शराब कारोबारी पिंटू भाटिया के परिवार की अग्रवाल डिस्टलरीज का केस, जस्टिस अभ्यंकर ने खुद को किया अलग
बता दें कि दो बार लिखित में आदेश जारी कर जस्टिस ने खुद को अलग किया है।
जस्टिस ने इस तरह खुद को किया अलग
यह केस सबसे पहले जून 2026 में जस्टिस विजय शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच में लगा था। इसके बाद 10 अगस्त को यह केस जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच में पहुंचा।
इस दौरान जस्टिस अभ्यंकर ने लिखित आदेश दिया कि इस केस को ऐसी दूसरी बेंच में लगाया जाए, जिसमें वे शामिल न हों।
इसके बावजूद 30 सितंबर को यह केस फिर उन्हीं की बेंच में लगा। उस दिन मामले की सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद 5 अक्टूबर को एक बार फिर केस जस्टिस अभ्यंकर की बेंच में पहुंच गया।
इस पर जस्टिस अभ्यंकर ने दोबारा लिखित आदेश जारी किया। उन्होंने कहा कि इस मामले को ऐसी दूसरी बेंच में लगाया जाए, जिसमें वे सदस्य न हों। इस तरह जस्टिस अभ्यंकर ने दो बार लिखित आदेश देकर खुद को इस केस से अलग किया।
पिंटू भाटिया का परिवार जुड़ा है अग्रवाल डिस्टलरीज से
बता दें कि अग्रवाल डिस्टलरीज कंपनी एचएस भाटिया ग्रुप की है। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) के रिकॉर्ड के मुताबिक, कंपनी में फिलहाल छह डायरेक्टर हैं। इनमें शराब कारोबारी पिंटू भाटिया के बेटे जयविंदर सिंह भाटिया और उनकी पत्नी गुरवीन कौर भाटिया शामिल हैं। इनके अलावा नवीन अग्रवाल, आकाश शिवहरे, मीना देवी राय और मानवेंद्र प्रताप सिंह भी कंपनी के डायरेक्टर हैं। कंपनी का ऑफिस इंदौर के विजय नगर में है।
कौन हैं पिंटू भाटिया
पिंटू भाटिया इंदौर के चर्चित शराब कारोबारियों में शामिल हैं। करीब पांच साल पहले इंदौर में शराब सिंडिकेट की बैठक के दौरान अर्जुन ठाकुर पर गोली चलने के मामले में भी उन्हें आरोपी बनाया गया था। इससे पहले साल 2017 में रीवा के चुरहट में शराब से जुड़े एक मामले में उनकी गिरफ्तारी हुई थी।
इसके अलावा इंदौर के पंजाब एंड सिंध बैंक से जुड़ी फर्जी बैंक गारंटी के मामले में भी ईओडब्ल्यू (EOW) के पास शिकायत पहुंची थी और इसकी जांच हो चुकी है।
अग्रवाल डिस्टलरीज का केस क्या है
बता दें कि अग्रवाल डिस्टलरीज की ओर से जयविंदर सिंह भाटिया ने हाईकोर्ट में यह याचिका दायर की है। इसमें मध्यप्रदेश शासन के कमर्शियल टैक्स विभाग और खरगोन के सीटीओ को पक्षकार बनाया गया है।
याचिका के मुताबिक, साल 2013 में कंपनी से हर महीने वैट रिटर्न लिया जाता था। इसके बाद 2016 में नियम आया कि जिन डीलर्स का तिमाही टैक्स सवा छह करोड़ रुपए है, उन्हें एडवांस टैक्स भरना होगा।
इसके बाद मई 2026 में कंपनी को नोटिस जारी किया गया। इसमें साल 2022-23 से 2025-26 तक के बकाया टैक्स और ब्याज के रूप में 62 लाख 46 हजार रुपए मांगे गए।
कंपनी ने इसी नोटिस को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। उसका कहना है कि वह नियमित रूप से टैक्स जमा कर रही है। इसके बावजूद मनमाने तरीके से नोटिस जारी किया गया। कंपनी का यह भी दावा है कि नोटिस जारी करने से पहले उनसे एक बार भी जवाब नहीं मांगा गया।
क्यों किसी केस से हटते हैं जस्टिस
आमतौर पर किसी जस्टिस के खुद को केस से अलग करने के पीछे कई वजहें हो सकती हैं। इनमें दो स्थितियां अहम मानी जाती हैं। पहली, जब जस्टिस का केस से जुड़े किसी पक्षकार से पहले से कोई परिचय या संबंध रहा हो। ऐसे में मामले की निष्पक्ष सुनवाई को लेकर कोई सवाल न उठे, इसलिए जस्टिस खुद को केस से अलग कर सकते हैं।
दूसरी स्थिति तब होती है, जब केस से जुड़ा कोई पक्षकार जस्टिस से संपर्क करने या उन्हें प्रभावित करने की कोशिश करे। यह मामला गंभीर माना जाता है। हालांकि, किसी जस्टिस के केस से हटने का मतलब यह नहीं है कि उनसे संपर्क करने या उन्हें प्रभावित करने की कोशिश हुई है।