जबलपुर का मास्टर प्लान अटका, हाईकोर्ट ने अफसरों से मांगा शपथ पत्र
समझें क्या है पूरा मामला
- जबलपुर का नया मास्टर प्लान लगातार देरी से अटका है।
- मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने देरी पर कड़ी नाराजगी जताई है।
- कोर्ट ने प्रमुख सचिव से शपथ पत्र मांगा है।
- टीएंडसीपी डायरेक्टर को भी अपना जवाब पेश करना होगा।
- मामले की अगली सुनवाई 25 सितंबर को निर्धारित है।
जबलपुर का नया मास्टर प्लान सालों से अटका है। हाईकोर्ट ने इस देरी पर सख्त रुख अपनाया है। प्रमुख सचिव और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग डायरेक्टर को शपथ पत्र देने को कहा गया है। कोर्ट ने पूछा है कि बार-बार आदेश के बाद भी प्लान क्यों नहीं आया। मामले की अगली सुनवाई 25 सितंबर को तय हुई है।
हाईकोर्ट क्यों हुआ सख्त
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में जबलपुर मास्टर प्लान से जुड़ी याचिका लंबे समय से सुनी जा रही है। अदालत ने अब सीधे प्रमुख सचिव और डायरेक्टर टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (T&CP – Town and Country Planning) को शपथ पत्र के जरिए जवाब देने को कहा है।
कोर्ट का सवाल साफ है। इतने निर्देशों के बावजूद नया मास्टर प्लान अब तक प्रकाशित क्यों नहीं हुआ। इस सवाल का जवाब अब अफसरों को लिखित में देना होगा। मामले की सुनवाई अब 25 सितंबर को होगी।
अप्रैल में भी मिला था आदेश
यह पहला मौका नहीं है जब कोर्ट ने इस मामले में सख्ती दिखाई हो। अप्रैल महीने की सुनवाई में भी हाईकोर्ट ने हर हाल में मास्टर प्लान जमा करने का आदेश दिया था।
आदेश का पालन नहीं हुआ। इसके बाद हाईकोर्ट अवमानना नोटिस भी जारी कर चुका है। फिर भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। नया प्लान अब तक सामने नहीं आया है।
2008 से अटका है नया प्लान
जबलपुर का पुराना मास्टर प्लान 2008 से लागू था। इसकी अवधि 2021 में खत्म हो चुकी है। यानी करीब चार साल से शहर बिना नए मास्टर प्लान के चल रहा है।
साल 2014 में एक बड़ा बदलाव भी हुआ था। उस समय 125 गांव जबलपुर नगर निगम की सीमा में शामिल किए गए थे। लेकिन इन इलाकों के लिए आज तक कोई अलग योजना या मास्टर प्लान तैयार नहीं हुआ है। इससे इन क्षेत्रों का व्यवस्थित विकास भी अटका हुआ है।
शहर के विकास पर असर
मास्टर प्लान न होने का सीधा असर शहर के विकास पर पड़ रहा है। नए प्रोजेक्ट्स की स्वीकृति में देरी हो रही है। इससे शहर का इंफ्रास्ट्रक्चर और विस्तार धीमा पड़ गया है।
योजना के अभाव में मनमाने निर्माण भी बढ़ रहे हैं। कई इलाकों में अवैध निर्माण खुलेआम हो रहे हैं। इससे सरकारी खजाने को भी नुकसान हो रहा है। स्वीकृतियां रुकने और अवैध निर्माण से करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान बताया जा रहा है।
किसने दायर की थी याचिका
इस मामले में याचिका नागरिक उपभोक्ता मंच की ओर से दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं में पी जी नाजपांडे और रजत भार्गव शामिल हैं। दोनों ने शहर के अव्यवस्थित विकास को लेकर अदालत का रुख किया था।
याचिकाकर्ताओं के वकील दिनेश उपाध्याय का कहना है कि कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों की लगातार अवहेलना हो रही है। इसी वजह से आम जनता और निर्माण क्षेत्र दोनों को परेशानी उठानी पड़ रही है।
आगे क्या होगा
अब पूरी नजर 25 सितंबर की सुनवाई पर टिकी है। अफसरों को इससे पहले शपथ पत्र दाखिल करना होगा। इसमें उन्हें देरी की वजह साफ तौर पर बतानी होगी। अगर जवाब संतोषजनक नहीं रहा, तो हाईकोर्ट और सख्त कदम उठा सकता है। इससे पहले भी अवमानना नोटिस जारी हो चुका है। ऐसे में अफसरों पर दबाव और बढ़ सकता है।
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