडिया पर उपलब्ध सामग्री पर चयनात्मक कार्रवाई का आरोप
याचिकाओं में यह भी दलील दी गई है कि वही कथित पत्र ‘X’ (ट्विटर) जैसे प्लेटफॉर्म पर अभी भी उपलब्ध है, लेकिन केवल इन तीन युवकों को निशाना बनाकर कार्रवाई की जा रही है। इससे पुलिस की कार्रवाई पर पक्षपात और चयनात्मकता के आरोप लगाए गए हैं, जो अदालत में बहस का प्रमुख मुद्दा बना।
कोर्ट से क्या मांगी गई राहत?
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट से मांग की है कि तीनों बंदियों को तुरंत अदालत में प्रस्तुत किया जाए और उनकी अवैध हिरासत समाप्त कर रिहा किया जाए। साथ ही अवैध हिरासत के लिए मुआवजा और याचिका खर्च देने की भी मांग की गई है। इस मामले में गृह विभाग के प्रमुख सचिव, भोपाल के एसपी और साइबर क्राइम ब्रांच के थाना प्रभारी को प्रतिवादी बनाया गया है।
अब 27 अप्रैल को तय होगी आगे की दिशा
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद अब यह मामला 27 अप्रैल 2026 को निर्णायक मोड़ पर पहुंच सकता है। उस दिन पुलिस को तीनों कांग्रेस कार्यकर्ताओं बिलाल खान, इनाम अहमद और निखिल प्रजापति को अदालत के समक्ष पेश करना होगा। इसके बाद कोर्ट यह तय करेगा कि हिरासत वैध थी या नहीं और आगे क्या कार्रवाई की जाएगी।
यह मामला अब केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पुलिस की कार्रवाई की वैधता और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन का बड़ा कानूनी परीक्षण बनता जा रहा है।
कमिश्नर ऑफ पुलिस करेंगे जांच
हाईकोर्ट ने राजस्थान सरकार और वहां के संबंधित पुलिस अधिकारियों को मामले में पक्षकार बनाने की अनुमति दी है और उन्हें आदेश दिया है कि वे अगली सुनवाई पर हिरासत में लिए गए व्यक्तियों (कॉर्पस) को कोर्ट के सामने पेश करें। इसके साथ ही कोर्ट ने भोपाल के पुलिस आयुक्त (Commissioner of Police) को कानून के उल्लंघन के आरोपों की जांच करने और अगली सुनवाई तक अपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है।
मध्य प्रदेश पुलिस को यह आदेश भी दिया गया है कि वे 20 अप्रैल की रात 2 बजे से 21 अप्रैल 2026 की शाम 5 बजे तक के 'पुलिस ट्रांसपोर्ट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट', जहांगीराबाद के सीसीटीवी फुटेज कोर्ट में पेश करें जिन्हें कोर्ट खुद देखेगा।
चीफ जस्टिस की डिविजनल बेंच ने ने यह भी स्पष्ट किया कि हिरासत में लिए गए तीनों कार्यकर्ता इस याचिका के लंबित रहने के दौरान राजस्थान की संबंधित अदालत में कानून के अनुसार अपनी उचित कानूनी कार्यवाही करने के लिए स्वतंत्र हैं।
तो अब अगली सुनवाई तक पुलिस कमिश्नर को इस मामले की पूरी जांच रिपोर्ट भी तैयार करनी है और कोर्ट में 27 अप्रैल को दूध का दूध और पानी का पानी होने वाला है।
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