500 करोड़ की डेयरी अर्थव्यवस्था बर्बाद कर रहा सिस्टम, नदी को बना दिया नाला
ऐसे समझें पूरा मामला...
- NHRC सदस्य प्रियंक कानूनगो के पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड पर लापरवाही के आरोप।
- अधिकारियों की अनुपस्थिति पर कहा यह असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा है।
- परियट क्षेत्र की डेयरियों से लगभग 500 करोड़ सालाना कारोबार का दावा।
- 600-700 टन गोबर रोज निकलने के बावजूद CBG प्लांट की ठोस योजना नहीं।
- हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी अवैध डेयरी और पोल्ट्री फार्म नहीं हटे।
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने परियट नदी और डेयरी क्षेत्र के निरीक्षण के बाद पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड और प्रशासन पर गंभीर सवाल उठाए।
प्रियंक ने कहा कि 500 करोड़ रुपए की डेयरी अर्थव्यवस्था, हजारों मजदूरों और किसानों की आजीविका को बचाने के बजाय सिस्टम डेयरियों को हटाने की साजिश रच रहा है। वहीं हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद भी अवैध डेयरियों पर कार्रवाई नहीं होने से मामला और गंभीर हो गया है।
निरीक्षण में गायब रहे अधिकारी
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने परियट नदी और उससे जुड़े डेयरी क्षेत्रों के निरीक्षण के बाद मीडिया के सामने प्रशासनिक व्यवस्था पर तीखा हमला बोला।
प्रियंक ने साफ कहा कि पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के अधिकारियों को कई बार बुलाने के बावजूद वे न बैठक में पहुंचे और न ही मौके के निरीक्षण में शामिल हुए।
प्रियंक कानूनगो ने इसे गंभीर और खतरनाक लापरवाही बताते हुए कहा कि इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि डेयरी उद्योग और नदी प्रदूषण जैसे संवेदनशील मुद्दों को लेकर बोर्ड कितना असंवेदनशील हो चुका है। उन्होंने कहा कि जब जिम्मेदार विभाग ही मौके से गायब हों, तो पर्यावरण संरक्षण और मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा केवल कागजों तक सीमित रह जाती है।
500 करोड़ की डेयरी अर्थव्यवस्था
प्रियंक कानूनगो ने परियट क्षेत्र की डेयरी अर्थव्यवस्था को विलक्षण और अनूठा मॉडल बताया। उन्होंने कहा कि मात्र चार किलोमीटर के स्ट्रेच में प्रतिदिन लगभग दो से ढाई लाख लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है, जो किसी भी शहर के लिए असाधारण स्थिति है।
प्रारंभिक आकलन के अनुसार करीब 16 हजार मजदूर और उनके परिवार इस डेयरी उद्योग पर निर्भर हैं। इसके अलावा चारा, दाना, खली और पशु आहार उपलब्ध कराने वाले हजारों किसान भी इसी व्यवस्था से जुड़े हैं।
दूध सप्लायर, रिटेलर और घर-घर दूध पहुंचाने वाले लोगों की आजीविका भी इसी उद्योग पर आधारित है। उन्होंने कहा कि जबलपुर जैसे शहर को दूध के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में इन नौ गांवों की डेयरियों की बड़ी भूमिका है और सालाना लगभग 500 करोड़ रुपए का दूध कारोबार यहां से संचालित होता है।
सिस्टम ने अपशिष्ट का नहीं किया प्रबंधन
NHRC सदस्य ने सबसे ज्यादा नाराजगी इस बात पर जताई कि गोबर और पशु अपशिष्ट जैसे सामान्य बायोडिग्रेडेबल पदार्थों का भी वैज्ञानिक तरीके से निष्पादन नहीं हो पा रहा है। उन्होंने कहा कि प्रतिदिन लगभग 600 से 700 टन गोबर और बड़ी मात्रा में पशुओं का यूरिन निकलता है, जिसे परंपरागत कंपोस्टिंग तकनीक से 7 से 21 दिनों में जैविक खाद में बदला जा सकता था।
तकनीकी रूप से सक्षम होने का दावा करने वाली एजेंसियां इस दिशा में पूरी तरह विफल साबित हुई हैं। उन्होंने कहा कि बिना किसी भारी केमिकल प्रोसेस के इस समस्या का समाधान संभव था, लेकिन प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी और विभागीय उदासीनता ने परियत नदी को प्रदूषण के संकट में धकेल दिया।
डेयरियों को हटाना समाधान नहीं
प्रियंक कानूनगो ने डेयरियों को शहर से हटाने की नीति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि डेयरियों को लगातार एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट करना समस्या का समाधान नहीं है।
“आप पांच किलोमीटर आगे ले जाएंगे, फिर पांच किलोमीटर आगे ले जाएंगे… आखिर कितना आगे जाएंगे?” उन्होंने कहा कि जबलपुर में ऊर्जा आत्मनिर्भरता का बड़ा अवसर मौजूद है।
यदि शहर के ठोस कचरे और डेयरी अपशिष्ट को मिलाकर बड़े स्तर पर CBG (Compressed Bio Gas) प्लांट स्थापित किए जाएं, तो जबलपुर न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी कर सकता है, बल्कि आसपास के क्षेत्रों को भी ऊर्जा उपलब्ध करा सकता है।
प्रियंक कानूनगो ने अनुमान जताया कि शहर से निकलने वाले 600 से 1000 टन ठोस कचरे और डेयरी अपशिष्ट को मिलाकर 1500 से 2000 टन क्षमता का बड़ा CBG प्लांट विकसित किया जा सकता है।
नर्मदा में मिल रहे खुले नाले, बड़ा खतरा
निरीक्षण के दौरान एक और गंभीर स्थिति सामने आई। प्रियंक कानूनगो ने बताया कि रेलवे के पुराने पंप हाउस के पास खुले नाले बह रहे हैं, जिनमें मल-मूत्र मिला हुआ है। यह गंदा पानी आगे जाकर नर्मदा नदी में मिल रहा है।
प्रियंक कानूनगो ने कहा कि ऐसी कई शिकायतें सामने आई हैं कि शहर के अनेक नाले सीधे नर्मदा में गिर रहे हैं। इसे उन्होंने मानव स्वास्थ्य के साथ “गंभीर खिलवाड़” बताया। उनका कहना था कि यदि समय रहते इन समस्याओं पर काम नहीं किया गया, तो आने वाले समय में यह सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकता है।
डेटा और अधिकारियों के बिना बैठक
प्रियंक कानूनगो ने बैठक के दौरान स्वास्थ्य विभाग और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों की अनुपस्थिति पर भी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि पर्याप्त डेटा उपलब्ध नहीं कराया गया और बिना तैयारी के बैठक आयोजित कर दी गई। इस कारण वे किसी ठोस निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सके।
प्रियंक कानूनगो ने स्पष्ट किया कि वे दोबारा जबलपुर आएंगे और जिला प्रशासन द्वारा तय समय पर पुनः बैठक करेंगे। उनका कहना था कि इतने गंभीर विषय पर आधे-अधूरे तथ्यों के आधार पर निर्णय नहीं लिया जा सकता।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी नहीं हुई कार्रवाई
मामला पहले से ही मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में लंबित है। मई 2025 में हाईकोर्ट ने शहर में अवैध रूप से संचालित डेयरी और पोल्ट्री फार्म हटाने के निर्देश दिए थे। याचिकाकर्ता अधिवक्ता मोहित वर्मा का आरोप है कि कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद जिला प्रशासन ने कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की।
परसवाड़ा-जमतरा मार्ग पर अवैध डेयरी और पोल्ट्री फार्मों के कारण भारी जाम, टूटी सड़कें, गंदगी और दुर्गंध जैसी समस्याएं लगातार बनी हुई हैं। भारी वाहनों की आवाजाही से सड़कें खराब हो रही हैं और स्थानीय लोगों का वहां से निकलना मुश्किल हो चुका है।
अब स्थिति यह है कि हाईकोर्ट में मामला पहुंचने, जिला कलेक्टर को नोटिस जारी होने और प्रशासनिक बैठकों के बावजूद राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के सदस्य को सार्वजनिक रूप से इतनी कड़ी टिप्पणी करनी पड़ी।
इससे साफ संकेत मिलते हैं कि परियट नदी, डेयरी उद्योग और शहर के पर्यावरण से जुड़ा यह मामला अब केवल स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और मानव स्वास्थ्य से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है।
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