जबलपुर हाईकोर्ट की नई पहल, अब अपील बहाली से पहले करनी होगी समाज सेवा
समझें क्या है पूरा मामला
- जबलपुर हाईकोर्ट ने अपील बहाली के मामलों में नई पहल शुरू की है।
- अब केवल कास्ट लगाने की जगह समाज सेवा का सुझाव दिया जा रहा है।
- ताजा आदेश में वकील को बाल निकेतन जाकर बच्चों के साथ समय बिताना होगा।
- वकील को खाद्य सामग्री ले जाकर सेवा करने के बाद रिपोर्ट भी देनी होगी।
- कोर्ट का मानना है कि इससे सोशल ऑडिट और सामाजिक जिम्मेदारी दोनों मजबूत होंगे।
जबलपुर हाईकोर्ट की जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी.पी. शर्मा की डिविजनल बेंच ने अपील बहाली के मामलों में नई पहल शुरू की है। अब केवल जुर्माना लगाने के बजाय वकीलों को समाज सेवा करने का सुझाव दिया जा रहा है।
ताजा आदेश में वकील को राजकुमारी बाई बाल निकेतन जाकर बच्चों के साथ समय बिताने और खाद्य सामग्री देने के बाद रिपोर्ट पेश करने को कहा गया है।
हाईकोर्ट ने अपील बहाली के मामलों में अपनाया नया रास्ता
जबलपुर हाईकोर्ट की जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी.पी. शर्मा की डिविजनल बेंच ने बहाली के मामलों में नई परंपरा शुरू की है। पहले ऐसे मामलों में आमतौर पर 500 रुपए से लेकर 5 हजार रुपए तक की कास्ट लगाई जाती थी।
अब कोर्ट समाज सेवा को प्राथमिकता दे रहा है। अदालत का मानना है कि इससे समाज और जरूरतमंद लोगों दोनों को फायदा मिलेगा।
हाईकोर्ट आदेश में वकील को बाल निकेतन भेजा
ताजा मामला एमसीसी क्रमांक 1302/2026 का है। इसमें रमेश कुमार पटेल ने अपनी रिट अपील बहाल करने की मांग की थी। यह अपील पहले पैरवी नहीं होने के कारण खारिज हो गई थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि गलती जानबूझकर नहीं हुई थी। इसलिए अपील बहाल करने का रास्ता खोला गया।
दो हजार रुपए की सामग्री लेकर बच्चों के बीच जाएंगे
कोर्ट ने कास्ट लगाने के बजाय नया सुझाव दिया। आवेदक के वकील को राजकुमारी बाई बाल निकेतन, शास्त्री ब्रिज, जबलपुर जाने को कहा गया। वहां करीब दो हजार रुपए की खाद्य सामग्री, फल या स्नैक्स लेकर जाना होगा। इसके बाद बच्चों और वहां रहने वाले लोगों के साथ एक घंटा बिताना होगा।
कोर्ट ने कहा, यह सजा नहीं है
जस्टिस आनंद पाठक की बेंच ने साफ कहा कि यह आदेश दंड नहीं है। इसका उद्देश्य समाज सेवा की भावना बढ़ाना है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे कार्य से जरूरतमंद बच्चों के चेहरे पर मुस्कान आएगी। साथ ही समाज को भी सकारात्मक संदेश मिलेगा।
15 दिन में देनी होगी रिपोर्ट
अदालत ने वकील को 15 दिन के भीतर अपनी यात्रा की रिपोर्ट देने को कहा है। रिपोर्ट में वहां की स्थिति और अपने अनुभव भी बताने होंगे। यदि कोई सुधार का सुझाव हो तो उसे भी शामिल किया जाएगा। हलफनामा दाखिल होने के बाद अपील पूरी तरह बहाल मानी जाएगी।
सोशल ऑडिट को बताया समय की जरूरत
आदेश में हाईकोर्ट ने सोशल ऑडिट की अवधारणा पर भी जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर, वकील, चार्टर्ड अकाउंटेंट, शिक्षक और अधिकारी समय निकालकर ऐसे संस्थानों का दौरा करें। इससे वहां रहने वाले बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और दिव्यांग लोगों की वास्तविक स्थिति सामने आएगी।
संस्थानों की जवाबदेही भी बढ़ेगी
कोर्ट ने कहा कि कई बार ऐसे संस्थानों में रहने वालों के साथ दुर्व्यवहार की शिकायतें आती हैं। यदि समाज नियमित रूप से वहां पहुंचेगा तो प्रबंधन भी अधिक जिम्मेदार रहेगा। इसी सोच के साथ कोर्ट ने आदेश की प्रति महिला एवं बाल विकास विभाग, सामाजिक न्याय विभाग और हाईकोर्ट की किशोर न्याय समिति को भी भेजने के निर्देश दिए हैं।
पहले भी दिया था ऐसा ही आदेश
यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले 2 जुलाई 2026 को जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी.पी. शर्मा की डिविजनल बेंच ने एमसीसी क्रमांक 1741/2026 में भी ऐसा ही आदेश दिया था। उस मामले में आवेदकों को शासकीय दृष्टिबाधित उच्च विद्यालय, अंधमूक बाईपास, जबलपुर जाकर करीब 2 हजार 500 रुपए की खाद्य सामग्री ले जाने और वहां एक घंटा बिताने का सुझाव दिया गया था।
कोर्ट ने वहां भी इसे दंड नहीं बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने की पहल बताया था। अब लगातार दो आदेश आने के बाद साफ है कि बहाली के मामलों में यह सोच अदालत की नई कार्यशैली का हिस्सा बन रही है।
रेफरेंस
1. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर
एमसीसी क्रमांक 1302/2026, आदेश दिनांक 6 जुलाई 2026
2. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर
एमसीसी क्रमांक 1741/2026, आदेश दिनांक 2 जुलाई 2026
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