JNKVV को हाईकोर्ट से बड़ा झटका, चारों अपीलें खारिज, रिटायर कर्मचारियों को 6% ब्याज के साथ देना होगा पिछला वेतन

Neel Tiwari | Oct 27, 2026, 19:05 IST
जबलपुर हाईकोर्ट ने JNKVV की चारों अपीलें खारिज कर रिटायर कर्मचारियों को पिछला वेतन 6 प्रतिशत ब्याज के साथ देने का आदेश बरकरार रखा।
Madhya Pradesh High Court dismisses four JNKVV appeals, upholding back wages with 6 percent interest for affected employees.
जबलपुर हाई कोर्ट ने जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय को बड़ा झटका दिया है। जस्टिस विवेक रुसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की बेंच ने विश्वविद्यालय की चार अपीलें खारिज कर दी हैं। ये अपीलें उन आदेशों के खिलाफ थीं, जिनमें कर्मचारियों को रिटायरमेंट और दोबारा नौकरी पर लौटने के बीच की अवधि का वेतन 6 प्रतिशत ब्याज के साथ देने को कहा गया था।

विश्वविद्यालय का कहना था कि इस अवधि में कर्मचारियों ने काम नहीं किया, इसलिए उन्हें वेतन नहीं दिया जाना चाहिए। लेकिन हाई कोर्ट ने पाया कि विश्वविद्यालय के प्रबंध मंडल ने कर्मचारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने के फैसले में ऐसी कोई तारीख तय नहीं की थी, जिसके आधार पर पुराने कर्मचारियों को इस लाभ से बाहर रखा जा सके। कोर्ट ने 26 अक्टूबर 2026 को अपना फैसला सुनाया।



कार्यभारित स्थापना से जुड़े कर्मचारियों का मामला

इस मामले को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि कर्मचारी किस तरह की व्यवस्था के तहत काम कर रहे थे। कार्यभारित स्थापना (Work-Charged Establishment) का मतलब ऐसी व्यवस्था से है, जिसमें कर्मचारियों का वेतन किसी खास काम, परियोजना या संबंधित कार्य के खर्च से जुड़ी व्यवस्था के तहत दिया जाता है। ऐसे कर्मचारियों की सेवा शर्तें नियमित कर्मचारियों से अलग हो सकती हैं।



इसी तरह, आकस्मिकता निधि (Contingency Fund) का मतलब उन खर्चों के लिए रखी गई राशि से है, जिनका भुगतान विभाग या संस्थान की तय वित्तीय व्यवस्था के तहत किया जाता है। विश्वविद्यालय का तर्क था कि ये कर्मचारी नियमित पदों पर नियुक्त नहीं थे, इसलिए उन पर नियमित कर्मचारियों जैसे नियम अपने आप लागू नहीं होते। हालांकि, इस मामले में कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि विश्वविद्यालय के प्रबंध मंडल के फैसले के बाद कर्मचारियों को बीच की अवधि का वेतन देने से रोका जा सकता था या नहीं।




पहले 60 साल में किया रिटायर, फिर उम्र बढ़ाने का फैसला लिया

राज्य सरकार ने 31 मार्च 2018 को अपने नियमित कर्मचारियों की रिटायरमेंट उम्र 60 से बढ़ाकर 62 साल कर दी थी। इसके बाद जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय ने भी 6 जून 2018 को अपने नियमित कर्मचारियों के लिए यह बदलाव लागू कर दिया।



जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय में कार्यभारित व्यवस्था के तहत काम करने वाले कर्मचारियों ने भी रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने की मांग की। विश्वविद्यालय के प्रबंध मंडल ने 20 जून 2018 को इस मांग पर सहमति जताई, लेकिन राज्य सरकार ने 30 अगस्त 2018 को प्रस्ताव मंजूर नहीं किया।



इसके बाद इन कर्मचारियों को 60 साल की उम्र पूरी होने पर रिटायर कर दिया गया। कर्मचारियों ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन उस समय उन्हें ऐसा कोई अंतरिम आदेश नहीं मिला, जिससे उनकी नौकरी जारी रह सके।



दोबारा नौकरी पर बुलाया, लेकिन बीच के समय का वेतन नहीं दिया

मामला चलने के दौरान विश्वविद्यालय (JNKVV) के प्रबंध मंडल ने 22 दिसंबर 2021 को कार्यभारित कर्मचारियों की रिटायरमेंट उम्र 62 साल करने का फैसला लिया। इसके बाद 21 अप्रैल 2022 को विश्वविद्यालय ने आदेश जारी कर कुछ कर्मचारियों को दोबारा नौकरी पर बुलाने की व्यवस्था की।



इसमें उन कर्मचारियों को शामिल किया गया, जिन्होंने तय तारीख तक 62 साल की उम्र पूरी नहीं की थी। लेकिन विश्वविद्यालय ने शर्त लगा दी कि नौकरी से बाहर रहने की अवधि का वेतन और दूसरे लाभ नहीं मिलेंगे।



कर्मचारी दोबारा काम पर लौट आए, लेकिन उन्होंने वेतन रोकने की इस शर्त को हाई कोर्ट में चुनौती दी। उनका कहना था कि वे काम करने के लिए तैयार थे, लेकिन विश्वविद्यालय ने ही उन्हें नौकरी से बाहर किया था।



सिंगल बेंच ने दिया था कर्मचारियों के पक्ष में फैसला

कर्मचारियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की एकलपीठ ने उनके पक्ष में फैसला दिया था। कोर्ट ने कहा था कि कर्मचारियों को रिटायरमेंट की तारीख से दोबारा नौकरी पर लौटने तक की अवधि का पिछला वेतन 6 प्रतिशत ब्याज के साथ दिया जाए।



इसके बाद विश्वविद्यालय ने इस फैसले के खिलाफ बड़ी बेंच में अपील की। विश्वविद्यालय की ओर से दलील दी गई कि कर्मचारियों ने इस अवधि में काम नहीं किया, इसलिए उन्हें वेतन देने का आदेश सही नहीं है।



विश्वविद्यालय ने यह भी कहा कि कर्मचारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने का फैसला बाद में लिया गया था और इसे पहले से लागू नहीं माना जा सकता। वहीं, कर्मचारियों की ओर से कहा गया कि वे अपनी मर्जी से काम से दूर नहीं रहे, बल्कि विश्वविद्यालय ने उन्हें रिटायर कर दिया था।



कुलपति ने अपने आदेश में ऐसी शर्त जोड़ दी, जो बोर्ड के फैसले में नहीं थी

हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने विश्वविद्यालय के प्रबंध मंडल के फैसले को ध्यान से देखा। कोर्ट ने पाया कि 22 दिसंबर 2021 के प्रस्ताव में कर्मचारियों की रिटायरमेंट उम्र 60 से बढ़ाकर 62 साल करने की मंजूरी दी गई थी।



लेकिन इस प्रस्ताव में ऐसी कोई तारीख तय नहीं की गई थी, जिसके आधार पर पहले रिटायर हो चुके कर्मचारियों को लाभ से बाहर किया जा सके। बाद में कुलपति के आदेश में यह शर्त जोड़ दी गई कि कर्मचारियों को नौकरी से बाहर रहने की अवधि का वेतन नहीं मिलेगा। हालांकि, इसके लिए कोई कट-ऑफ डेट तय नहीं की गई थी।



कट-ऑफ डेट (Cut-off Date) का मतलब वह तय तारीख है, जिसके आधार पर यह निर्धारित किया जाता है कि कौन व्यक्ति किसी योजना या लाभ का पात्र होगा और कौन नहीं। कोर्ट ने कहा कि जब प्रबंध मंडल ने अपने प्रस्ताव में ऐसी तारीख तय ही नहीं की थी, तो कुलपति अपनी ओर से यह शर्त नहीं जोड़ सकते थे।



काम नहीं तो वेतन नहीं की दलील क्यों नहीं आई काम?

विश्वविद्यालय की ओर से यह भी कहा गया कि कर्मचारियों ने बीच की अवधि में काम नहीं किया, इसलिए उन्हें उस समय का वेतन नहीं मिलना चाहिए। इसे कानूनी भाषा में 'नो वर्क, नो पे' (No Work, No Pay) कहा जाता है। इसका सामान्य अर्थ है कि कर्मचारी ने काम नहीं किया तो उसे वेतन नहीं मिलेगा।



लेकिन कर्मचारियों का कहना था कि उन्होंने खुद काम करने से इनकार नहीं किया था। विश्वविद्यालय ने ही उन्हें रिटायर कर दिया था। इसलिए उन्हें काम नहीं करने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।



कोर्ट ने मामले के तथ्यों और प्रबंध मंडल के फैसले को देखते हुए विश्वविद्यालय की अपीलों में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया।



चारों अपीलें खारिज, कर्मचारियों को वेतन देने का आदेश बरकरार

जस्टिस विवेक रुसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की बेंच ने विश्वविद्यालय की चारों अपीलें खारिज कर दीं। ये मामले सुधीर ठाकुर, जे.के. विश्वकर्मा, उमेश कुमार श्रीवास्तव और आर.के. तिवारी सहित संबंधित कर्मचारियों से जुड़े थे।



इससे पहले हाई कोर्ट की एकलपीठ ने कर्मचारियों को रिटायरमेंट और दोबारा नौकरी पर लौटने के बीच की अवधि का पिछला वेतन 6 प्रतिशत ब्याज के साथ देने का आदेश दिया था। डिवीजन बेंच ने उस आदेश में बदलाव करने से इनकार कर दिया।



फैसले का मुख्य आधार यह था कि प्रबंध मंडल ने रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने के प्रस्ताव में कोई कट-ऑफ डेट तय नहीं की थी और कुलपति को अपने स्तर पर वेतन रोकने की शर्त जोड़ने का अधिकार नहीं था।

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