UDISE, नीति आयोग की रिपोर्ट ने बताया शिक्षा और युवाओं का हाल, MP की हालत गंभीर!
देशभर में वक्त-वक्त पर शिक्षा व्यवस्था और युवाओं की बात होती है। UDISE और नीति आयोग जैसे संस्थान जब रिपोर्ट जारी करते हैं, तब बात और तेजी से सामने आती है। क्योंकि इन रिपोर्ट्स में सरकारी स्कूलों और युवाओं की जो हालत बताई जाती है, वो कई सवाल खड़े करती है।
AISHE 2023-24, UDISE+ 2024-25/2025-26, Economic Survey 2025-26 और नीति आयोग के आंकड़ों को मिलाकर देखें, तो शिक्षा और रोजगार की हालत देश में क्या है, ये ज्यादा अच्छे से समझ आता है।
क्या कहते हैं आंकड़े?
इन संस्थाओं के आंकड़ों को मिलाकर देखें, तो देश में 10 करोड़ से ज्यादा युवा उच्च शिक्षा से बाहर हैं। करीब 12 करोड़ बच्चे तो स्कूली शिक्षा पूरी नहीं कर रहे। यहां तक कि लगभग 8 करोड़ 70 लाख युवा शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण यानी NEET (Not in Education, Employment or Training) की कैटेगरी में आते हैं।
ये आंकड़े ज्यादा परेशान इसलिए करते हैं क्योंकि भारत में जन्मदर में गिरावट आ रही है। युवा आबादी अब धीरे-धीरे कम होने लगी है। लेकिन दूसरी तरफ फिर भी बच्चों और युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल रही है।
आंकड़े बताते हैं कि भारत की टोटल फर्टिलिटी रेट यानी TFR 2014 में 2.3 से घटकर 1.9 हो चुकी थी। जबकि 2026 से 2030 तक ये 1.8 के आसपास पहुंच सकती है। इसके अलावा 2031 से 2035 तक TFR 1.7 तक जाने का अनुमान है। यानी भारत रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से नीचे है।
Economic Survey 2025-26
आर्थिक सर्वेक्षण में PLFS यानी 'आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2023-24 पर आधारित आंकड़ों ने भी चिंता बढ़ाई है। PLFS के जरिए भारत सरकार देश में रोजगार और बेरोजगारी की स्थिति को मापने का काम करती है।
इसके मुताबिक 14-18 साल की उम्र के 44 फीसदी बच्चों ने इसलिए स्कूल छोड़ा, क्योंकि उन्हें परिवार की आय बढ़ाने के लिए काम करना था। जबकि 28 फीसदी बच्चों ने घरेलू कामों में लगे रहने की वजह से स्कूल छोड़ा। दूसरी तरफ 8 फीसदी बच्चों ने शिक्षा को जरूरी न मानते हुए स्कूल छोड़ दिया।
वहीं 1 फीसदी बच्चों ने स्कूल इसलिए छोड़ा क्योंकि वो उनके घर से बहुत दूर था। 19 फीसदी बच्चों ने गरीबी और परिवार की आर्थिक स्थिति के चलते स्कूल छोड़ा। UDISE+ 2025-26 के मुताबिक, देश में सरकारी स्कूलों की संख्या 2014-15 में 11.07 लाख से घटकर 2025-26 में 10.05 लाख रह गई है। यानी 1.02 लाख सरकारी स्कूल कम हो गए।
मध्य प्रदेश का क्या हाल?
UDISE+ के आंकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश में इसी दौरान लगभग 30,650 सरकारी स्कूलों की कमी हुई। देशभर में शिक्षकों के 48.10 लाख पद मंजूर हैं। जिसमें 40.63 लाख पदों पर ही शिक्षक हैं। बाकी पद खाली पड़े हैं। यानी लगभग 7.48 लाख शिक्षकों की कमी देशभर में है।
राज्यों में मध्य प्रदेश में शिक्षकों की वैकेंसी लगभग 19 फीसदी है। उत्तर प्रदेश 22%, उत्तराखंड 24%, त्रिपुरा 26%, मिजोरम 30% और बिहार 32% शिक्षकों के पद खाली हैं।
मध्य प्रदेश के स्कूलों का हाल
देशभर में 1 लाख से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं जहां सिर्फ एक शिक्षक है। इन स्कूलों में करीब 33.77 लाख बच्चे पढ़ रहे हैं। मध्य प्रदेश में 2,269 स्कूल ऐसे हैं जहां सिर्फ एक शिक्षक है। इन स्कूलों में लगभग 2.29 लाख बच्चे पढ़ रहे हैं। इसके अलावा देश में 5,663 स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी छात्र का एडमिशन नहीं हुआ।
नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 36 फीसदी सरकारी स्कूलों में 50 से कम छात्र हैं। वहां सिर्फ एक या दो शिक्षक हैं, जबकि मानक PTR 30:1 बताया गया है। यानी 30 छात्रों पर एक शिक्षक। Economic Survey 2025-26 के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों में सिर्फ 17 फीसदी स्कूल Secondary लेवल के हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 38 प्रतिशत है।
यानी शहरी क्षेत्रों में Secondary स्कूलों का अनुपात ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में दो गुने से ज्यादा है। मध्य प्रदेश की बात करें तो कक्षा 1 से 12 तक Retention Rate सिर्फ 32.3 फीसदी है। यानी 100 बच्चों में करीब 32 बच्चे ही 12वीं तक पहुंचते हैं।
UDISE+ 2024-25 के आंकड़ों की मानें तो कक्षा 1 से 5 तक 92.4 प्रतिशत छात्र पहुंचते हैं। लेकिन 5वीं के बाद आंकड़ा घटना शुरू होता है। 8वीं तक आते-आते छात्रों की संख्या 82.8 प्रतिशत रह जाती है। जबकि 10 तक ये आंकड़ा 62.9 प्रतिशत बचता है। 12वीं तक आते-आते छात्रों की संख्या महज 47.2 फीसदी बचती है। देश के स्कूलों में कुल 24.69 करोड़ छात्र हैं। लेकिन Primary लेवल के 10.44 करोड़ छात्रों की तुलना में, Higher Secondary में सिर्फ 2.76 करोड़ छात्र रह जाते हैं।
उच्च शिक्षा का हाल भी बुरा
लगभग 10.5 करोड़ युवा Higher Education GER coverage से बाहर हैं। Higher Education GER coverage का मतलब है, देश में कॉलेज जाने की उम्र वाले युवाओं में से, कितने प्रतिशत युवाओं ने वास्तव में उच्च शिक्षा में एडमिशन लिया है।
भारत का Higher Education GER 32 है। जो यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी और चीन जैसे देशों से काफी कम है। उच्च शिक्षा में खाली पड़े शिक्षकों के पद भी चिंता खड़ी करते हैं।
मध्य प्रदेश के 17 सरकारी विश्वविद्यालयों में 1,949 स्वीकृत पदों में से 1,585 पद खाली बताए गए हैं। यानी वैकेंसी करीब 81 फीसदी है। असिस्टेंट प्रोफेसर के 1,069 पदों में सिर्फ 276 पद भरे हैं। वहीं 93 विषयों में एक भी असिस्टेंट प्रोफेसर नहीं होने की बात सामने आई है।
5 विश्वविद्यालयों में एक भी असिस्टेंट प्रोफेसर नहीं
मध्य प्रदेश के पांच सरकारी विश्वविद्यालयों जिनमें राजा शंकर शाह विश्वविद्यालय, छिंदवाड़ा, क्रांतिवीर तात्या टोपे विश्वविद्यालय, गुना, क्रांतिसूर्य टंट्या भील विश्वविद्यालय, खरगोन, महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, छतरपुर और रानी अवंतीबाई लोधी विश्वविद्यालय, सागर का हाल भी बुरा है।
दावा है कि यहां एक भी नियमित असिस्टेंट प्रोफेसर नहीं है। दावा किया जा रहा है कि खरगोन विश्वविद्यालय में 140 स्वीकृत पदों में से एक भी पद नहीं भरा है। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर में 154 में से 68 पद खाली हैं। सरकारी कॉलेजों में लाइब्रेरियन के 582 पदों में से 346 पद खाली होने का भी आरोप है।
कांग्रेस उठा रही सवाल
इन आंकड़ों को लेकर कांग्रेस सरकार को घेर रही है। जीतू पटवारी (MP News) का कहना है कि भारत की युवा आबादी का हिस्सा लगातार घटने वाला है। तब सरकार को बताना चाहिए कि डेमोग्राफिक डिविडेंड को बचाने और उसे एजुकेशन डिविडेंड में बदलने के लिए क्या योजना है? हर बच्चे को स्कूल, हर युवा को उच्च शिक्षा और रोजगार के मौके देने होंगे। पटवारी का कहना है कि बच्चे स्कूल से बाहर हो रहे हैं, शिक्षकों के पद खाली हैं, सरकारी स्कूलों की संख्या घट रही है, तो Demographic Dividend अपने आप Education Dividend में नहीं बदल सकता।
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