NSA जैसे गंभीर आदेश पर भी बिना जांच के साइन कर रहे IAS, IPS? HC ने खड़े किए सवाल
समझें क्या है पूरा मामला...
- जबलपुर कलेक्टर ने दो लोगों के खिलाफ NSA आदेश जारी किया था।
- पुलिस ने 20 आपराधिक मामलों और दो प्रतिबंधात्मक कार्रवाई का हवाला दिया।
- पुलिस रिकॉर्ड में कई पुराने बरी मामलों को लंबित बताया गया।
- TI सहित CSP, ASP और SP सहित कलेक्टर ने फाइल में गलती नहीं जांची
- हाई कोर्ट ने विवेक का इस्तेमाल ही नहीं होने पर आदेश रद्द किया।
जबलपुर हाई कोर्ट ने NSA के तहत जारी निरोध आदेश रद्द करते हुए जबलपुर की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर दिया है। कोर्ट को पुलिस रिकॉर्ड में गंभीर गलतियां मिलीं। पुलिस से कलेक्टर तक फाइल उसी दिन पहुंची।
कोर्ट ने कहा की आदेश को करने में विवेक का इस्तेमाल ही नहीं किया गया। मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक अग्रवाल की डिविजन बेंच में हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता निखिल तिवारी ने पैरवी की।
NSA आदेश पर हाईकोर्ट ने उठाया सवाल
मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अविनंद्र कुमार सिंह की डिविजन बेंच में हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता निखिल तिवारी ने पैरवी की। राज्य की ओर से अधिवक्ता अभिषेक सिंह ने पक्ष रखा।
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि पुलिस रिकॉर्ड में बताए गए कई मामले पुराने थे। कई मामलों में आरोपी पहले ही बरी हो चुके थे। कोर्ट ने रिकॉर्ड और पेश किए गए फैसलों की जांच के बाद पुलिस की जानकारी में गंभीर गलतियां पाईं।
कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि थाना प्रभारी से लेकर एडिशनल एसपी और एसपी तकने फाइल की गलतियां नहीं जांची। इसके बाद कलेक्टर ने भी बिना विवेक का इस्तेमाल किए आदेश साइन कर दिया।
पुलिस की रिपोर्ट से कलेक्टर तक उसी दिन पहुंची फाइल
कोर्ट के अनुसार CSP गोहलपुर ने 6 जनवरी को 20 मामलों और दो प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की रिपोर्ट दी। यह रिपोर्ट उसी दिन अतिरिक्त एसपी ने एसपी को भेजी।
एसपी ने भी इसे उसी दिन कलेक्टर को भेज दिया। इसके बाद कलेक्टर ने 6 जनवरी को ही NSA का निरोध आदेश जारी कर दिया। कोर्ट ने रिपोर्ट और पत्राचार के क्रम के साथ उनकी भाषा को भी देखा। हाई कोर्ट ने कहा कि इस पूरे क्रम से non-application of mind सामने आता है।
क्या था पूरा मामला, जिसके बाद NSA लगाया गया
यह मामला राजेंद्र ठाकुर उर्फ छोटू और राजेश ठाकुर उर्फ भैया से जुड़ा है। दोनों के खिलाफ जबलपुर कलेक्टर ने 6 जनवरी 2026 को NSA लगाया था। पुलिस ने दोनों के खिलाफ 20 आपराधिक मामले और दो प्रतिबंधात्मक कार्रवाई बताई थी।
पुलिस के अनुसार 4 जनवरी 2026 को घमापुर थाना क्षेत्र में एक शिकायतकर्ता के घर पर देशी बम फेंका गया था। पुलिस ने इससे इलाके में भय और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की बात कही थी। इसी आधार पर NSA के तहत तीन महीने का निरोध आदेश जारी हुआ। बाद में 1 अप्रैल और 6 जुलाई को इसकी अवधि तीन-तीन महीने बढ़ाई गई।
14 लंबित मामलों में 11 पहले ही खत्म हो चुके थे
कलेक्टर के आदेश में कई मामलों को विचाराधीन बताया गया था। याचिकाकर्ताओं ने उन मामलों से जुड़े न्यायालयीन फैसले पेश किए। कोर्ट ने पाया कि 14 मामलों को लंबित बताया गया था। इनमें से 11 मामले पहले ही बरी होने के बाद खत्म हो चुके थे।
कुछ मामलों में 2004 से 2015 के बीच ही फैसले हो चुके थे। इसके बावजूद पुलिस रिकॉर्ड में इन्हें लंबित बताया गया। कोर्ट ने माना कि सही तथ्य सक्षम अधिकारी के सामने नहीं रखे गए।
कोर्ट ने गलत रिकॉर्ड को आदेश की बड़ी खामी माना
हाई कोर्ट ने कहा कि CSP गोहलपुर की रिपोर्ट में गलत तथ्य थे। अतिरिक्त एसपी और एसपी ने उस रिपोर्ट को आगे भेज दिया। कोर्ट के अनुसार रिकॉर्ड की पुष्टि नहीं की गई।
हाई कोर्ट ने कहा कि CCTNS के जरिए इन मामलों की जानकारी जांची जा सकती थी। इसके लिए मामूली प्रयास ही पर्याप्त था। लेकिन सही रिकॉर्ड सामने नहीं लाया गया। इससे NSA आदेश के लिए जरूरी तथ्यात्मक आधार प्रभावित हुआ।
कोर्ट ने पाया, विवेक का इस्तेमाल नहीं हुआ
हाई कोर्ट ने इस मामले में “non-application of mind” को महत्वपूर्ण माना है। कोर्ट ने कहा कि गलत जानकारी सक्षम अधिकारी के सामने रखी गई। इसके बाद वही जानकारी बिना पर्याप्त जांच के आगे बढ़ती रही।
कोर्ट ने माना कि NSA जैसी कार्रवाई में उपलब्ध सामग्री का सही मूल्यांकन जरूरी है। यहां तथ्यात्मक स्थिति अलग होने के बावजूद पुराने मामलों को लंबित बताया गया। इसलिए आदेश जारी करने की प्रक्रिया में आवश्यक विवेक का इस्तेमाल नहीं हुआ।
CCTV फुटेज पर भी कोर्ट के सामने आया तथ्य
कोर्ट के सामने 4 जनवरी 2026 की CCTV फुटेज का भी मुद्दा आया। याचिकाकर्ताओं की ओर से फुटेज में हेरफेर का आरोप लगाया गया था। कोर्ट को बताया गया कि एसपी जबलपुर ने इस मामले में पहले ही कार्रवाई की थी।
एसपी ने 24 जून 2026 को सब इंस्पेक्टर दिनेश गौतम को शो-कॉज नोटिस जारी किया था। कोर्ट ने मामले की पूरी सामग्री को आदेश की वैधता के संदर्भ में देखा।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Amina Begum बनाम State of Telangana फैसले का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि प्रिवेंटिव डिटेंशन असाधारण शक्ति है।
ऐसी शक्ति के इस्तेमाल में संबंधित अधिकारी को उपलब्ध सामग्री पर संतुष्ट होना जरूरी है। कोर्ट को यह भी देखना होता है कि जरूरी तथ्यों पर विवेक लगाया गया या नहीं। इस मामले में हाई कोर्ट को ऐसा आवश्यक विवेक इस्तेमाल होता हुआ नहीं मिला।
हाई कोर्ट ने NSA का निरोध आदेश रद्द किया
हाई कोर्ट ने पाया कि पुलिस रिकॉर्ड में बताई गई स्थिति वास्तविक न्यायालयीन रिकॉर्ड से अलग थी। 14 मामलों को लंबित बताया गया था, लेकिन 11 मामले पहले ही खत्म हो चुके थे। सही तथ्य सक्षम अधिकारी के सामने नहीं रखे गए थे।
कोर्ट ने इसे non-application of mind मानते हुए 6 जनवरी 2026 का NSA निरोध आदेश रद्द कर दिया। दोनों याचिकाएं मंजूर करते हुए हाई कोर्ट ने मामले का निपटारा कर दिया।
ये खबरें भी पढ़ें...
शादी के बाद से ही पति की 25% इनकम पर पत्नी का हक, भरण पोषण में नहीं होगा मोलभाव
लोकायुक्त-EOW बने भ्रष्टाचार का अड्डा, हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी
एमपी हाईकोर्ट के नए चीफ जस्टिस बने अल्पेश कोगजे, कहा-जनता की आवाज है प्राथमिकता
हायर एजुकेशन कमिश्नर प्रबल सिपाहा हाईकोर्ट में तलब, नहीं तो दंडात्मक कार्यवाही