कंज्यूमर जस्टिस रिपोर्ट 2026: मप्र-राजस्थान टॉप-3 में, फिर भी सैकड़ों पद खाली, CG के हाल-बेहाल
CHAKRESH | Jul 24, 2026, 14:15 IST
consumer justice report india 2026
इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2026 के अनुसार आधे राज्य उपभोक्ता आयोगों में अध्यक्ष का पद खाली है। बजट 52% बढ़ा पर पूरा खर्च नहीं हुआ। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की स्थिति पर खास नजर।
इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2026 ने देश भर के उपभोक्ता आयोगों की क्षमता का पहला व्यापक अध्ययन किया है। इसके मुताबिक करीब आधे राज्य उपभोक्ता आयोगों में अध्यक्ष का पद ही खाली है। सदस्यों के भी करीब 40 प्रतिशत पद रिक्त पाए गए हैं। आयोगों का बजट तो 52 प्रतिशत बढ़ा, फिर भी औसतन 15 प्रतिशत पैसा खर्च नहीं हो सका। रैंकिंग में मध्य प्रदेश और राजस्थान शीर्ष तीन में रहे, जबकि छत्तीसगढ़ फिसड्डी राज्यों में शुमार है।
देश में उपभोक्ता शिकायतों के निपटारे के लिए बने आयोगों की संस्थागत सेहत को लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट सामने आई है। कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव, कॉमन कॉज़, दक्ष, विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी और TISS-प्रयास जैसे संगठनों के सहयोग से तैयार इस रिपोर्ट में देश के सभी राज्यों के उपभोक्ता आयोगों के बजट, ढांचे, मानव संसाधन और कामकाज का आकलन किया गया है। नतीजे बताते हैं कि 2019 के नए कानून के वादे अब तक जमीन पर पूरी तरह नहीं उतर पाए हैं।
1986 का पुराना कानून बदलकर 2019 में नया उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम लाया गया था। इसका मकसद शिकायतों का तेज और सस्ता निपटारा सुनिश्चित करना था। इसके तहत केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA - Central Consumer Protection Authority) बनाया गया, ई-दाखिल की सुविधा दी गई और मध्यस्थता को कानूनी दर्जा मिला। लेकिन सूचना का अधिकार (RTI- Right to Information) के जरिए जुटाए गए आंकड़े बताते हैं कि जमीनी अमल कमजोर रहा है।
राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (SCDRC — State Consumer Disputes Redressal Commission) में अध्यक्ष की नियुक्ति राज्य सरकार तीन सदस्यीय समिति की सिफारिश पर करती है। नियमों के मुताबिक पद खाली होने से छह महीने पहले ही प्रक्रिया शुरू करनी होती है, लेकिन 2025 में 35 में से 17 SCDRC में अध्यक्ष का पद खाली मिला।
सिर्फ बिहार और हरियाणा में ही अध्यक्ष और सदस्य, दोनों पद पूरी तरह भरे थे। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (DCDRC - District Consumer Disputes Redressal Commission) की तस्वीर भी जुदा नहीं है। देश के 775 जिलों के लिए केवल 685 जिला आयोग बन पाए हैं, यानी हर दस में से एक जिले में आयोग ही नहीं है।
रैंकिंग में मध्य प्रदेश 5.92 अंक के साथ दूसरे और राजस्थान 5.82 अंक के साथ तीसरे स्थान पर रहा, जबकि छत्तीसगढ़ 2.69 अंक के साथ काफी पीछे रह गया।
राज्य आयोग में सदस्यों के 60 प्रतिशत पद 2025 तक खाली थे, जबकि जिला आयोगों में अध्यक्ष के 20 प्रतिशत पद रिक्त रहे। राज्य के बजट में पिछले चार साल में 8 प्रतिशत की कटौती भी हुई और 2024-25 का बजट मात्र 3.98 करोड़ रुपए रहा।
यहां लगातार पांच साल अध्यक्ष मौजूद रहे और छह सर्किट बेंच के दम पर तीन साल से पुराने लंबित मामले सिर्फ 11 प्रतिशत ही रह गए। राज्य को 2021-22 से 2024-25 के बीच 149.19 करोड़ रुपए का बजट मिला।
राज्य आयोग में अध्यक्ष का पद 2025 में पूरी तरह यानी 100 प्रतिशत खाली था और सदस्यों के भी 75 प्रतिशत पद रिक्त थे। 27 जिला आयोगों के लिए अध्यक्ष के केवल 17 पद ही स्वीकृत हैं।
वर्ष 2021-22 से 2024-25 के बीच 21 राज्य आयोगों के बजट आवंटन में औसतन 52 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो कुल मिलाकर करीब 202 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। बावजूद इसके, 2024-25 में औसत उपयोग 85 प्रतिशत ही रहा। कुछ राज्यों ने बढ़ते मामलों और खाली पदों के बावजूद बजट में कटौती की, जिसमें मध्य प्रदेश और झारखंड शामिल हैं। इंडिया जस्टिस रिपोर्ट (IJR- India Justice Report) के मुताबिक बजट का पूरा इस्तेमाल न होना ढांचागत कमजोरी की ओर इशारा करता है।
2019 के कानून में मध्यस्थता को औपचारिक दर्जा दिया गया था ताकि आपसी सहमति से विवाद जल्दी सुलझें। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि 21 राज्यों में महज 163 प्रशिक्षित मध्यस्थ हैं और अब तक केवल 134 मामले ही मध्यस्थता के लिए भेजे गए हैं। पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और राजस्थान समेत छह बड़े राज्यों ने पिछले चार साल में एक भी मामला मध्यस्थता के लिए नहीं भेजा। लोक अदालतों को भेजे जाने वाले मामलों में भी भारी गिरावट दर्ज हुई है।
रिपोर्ट के मुताबिक अगर रिक्त पद, बजट की कम खपत और मध्यस्थता की उपेक्षा यूं ही जारी रही तो उपभोक्ता विवादों के निपटारे में देरी और बढ़ेगी। विशेषज्ञ समय पर नियुक्तियां, जिला आयोगों का पूर्ण गठन और आंकड़ों की पारदर्शी रिपोर्टिंग को जरूरी सुधार बताते हैं ताकि उपभोक्ता को समय पर इंसाफ मिल सके। कंज्यूमर कोर्ट
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देश में उपभोक्ता शिकायतों के निपटारे के लिए बने आयोगों की संस्थागत सेहत को लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट सामने आई है। कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव, कॉमन कॉज़, दक्ष, विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी और TISS-प्रयास जैसे संगठनों के सहयोग से तैयार इस रिपोर्ट में देश के सभी राज्यों के उपभोक्ता आयोगों के बजट, ढांचे, मानव संसाधन और कामकाज का आकलन किया गया है। नतीजे बताते हैं कि 2019 के नए कानून के वादे अब तक जमीन पर पूरी तरह नहीं उतर पाए हैं।
रिपोर्ट क्यों जरूरी
आधे पद क्यों खाली
सिर्फ बिहार और हरियाणा में ही अध्यक्ष और सदस्य, दोनों पद पूरी तरह भरे थे। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (DCDRC - District Consumer Disputes Redressal Commission) की तस्वीर भी जुदा नहीं है। देश के 775 जिलों के लिए केवल 685 जिला आयोग बन पाए हैं, यानी हर दस में से एक जिले में आयोग ही नहीं है।
मप्र-राजस्थान-छग का हाल
मध्य प्रदेश
राजस्थान
छत्तीसगढ़
बजट का सच
मध्यस्थता बेअसर
आगे क्या जरूरी
FAQ
- उपभोक्ता शिकायत कहां दर्ज कराई जा सकती है?
उपभोक्ता जिला, राज्य या राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज करा सकते हैं। 50 लाख रुपए तक के दावे जिला आयोग में और उससे अधिक के दावे राज्य या राष्ट्रीय आयोग में दर्ज होते हैं। - क्या मध्यस्थता के लिए पैसे देने होते हैं?
नहीं, इसका भुगतान सरकार द्वारा 'उपभोक्ता कल्याण कोष' से किया जाता है। शुल्क की अधिकतम सीमा तय की गई है। - उपभोक्ता आयोगों में देरी की सबसे बड़ी वजह क्या है?
उत्तर: रिपोर्ट के अनुसार अध्यक्ष और सदस्यों के लंबे समय से खाली पद, अपर्याप्त स्टाफ और बजट का कम इस्तेमाल इसकी मुख्य वजहें हैं।
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