जस्टिस उज्ज्वल भुइयां बोले-गंगा नदी पर चिकन बिरयानी खाने से कोई कानून नहीं रोकता
समझें क्या है पूरा मामला
- सुप्रीम कोर्ट जस्टिस उज्ज्वल भुइयां भोपाल पहुंचे थे।
- जस्टिस ने NLIU में मेमोरियल लेक्चर को संबोधित किया।
- उज्ज्वल ने गंगा किनारे बिरयानी मामले पर टिप्पणी की।
- भुइयां ने कहा ऐसा करना कोई अपराध नहीं है।
- उन्होंने गलत जमानत शर्तों पर चिंता जताई।
बिरयानी खाने के मामले पर टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां गंगा नदी पर बिरयानी खाने के मामले पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ऐसा करना अपराध नहीं है। इसके बावजूद कुछ युवाओं को तीन महीने जेल में रहना पड़ा। जमानत की गलत शर्तें असहमति जताने से रोकती हैं। यह बात उन्होंने NLIU के लेक्चर में कही।
गंगा नदी पर इफ्तार, फिर तीन महीने जेल
जस्टिस भुइयां ने नाव पर इफ्तार के दौरान चिकन बिरयानी खाने वाले युवाओं की गिरफ्तारी की आलोचना की। उन्होंने कहा कि गंगा नदी पर चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है। ऐसा कोई कानून नहीं है।
इसके बावजूद इन युवाओं को गिरफ्तार किया गया। उन्हें तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा। जस्टिस भुइयां ने खुद से सवाल किया कि क्या ऐसी गतिविधि के लिए लोगों को गिरफ्तार किया जा सकता है। साथ ही तीन महीने तक जमानत देने से इनकार भी किया जा सकता है।
जमानत शर्तें और असहमति का हक
जस्टिस भुइयां ने कहा कि अदालतें जमानत के लिए ऐसी शर्तें लगा रही हैं, जो व्यक्ति को असहमति जाहिर करने से रोकती हैं। उनके मुताबिक ऐसी चीज के लिए जमानत से इनकार नहीं होना चाहिए, जो कोई अपराध ही नहीं है। उन्होंने उन मामलों का भी जिक्र किया, जिनमें जमानत पाने वाले आरोपियों को सार्वजनिक सभाओं में शामिल होने से रोका गया। कुछ मामलों में सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से भी रोका गया। जस्टिस भुइयां ने कहा कि ऐसी शर्तें लोगों की बुनियादी आजादी और स्वतंत्रता को बुरी तरह कमजोर करती हैं।
बुलडोजर जस्टिस पर फैसला, पर देरी से
जस्टिस भुइयां ने सुप्रीम कोर्ट के 2024 के एक फैसले का जिक्र किया। इस फैसले में सजा के तौर पर अपनाए जाने वाले बुलडोजर जस्टिस को गलत ठहराया गया था। उन्होंने कहा कि यह फैसला स्वागत योग्य है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यह फैसला दो साल की देरी से आया। उनके मुताबिक तब तक कई परिवारों को नुकसान उठाना पड़ चुका था। यह टिप्पणी उन्होंने न्याय में देरी को लेकर की।
भोपाल से जुड़ा यह बयान
जस्टिस भुइयां का पूरा भाषण असहमति और अभिव्यक्ति की आजादी पर केंद्रित रहा। उन्होंने कहा कि अदालतों को जमानत शर्तें तय करते समय नागरिकों के मौलिक अधिकारों का ध्यान रखना चाहिए। शांतिपूर्ण विरोध किसी भी लोकतंत्र की बुनियादी पहचान है।
इस भाषण ने कानूनी और सामाजिक हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है। कई लोग इसे जमानत व्यवस्था और नागरिक अधिकारों पर पुनर्विचार की जरूरत के तौर पर देख रहे हैं।
छात्रों और पर्यावरण रक्षकों पर सख्ती
जस्टिस भुइयां ने कहा कि विश्वविद्यालयों में छात्र अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते हैं। इसके बावजूद उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है। कई छात्रों को निलंबित भी किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण की आवाज उठाने वालों के साथ भी अपराधियों जैसा व्यवहार हो रहा है। शांतिपूर्ण तरीके से मुद्दा उठाना अपराध नहीं है, यह उन्होंने बार-बार दोहराया।
वैश्विक मुद्दों पर विरोध जताना हक
जस्टिस भुइयां ने मुंबई के एक मामले का भी जिक्र किया। वहां गाजा-फिलिस्तीन के समर्थन में एक प्रदर्शन हुआ था। इस मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की एक टिप्पणी पर उन्होंने आश्चर्य जताया।
उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से किसी वैश्विक मुद्दे पर अपनी संवेदना या विरोध जताना हर नागरिक का हक है। इसे रोका नहीं जाना चाहिए, ऐसा उनका मानना है।
गंगा में वाराणसी बोट इफ्तार मामला क्या है?
यूपी के वाराणसी में गंगा नदी पर इफ्तार पार्टी का वीडियो वायरल हुआ था। वीडियो में नाव पर चिकन बिरयानी खाने का दावा किया गया था। अवशेष नदी में फेंकने का आरोप लगाया गया था। धार्मिक भावनाएं आहत होने की शिकायत पर कार्रवाई हुई। मार्च 2026 में पुलिस ने 14 युवकों को गिरफ्तार किया था। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने इस मामले पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि नदी में चिकन खाना अपराध नहीं है।
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