मेडिकल कॉलेज पर्ची घोटाले पर PIL रिजेक्ट, अखबार की खबर नहीं है कोई सबूत
समझें क्या है पूरा मामला...
- जबलपुर मेडिकल कॉलेज में करीब 70 लाख रुपए के पर्ची घोटाले के आरोप सामने आए।
- मामला पहले स्थानीय अखबारों में प्रकाशित खबरों से चर्चा में आया।
- इन्ही खबरों के आधार पर जबलपुर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर हुई।
- हाईकोर्ट ने कहा कि केवल समाचार कटिंग जनहित याचिका का आधार नहीं बन सकती।
- कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को अपने जनसेवा के काम और ठोस साक्ष्य बताने होंगे।
अखबार की कटिंग पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जबलपुर के नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज अस्पताल के चर्चित 70 लाख रुपए के कथित पर्ची घोटाले पर हाईकोर्ट ने अहम फैसला दिया है। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने साफ कहा कि केवल अखबारों में छपी खबरों के आधार पर जनहित याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि जनहित याचिका कोई सामान्य शिकायत नहीं है। इसे दाखिल करने के लिए भरोसेमंद दस्तावेज, आधिकारिक रिकॉर्ड और ठोस तथ्य जरूरी हैं।
कथित पर्ची घोटाले में क्या थे आरोप
स्थानीय खबरों के अनुसार मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती होने वाले सामान्य मरीज से दस रुपए की पर्ची फीस ली जाती है। आरोप था कि वर्ष 2020 से 2025 के बीच मरीजों की संख्या और जमा राशि का हिसाब मेल नहीं खाता। शुरुआत में इसे रिकॉर्ड की गलती माना गया।
बाद में खबरों में दावा किया गया कि जांच के दौरान यह कथित गबन का मामला निकला। बताया गया कि कई वर्षों तक यह गड़बड़ी चलती रही और रकम करीब 70 लाख रुपए तक पहुंच गई।
अखबार की खबर के आधार पर दायर हुई थी जनहित याचिका
याचिकाकर्ता अभिषेक पाठक ने समाचार पत्रों में प्रकाशित रिपोर्ट को आधार बनाकर पहले मेडिकल कॉलेज प्रबंधन और लोकायुक्त को शिकायत दी। इसके बाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि याचिका के साथ ऐसा कोई आधिकारिक दस्तावेज नहीं था, जो आरोपों की पुष्टि करता हो। आरटीआई से जुटाई गई जानकारी भी रिकॉर्ड पर पेश नहीं की गई।
जनहित याचिका लगाने वालों के लिए भी तय हैं नियम
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जनहित याचिका दायर करने वाला व्यक्ति केवल शिकायतकर्ता नहीं होना चाहिए। उसे यह भी बताना होगा कि उसने समाज और जनहित के लिए क्या काम किए हैं। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के नियमों में याचिकाकर्ता की सामाजिक पहचान, जनसेवा की पृष्ठभूमि और सार्वजनिक कार्यों का उल्लेख जरूरी है। इस मामले में ऐसी जानकारी नहीं दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला
हाईकोर्ट ने कहा कि समाचार पत्रों की रिपोर्ट अपने आप में अंतिम साक्ष्य नहीं होती। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि प्रेस रिपोर्ट को स्वतंत्र साक्ष्य से साबित करना जरूरी होता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि जनहित याचिका का उपयोग केवल चर्चित खबरों के आधार पर नहीं किया जा सकता। पहले तथ्यों की पुष्टि जरूरी है।
आरटीआई और दस्तावेजों के बिना नहीं मिलेगी राहत
खंडपीठ ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को किसी घोटाले की जानकारी मिलती है, तो पहले संबंधित विभाग से रिकॉर्ड हासिल करना चाहिए। जरूरत होने पर आरटीआई के जरिए जानकारी ली जा सकती है। उसके बाद यदि अनियमितता साबित होती है, तभी मजबूत दस्तावेजों के साथ अदालत का दरवाजा खटखटाया जाना चाहिए।
याचिका खारिज, लेकिन आरोपों पर नहीं दी कोई टिप्पणी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस आदेश में कथित घोटाले के आरोपों की सच्चाई पर कोई फैसला नहीं दिया गया है। अदालत ने केवल यह माना कि प्रस्तुत जनहित याचिका कानूनी मानकों पर खरी नहीं उतरती। इसी आधार पर 27 जुलाई 2026 को रिट याचिका क्रमांक 28444/2026 को खारिज कर दिया गया।
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