इंदौर निगम अधिकारियों पर 1 लाख की कॉस्ट, हाईकोर्ट ने कहा- जनता के पैसों से मुकदमेबाजी करते हैं अधिकारी
हाईकोर्ट ने निगम को फटकार लगाई
इंदौर हाईकोर्ट ने बाफना अस्पताल से जुड़ी डिमांड के मामले में निगम को फटकार लगाई है। यह डिमांड नगर निगम ने निकाली थी। कोर्ट ने इसे अधिकारियों द्वारा शक्तियों का दुरुपयोग बताया है। साथ ही संबंधित अधिकारियों को 15 दिन में 1 लाख रुपए जमा कराने के आदेश दिए हैं। यह राशि संबंधित अधिकारी खुद वहन करेंगे। नगर निगम (Indore Municipal Corporation) इस राशि का भुगतान नहीं करेगा। हाईकोर्ट ने इसे अधिकारियों के लिए एक सबक बताया है। बाफना अस्पताल की ओर से अधिवक्ता जयेश गुरनानी ने मजबूती से पक्ष रखा।
यह है मामला
हाईकोर्ट के जस्टिस संदीप एन.भट्ट ने यह आदेश दिया है। मेसर्स बाफना हॉस्पिटल एंड ऑर्थोपेडिक्स रिसर्च सेंटर प्राइवेट लिमिटेड ने याचिका दायर की थी। इसमें इंदौर नगर निगम, निगमायुक्त और बिल्डिंग ऑफिसर को पक्षकार बनाया गया था। जोन क्रमांक दो के असिस्टेंट रेवेन्यू ऑफिसर को भी पक्षकार बनाया गया था।
निगम अधिकारियों ने वर्ष 2020 में ही विलोपित हो चुकी धाराओं के आधार पर आदेश दिया था। इसी आदेश के आधार पर बाफना अस्पताल के खिलाफ डिमांड निकाली गई थी। निगम ने इसके लिए 30 सितंबर 2026 को आदेश जारी किया था। अस्पताल ने याचिका में इस आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने विवादित आदेश रद्द कर दिया है।
आदेश वापस लेने की बात रखी
नगर निगम को इस मामले में अपनी गलती समझ आ गई थी। इसलिए निगम ने कोर्ट में विवादित आदेश वापस लेने की बात कही। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल आदेश वापस लेने से उदार दृष्टिकोण अपनाना उचित नहीं होगा। आदेश पारित करने में गंभीर कानूनी त्रुटि हुई थी। इससे न्यायालय का बहुमूल्य समय भी बर्बाद हुआ। हाईकोर्ट ने इन दोनों बातों को गंभीरता से लिया।
यह वैधानिक संस्थाओं की जिम्मेदारी
कोर्ट ने अपने आदेश में नगर निगम अधिनियम (Municipal Corporation Act) की तीन धाराओं का उल्लेख किया। इनमें धारा 143, 146 और 153 शामिल हैं। इन धाराओं को वर्ष 2020 में ही विलोपित किया जा चुका था। इसके बावजूद संबंधित अधिकारी ने इन्हीं धाराओं के आधार पर विवादित आदेश पारित किया। न्यायालय ने इस स्थिति पर गंभीर नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि नगर निगम जैसी वैधानिक संस्थाओं के अधिकारियों की जिम्मेदारी तय है। उन्हें अपने सामने आने वाले मामलों का फैसला मौजूदा कानून के अनुसार करना चाहिए। इसके लिए प्रचलित कानूनी प्रावधानों का पालन जरूरी है। निरस्त हो चुकी धाराओं के आधार पर आदेश पारित करना गंभीर मामला है। यह संबंधित जिम्मेदार अधिकारी की कानून के प्रति गंभीर अनभिज्ञता दर्शाता है।
जनता के पैसों से मुकदमेबाजी करते हैं अधिकारी
कोर्ट ने इस स्थिति को निराशाजनक और पीड़ादायक बताया। साथ ही भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने की चेतावनी दी। गलत आदेश के कारण फरियादी को कोर्ट आना पड़ा। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी कानूनी प्रावधानों की अनदेखी करके गलत आदेश पारित करते हैं। ऐसे आदेशों के कारण मुकदमेबाजी की स्थिति पैदा होती है। इससे न्यायालय का बहुमूल्य समय भी बर्बाद होता है। इस स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
वैधानिक संस्थाओं के अधिकारी अक्सर सार्वजनिक धन से मुकदमेबाजी करते हैं। गलत आदेशों के कारण होने वाली मुकदमेबाजी का आर्थिक भार सार्वजनिक कोष पर पड़ता है। कोर्ट ने कहा कि यह आर्थिक भार अनावश्यक रूप से सार्वजनिक कोष पर नहीं डालना चाहिए। हाईकोर्ट ने भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने की जरूरत बताई। साथ ही अधिकारियों को उनके वैधानिक दायित्वों के प्रति सजग करने पर जोर दिया। इसी उद्देश्य से न्यायालय ने 1 लाख रुपए की कॉस्ट लगाई है। इसमें से 75 हजार रुपए मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा होंगे। शेष 25 हजार रुपए फरियादी को दिए जाएंगे।