इंदौर में एलआईजी से नौलखा तक एलिवेटेड कॉरिडोर को हाईकोर्ट की हरी झंडी, तकनीकी निगरानी के लिए हाईलेवल कमेटी गठित
हालांकि, हाईकोर्ट ने सरकार को कुछ जरूरी निर्देश भी दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि निर्माण के दौरान आने वाली तकनीकी परेशानियों की नियमित जांच और उनका समाधान करने के लिए बड़े अधिकारियों की एक कमेटी बनाई जाए। इसके अलावा सरकार को यह भी बताना होगा कि इस प्रोजेक्ट पर कुल कितना पैसा खर्च होगा और इसका काम कब तक पूरा होने की उम्मीद है। यह जानकारी सार्वजनिक करने के निर्देश दिए गए हैं।
दरअसल, अतुल सेठ ने इस एलिवेटेड कॉरिडोर को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका लगाई थी। इसमें सवाल उठाया गया था कि इस कॉरिडोर की जरूरत कितनी है। याचिका में एलिवेटेड कॉरिडोर बनाने के बजाय ट्रैफिक की समस्या दूर करने के लिए दूसरे विकल्प अपनाने की मांग की गई थी।
नौ चौराहों पर अलग-अलग फ्लाईओवर बनाने का दिया था सुझाव
याचिका लगाने वाले अतुल सेठ पेशे से चार्टर्ड इंजीनियर और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वे पहले इंदौर नगर निगम की रोड डिजाइन एंड डेवलपमेंट सेल और ब्रिज सेल के सदस्य रह चुके हैं। फिलहाल वे कलेक्टर की बनाई रोड सेफ्टी कमेटी के सदस्य भी हैं।
अतुल सेठ का कहना था कि एलआईजी चौराहे से नौलखा तक एक लंबा एलिवेटेड कॉरिडोर बनाने के बजाय अलग-अलग चौराहों पर फ्लाईओवर बनाए जाने चाहिए। उन्होंने इसके पीछे तर्क दिया कि इंदौर में ज्यादातर वाहन एबी रोड पर लगातार लंबी दूरी तक नहीं चलते। लोग एक या दो चौराहे पार करने के बाद दाएं या बाएं मुड़ जाते हैं। ऐसे में लंबा एलिवेटेड कॉरिडोर बनाने से ट्रैफिक की समस्या पूरी तरह दूर नहीं होगी।
उन्होंने सुझाव दिया था कि एमआर-9, एलआईजी, इंडस्ट्री हाउस, गिटार, पलासिया, गीता भवन, शिवाजी वाटिका, जीपीओ और नौलखा चौराहे पर अलग-अलग फ्लाईओवर या ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिससे ट्रैफिक बिना रुके निकल सके।
अतुल सेठ ने हाईकोर्ट से यह मांग भी की थी कि इस पूरे प्रोजेक्ट की तकनीकी जांच के लिए एक कमेटी बनाई जाए। इस कमेटी की जिम्मेदारी हाईकोर्ट के किसी मौजूदा या रिटायर्ड जज को दी जाए। साथ ही जब तक कमेटी अपनी रिपोर्ट नहीं दे देती, तब तक एलिवेटेड कॉरिडोर का निर्माण कार्य आगे न बढ़ाया जाए।
सर्वे रिपोर्टों को लेकर उठाए गए थे सवाल
याचिका में बताया गया कि एलिवेटेड कॉरिडोर बनाने की योजना साल 2018-19 में सामने आई थी। इसके बाद से ही इस प्रोजेक्ट की जरूरत को लेकर सवाल उठने लगे थे। अतुल सेठ के मुताबिक, राज्य सरकार के निर्देश पर एक्रोपोलिस इंस्टीट्यूट से ट्रैफिक सर्वे कराया गया था। इस सर्वे में बताया गया था कि एलिवेटेड कॉरिडोर बनने से ट्रैफिक जाम में ज्यादा कमी आने की उम्मीद नहीं है।
अतुल सेठ ने इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA) की एक दूसरी रिपोर्ट का भी हवाला दिया। उनके मुताबिक, 5 अप्रैल 2025 की इस रिपोर्ट में बताया गया था कि एमआर-9 से नौलखा तक नौ बड़े चौराहों पर अलग-अलग फ्लाईओवर और ट्रैफिक को बिना रुके निकालने की व्यवस्था बनाई जाए, तो यातायात में 42 प्रतिशत से ज्यादा सुधार हो सकता है। वहीं, प्रस्तावित एलिवेटेड कॉरिडोर से 10 प्रतिशत से भी कम फायदा होने का अनुमान लगाया गया था।
अतुल सेठ का आरोप था कि इन रिपोर्टों और तकनीकी सुझावों पर ठीक से विचार किए बिना ही सरकार ने प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने का फैसला कर लिया। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि प्रोजेक्ट पर आखिर कितना पैसा खर्च होगा, ट्रैफिक से जुड़े आंकड़े क्या कहते हैं और तकनीकी आपत्तियों को कैसे दूर किया जाएगा।
हालांकि, यहां यह समझना जरूरी है कि ये सभी आंकड़े और आरोप याचिका में अतुल सेठ की ओर से रखे गए थे। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इन दावों को पूरी तरह सही या साबित नहीं माना है।
राज्य सरकार ने बताया, भविष्य की जरूरतों को देखते हुए जरूरी है कॉरिडोर
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राहुल सेठी ने हाईकोर्ट में याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि एलिवेटेड कॉरिडोर बनाने की योजना सिर्फ आज के ट्रैफिक को देखकर नहीं बनाई गई है, बल्कि आने वाले समय में शहर की बढ़ती आबादी और वाहनों की संख्या को भी ध्यान में रखा गया है।
सरकार का कहना था कि एबी रोड इंदौर की सबसे प्रमुख सड़कों में से एक है। यहां गाड़ियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सड़क को और चौड़ा करने के लिए ज्यादा जगह भी नहीं बची है। ऐसे में एलिवेटेड कॉरिडोर बनने से मौजूदा छह लेन के अलावा चार नई लेन मिल जाएंगी। इससे ट्रैफिक का दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।
सरकार ने कोर्ट को यह भी बताया कि एलिवेटेड कॉरिडोर का प्रोजेक्ट भारतीय सड़क कांग्रेस (IRC) के नियमों और सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। वहीं, अतुल सेठ ने अलग-अलग चौराहों पर फ्लाईओवर बनाने का जो सुझाव दिया था, उसे लेकर भी सरकार ने कहा कि ऐसा करने में कई तकनीकी परेशानियां आ सकती हैं।
इंदौर उत्थान अभियान समिति ने भी किया परियोजना का समर्थन
इस मामले में इंदौर उत्थान अभियान समिति ने भी अपना पक्ष रखा। समिति ने एलिवेटेड कॉरिडोर का समर्थन करते हुए कहा कि इंदौर में ट्रैफिक की समस्या को लंबे समय तक कम करने के लिए यह प्रोजेक्ट जरूरी है।
समिति का कहना था कि अगर कम दूरी पर कई अलग-अलग फ्लाईओवर बनाए जाते हैं, तो वाहन चालकों को बार-बार ऊपर चढ़ना और नीचे उतरना पड़ेगा। जहां गाड़ियां फ्लाईओवर पर चढ़ेंगी या उससे नीचे उतरेंगी, वहां ट्रैफिक जाम की परेशानी बढ़ सकती है। इससे पेट्रोल-डीजल की खपत भी बढ़ सकती है और सड़क हादसों का खतरा भी हो सकता है।
समिति ने यह भी बताया कि अलग-अलग फ्लाईओवर बनाने से साइकिल चलाने वालों और धीमी रफ्तार से चलने वाले वाहनों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। उसके मुताबिक, लंबे एलिवेटेड कॉरिडोर से गाड़ियों को चलने के लिए ज्यादा जगह मिलेगी और ट्रैफिक को बेहतर तरीके से संभाला जा सकेगा।
वहीं, याचिका लगाने वाले अतुल सेठ ने समिति की इन दलीलों पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि जिन चौराहों पर अलग-अलग फ्लाईओवर बनाने का सुझाव दिया गया है, उनके बीच पर्याप्त दूरी है। इसलिए इन विकल्पों को खारिज करने के बजाय ट्रैफिक का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन करके यह तय किया जाना चाहिए कि शहर के लिए कौन-सी व्यवस्था ज्यादा फायदेमंद होगी।
हाईकोर्ट ने कहा, इंदौर को अतिरिक्त सड़क क्षमता की जरूरत
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और दस्तावेज देखने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि इंदौर में ट्रैफिक लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में गाड़ियों के चलने के लिए सड़क पर ज्यादा जगह की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने एक्रोपोलिस इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट का भी जिक्र किया। यह रिपोर्ट फरवरी से मार्च 2024 के बीच तैयार की गई थी। उस समय इंदौर में बीआरटीएस चल रहा था। अब बीआरटीएस हटने से सड़क पर गाड़ियों के लिए अतिरिक्त जगह मिल गई है। हालांकि, शहर की आबादी और वाहनों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। इससे सड़क पर दबाव बढ़ता जा रहा है। इसलिए पुरानी रिपोर्ट के आंकड़ों को आज के ट्रैफिक के हिसाब से देखना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि अलग-अलग चौराहों पर छोटे फ्लाईओवर बनाने से कुछ समय के लिए राहत मिल सकती है, लेकिन इससे सड़क पर गाड़ियों के चलने के लिए कुल जगह नहीं बढ़ेगी। जब फ्लाईओवर से उतरने वाली गाड़ियां नीचे चल रहे ट्रैफिक में शामिल होंगी, तो वहां दोबारा जाम लगने की आशंका रहेगी।
कोर्ट ने सरकार की इस दलील को भी महत्वपूर्ण माना कि एलिवेटेड कॉरिडोर बनने से मौजूदा छह लेन के अलावा चार नई लेन मिलेंगी। इससे गाड़ियों को चलने के लिए ज्यादा जगह मिलेगी, जो भविष्य में बढ़ते ट्रैफिक को संभालने में काम आ सकती है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने अतुल सेठ की ओर से उठाए गए तकनीकी सवालों को पूरी तरह गलत नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि इन मुद्दों पर आगे चर्चा और तकनीकी जांच की जा सकती है। लेकिन सिर्फ इन आशंकाओं के आधार पर पूरे एलिवेटेड कॉरिडोर प्रोजेक्ट को रद्द करना सही नहीं होगा।
पीडब्ल्यूडी के मुख्य अभियंता की अध्यक्षता में बनेगी हाईलेवल कमेटी
निर्णय का महत्वपूर्ण पहलू परियोजना की तकनीकी निगरानी के लिए उच्चस्तरीय समिति का गठन है। हाईकोर्ट ने लोक निर्माण विभाग (PWD) के मुख्य अभियंता की अध्यक्षता में समिति गठित करने के निर्देश दिए हैं।
समिति में निम्नलिखित सदस्य शामिल होंगे:
- लोक निर्माण विभाग के दो सदस्य।
- इंदौर विकास प्राधिकरण के दो सदस्य।
- एसजीएसआईटीएस, इंदौर के दो सदस्य।
- याचिकाकर्ता अतुल सेठ।
- इंदौर उत्थान अभियान समिति के दो सदस्य।
हाईकोर्ट ने कहा है कि इस कमेटी में शामिल सदस्यों के पास सिविल या स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में बीई या बीटेक की डिग्री होना जरूरी है। एसजीएसआईटीएस की ओर से चुने गए अनुभवी प्रोफेसरों को छोड़कर बाकी सदस्यों के पास पुल बनाने के काम का अनुभव भी होना चाहिए।
इस कमेटी की जिम्मेदारी एलिवेटेड कॉरिडोर के निर्माण कार्य की नियमित निगरानी करना होगी। निर्माण के दौरान अगर कोई तकनीकी परेशानी आती है, तो कमेटी उसकी जांच करेगी और समस्या को दूर करने के लिए पीडब्ल्यूडी को सलाह देगी।
हर महीने होगी निर्माण कार्य की समीक्षा
हाईकोर्ट ने कहा है कि यह कमेटी हर महीने कम से कम एक बार एलिवेटेड कॉरिडोर के निर्माण कार्य की समीक्षा करेगी। जरूरत पड़ने पर इससे ज्यादा बैठकें भी की जा सकेंगी। बैठक कब होगी, इसकी तारीख पीडब्ल्यूडी के मुख्य अभियंता बाकी सदस्यों की सुविधा को ध्यान में रखकर तय करेंगे।
कमेटी में किसी मुद्दे पर सभी सदस्यों की राय एक जैसी नहीं होती है, तो बहुमत के आधार पर फैसला लिया जाएगा। कोर्ट ने सभी सदस्यों से कहा है कि वे आपसी मतभेदों को अलग रखकर काम करें। उनका मकसद इंदौर की ट्रैफिक समस्या का बेहतर समाधान निकालना होना चाहिए।
इस व्यवस्था से एलिवेटेड कॉरिडोर के निर्माण पर लगातार नजर रखी जा सकेगी। साथ ही निर्माण के दौरान कोई तकनीकी परेशानी आती है, तो कमेटी उसकी समीक्षा करके समाधान निकालने में मदद करेगी।
परियोजना की कुल लागत और निर्माण अवधि सार्वजनिक करने के निर्देश
एलिवेटेड कॉरिडोर की लागत को लेकर उठाए गए सवालों पर भी हाईकोर्ट ने जरूरी निर्देश दिए हैं। याचिका लगाने वाले अतुल सेठ का कहना था कि साल 2019-20 से इस प्रोजेक्ट की लागत करीब 350 करोड़ रुपए बताई जा रही थी। लेकिन समय के साथ प्रोजेक्ट में हुए बदलाव और अतिरिक्त कामों के कारण यह खर्च बढ़कर 700 से 750 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। उन्होंने यह आशंका भी जताई कि बिजली की लाइनें और दूसरी सुविधाएं शिफ्ट करने का खर्च इसमें शामिल नहीं किया गया है।
हालांकि, ये आंकड़े अतुल सेठ के दावे थे। हाईकोर्ट ने यह तय नहीं किया कि प्रोजेक्ट की असली लागत कितनी होगी। लेकिन कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे बताएं कि एलिवेटेड कॉरिडोर बनाने में कुल कितना पैसा खर्च होगा और इसका काम कब तक पूरा होने की उम्मीद है। यह जानकारी सार्वजनिक करनी होगी।
हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि एलिवेटेड कॉरिडोर बनाना राज्य सरकार का नीतिगत फैसला है। यानी सरकार ने अपनी योजना और जरूरतों को देखते हुए यह निर्णय लिया है। जब तक यह साबित नहीं होता कि फैसला गलत नीयत से लिया गया है, कानून के खिलाफ है या इसमें मनमानी हुई है, तब तक कोर्ट के पास इसमें दखल देने का पर्याप्त आधार नहीं है।
इस बात को समझाने के लिए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के तीन पुराने फैसलों का भी हवाला दिया। इनमें बाल्को एम्प्लॉइज यूनियन बनाम भारत सरकार, नर्मदा बचाओ आंदोलन बनाम भारत सरकार और टाटा सेल्युलर बनाम भारत सरकार के मामले शामिल हैं।
याचिका खारिज, लेकिन तकनीकी निगरानी जारी रहेगी
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने एलिवेटेड कॉरिडोर का निर्माण रोकने और उसकी जगह दूसरी योजना अपनाने की मांग ठुकरा दी। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए साफ कहा कि उसके आदेश में दिए गए सभी निर्देशों का पूरी तरह पालन किया जाए।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अगर आदेश का पालन करने में किसी तरह की परेशानी आती है, तो संबंधित पक्ष दोबारा कोर्ट में आवेदन कर सकते हैं।
इस फैसले के बाद इंदौर में एलआईजी चौराहे से नौलखा तक एलिवेटेड कॉरिडोर बनाने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि, निर्माण कार्य पर नजर रखने के लिए बनाई गई हाईलेवल कमेटी हर महीने इसकी समीक्षा करेगी और तकनीकी परेशानियों को दूर करने के लिए सलाह देगी। इसके अलावा सरकार को यह भी सार्वजनिक करना होगा कि प्रोजेक्ट पर कुल कितना पैसा खर्च होगा और इसका निर्माण कब तक पूरा होने की उम्मीद है।