द सूत्र की खबर के बाद जागा शिक्षा विभाग, 530 शिक्षकों को सैलरी जल्द
Atul Dwivedi | Sept 08, 2026, 19:51 IST
530 शिक्षकों को सैलरी जल्द
द सूत्र की खबर का एक बार फिर असर हुआ है। मध्यप्रदेश के 530 शिक्षकों की रुकी हुई सैलरी को लेकर शिक्षा विभाग ने बड़ा फैसला लिया है। लोक शिक्षण संचालनालय ने लंबित वेतन भुगतान के आदेश जारी किए हैं।
BHOPAL. द सूत्र की खबर का एक बार फिर असर हुआ है। हमने खबर दिखाई थी कि मध्यप्रदेश का स्कूल शिक्षा विभाग कुछ शिक्षकों की सैलरी दबाए बैठा है। इस खबर के बाद आखिरकार लोक शिक्षण संचालनालय ने शिक्षकों को सैलरी दिए जाने का आदेश जारी कर दिया है।
मामला मध्यप्रदेश के उन स्कूलों का है, जिन्हें शासन की तरफ से अनुदान मिलता है। इन स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों का आरोप था कि विभाग ने 5 महीने से सैलरी नहीं दी है। द सूत्र को इन शिक्षकों ने बताया था कि मई 2026 से इनकी सैलरी रुकी हुई है। और जिन शिक्षकों और कर्मचारियों की सैलरी रुकी है, उनकी संख्या लगभग 530 के आसपास है।
लोक शिक्षण संचालनालय (डीपीआई ) ने, अपने आदेश में कहा कि लंबित वेतन भुगतान 7 दिनों के अंदर किया जाए। संचालनालय ने ये भी कहा कि बिना किसी ठोस वजह के अगर सैलरी देने में देरी होती है। तो दोषी अधिकारी या कर्मचारी की जिम्मेदारी तय की जाएगी। संचालनालय का कहना है कि किसी भी हालत में राशि लैप्स नहीं होनी चाहिए।
द सूत्र को पता चला था कि इन शिक्षकों की सैलरी ये कहते हुए रोकी गई कि स्कूलों का पहले भौतिक सत्यापन (वेरिफिकेशन) करवाया जाएगा। वेरिफिकेशन करके सरकार ये देखना चाहती थी कि इन अनुदान प्राप्त स्कूलों में कुल कितने शिक्षक हैं।
कुल कितने बच्चे इन स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं ? लेकिन इन स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों का कहना था कि अगर विभाग को सत्यापन ही करना था, तो गर्मियों की छुट्टियों में क्यों नहीं किया ? अगर गर्मियों की छुट्टियों में ही सत्यापन कर लिया जाता तो न बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती, न ही किसी शिक्षक की सैलरी रुकती।
दावा किया जा रहा था कि विभाग के पास इन शिक्षकों की सैलरी देने के लिए फंड नहीं था। जबकि 600 से ज्यादा अनुदान प्राप्त स्कूल मध्यप्रदेश में चल रहे हैं, इनमें हजारों छात्र पढ़ते हैं। लेकिन सरकार बजट की कमी बताकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रही थी। बताया जा रहा है कि लोक शिक्षण संचालनालय मांग के आधार पर राशि बांटता है। इसके लिए हर साल भौतिक सत्यापन जरूरी होता है।
बता दें कि इन शिक्षकों की जॉइनिंग लगभग 30 साल पहले हुई थी। इसके बाद तत्कालीन दिग्विजय सिंह की सरकार ने इनकी सेवा शर्तों में संशोधन किया।
संशोधन करके ये प्रावधान किया गया कि इन शिक्षकों की सैलरी में 20 फीसदी की कटौती होगी। इसके बाद ये शिक्षक हाईकोर्ट पहुंचे और वहां से केस जीते। लेकिन फिर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, वहां भी इन शिक्षकों की ही जीत हुई।
द सूत्र ने 28 जुलाई 2026 को भी इस मुद्दे को उठाया था। हमने बताया था कि मध्यप्रदेश के 43 जिलों में 926 शिक्षक और कर्मचारी ऐसे हैं, जो सरकारी अनुदान के भरोसे हैं।
सबसे ज्यादा 155 कर्मचारी जबलपुर में, 93 ग्वालियर में और 79 कर्मचारी इंदौर में कार्यरत हैं। जबकि मुरैना में 76 शिक्षक हैं।
बाकी जिलों में इन शिक्षकों की संख्या 50 से कम है। इन सभी का वेतन पूरी तरह अनुदान पर निर्भर है। रक्षाबंधन बीत जाने के बाद भी इन कर्मचारियों और शिक्षकों को सैलरी नहीं मिली है। जिसकी वजह से इनके अंदर अब नाराजगी बढ़ती जा रही है।
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मामला क्या है ?
विभाग ने आदेश में क्या कहा ?
क्यों रुकी थी इनकी सैलरी ?
कुल कितने बच्चे इन स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं ? लेकिन इन स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों का कहना था कि अगर विभाग को सत्यापन ही करना था, तो गर्मियों की छुट्टियों में क्यों नहीं किया ? अगर गर्मियों की छुट्टियों में ही सत्यापन कर लिया जाता तो न बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती, न ही किसी शिक्षक की सैलरी रुकती।
दावा किया जा रहा था कि विभाग के पास इन शिक्षकों की सैलरी देने के लिए फंड नहीं था। जबकि 600 से ज्यादा अनुदान प्राप्त स्कूल मध्यप्रदेश में चल रहे हैं, इनमें हजारों छात्र पढ़ते हैं। लेकिन सरकार बजट की कमी बताकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रही थी। बताया जा रहा है कि लोक शिक्षण संचालनालय मांग के आधार पर राशि बांटता है। इसके लिए हर साल भौतिक सत्यापन जरूरी होता है।
30 साल पहले हुए थी जॉइनिंग
संशोधन करके ये प्रावधान किया गया कि इन शिक्षकों की सैलरी में 20 फीसदी की कटौती होगी। इसके बाद ये शिक्षक हाईकोर्ट पहुंचे और वहां से केस जीते। लेकिन फिर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, वहां भी इन शिक्षकों की ही जीत हुई।
द सूत्र ने पहले भी उठाया था मुद्दा
सबसे ज्यादा 155 कर्मचारी जबलपुर में, 93 ग्वालियर में और 79 कर्मचारी इंदौर में कार्यरत हैं। जबकि मुरैना में 76 शिक्षक हैं।
बाकी जिलों में इन शिक्षकों की संख्या 50 से कम है। इन सभी का वेतन पूरी तरह अनुदान पर निर्भर है। रक्षाबंधन बीत जाने के बाद भी इन कर्मचारियों और शिक्षकों को सैलरी नहीं मिली है। जिसकी वजह से इनके अंदर अब नाराजगी बढ़ती जा रही है।
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