जज की टिप्पणियों से आहत महिला वकील ने CJ से लगाई गुहार, एमपी हाईकोर्ट में बेंच-बार में टकराव
News in short
- महिला अधिवक्ता ने जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया की टिप्पणियों पर सवाल उठाए हैं।
- अग्रिम जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान विवाद हुआ।
- पैरिटी के आधार पर जमानत न मिलने पर आपत्ति जताई गई।
- प्रतिवेदन देकर मुख्य न्यायाधीश से प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग है।
- सुप्रीम कोर्ट पहले ही न्यायिक संयम पर सख्त निर्देश दे चुका है।
News in detail
जबलपुर हाईकोर्ट में बेंच और बार के बीच टकराव की स्थिति सामने आई है। अधिवक्ता डॉली सोनी ने चीफ जस्टिस को प्रतिवेदन सौंपकर आरोप लगाया है कि सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियां न्यायिक गरिमा के अनुरूप नहीं थीं।
महिला अधिवक्ता ने चीफ जस्टिस से जस्टिस जीएस अहलूवालिया की शिकायत की है। यह मामला अब सिर्फ एक केस तक सीमित नहीं रहकर न्यायिक व्यवहार पर व्यापक बहस का कारण बन गया है।
अग्रिम जमानत याचिका की सुनवाई से शुरू हुआ विवाद
दरअसल, यह विवाद एक अग्रिम जमानत याचिका (MCRC No. 18067/2026) से जुड़ा है। इसमें 67 वर्षीय विजय शंकर कनकने ने राहत की मांग की थी। उन पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 के तहत मामला दर्ज है।
अधिवक्ता का कहना है कि इसी मामले में अन्य तीन सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी थी, ऐसे में समानता के सिद्धांत के तहत इस आवेदक को भी राहत मिलनी चाहिए थी।
कोर्ट में कमेंट बने विवाद की जड़
प्रतिवेदन के अनुसार इस मामले की सुनवाई जस्टिस जीएस अहलूवालिया की कोर्ट में चल रही थी। सुनवाई के दौरान माहौल उस समय तनावपूर्ण हो गया जब अदालत ने मामले को खारिज करने का संकेत दिया।
आरोप है कि पैरिटी जैसे महत्वपूर्ण आधार पर विचार नहीं किया गया और सुनवाई के दौरान कुछ व्यक्तिगत टिप्पणियां की गईं, जिससे अधिवक्ता स्वयं को आहत महसूस करने लगीं। स्थिति ऐसी बनी कि याचिकाकर्ता को अपनी याचिका वापस लेनी पड़ी।
कानूनी पक्ष क्या सच में बनता था मामला?
अधिवक्ता ने अपने प्रतिवेदन में केस के मेरिट पर भी सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि धारा 108 (आत्महत्या के लिए उकसाने) का मामला तब बनता है जब आत्महत्या की घटना हो, जबकि इस मामले में शिकायतकर्ता जीवित है।
इसके अलावा, एफआईआर दर्ज होने में लगभग तीन महीने की देरी को भी संदेहास्पद बताया गया है, जिससे पूरे मामले की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह खड़े होते हैं।
पेशेवर गरिमा के खिलाफ हुए कॉमेंट- महिला अधिवक्ता
प्रतिवेदन में विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया गया है कि सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियां एक महिला अधिवक्ता के सम्मान के अनुरूप नहीं थीं। उन्होंने इसे न केवल व्यक्तिगत बल्कि पेशेवर गरिमा का भी मुद्दा बताया है और इस पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।
चीफ जस्टिस से हस्तक्षेप की मांग
अधिवक्ता ने मुख्य न्यायाधीश से इस पूरे मामले में प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग की है। साथ ही, न्यायिक आदेशों में एकरूपता बनाए रखने और कोर्ट में अधिवक्ताओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की अपील की गई है।
जजमेंट दे, जजमेंटल न बनें- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट पहले ही न्यायिक संयम (Judicial Restraint) को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश दे चुका है। साल 2021 के एक अहम मामले (Election Commission vs M. Vijayabhaskar) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि न्यायाधीशों को अनावश्यक और कठोर मौखिक टिप्पणियों से बचना चाहिए।
हाल ही में भी शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट्स को चेताया है कि ऐसी टिप्पणियां न्यायिक व्यवस्था के लिए दमन का औजार न बन जाएं।
कमेंट बन रहे हैं नया संकट
पूरा घटनाक्रम एक गंभीर सवाल खड़ा करता है कि क्या अब न्यायालयों में आदेश से ज्यादा टिप्पणियां विवाद का कारण बन रही हैं? अब वकील यही कहते नजर आ रहे हैं कि ऑर्डर्स से डर नहीं लगता साहब, कमेंट से लगता है”।
यह मामला फिलहाल कानूनी गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है और आने वाले दिनों में इस पर प्रशासनिक या न्यायिक स्तर पर कोई बड़ा निर्णय सामने आ सकता है।
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