ओबीसी आरक्षण पर पूर्व सीएम कमलनाथ का बीजेपी पर हमला, बोले- चोरी और सीनाजोरी की राजनीति कर रही सरकार
बता दें कि इस विवाद में तीन पक्ष हैं। एक तरफ कमलनाथ के आरोप हैं। दूसरी तरफ हाईकोर्ट का फैसला है। तीसरी तरफ सरकार और याचिकाकर्ताओं की प्रतिक्रियाएं हैं। इसलिए इन्हें अलग-अलग समझना जरूरी है।
पूर्व सीएम कमलनाथ ने क्या कहा
पूर्व सीएम कमलनाथ ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स (X) पर लिखा कि 2019 में उनकी सरकार ने ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण दिया था। उनका दावा है कि इसे बाद में षड्यंत्र के जरिए खत्म किया गया था। इसके बाद भाजपा चोरी और सीनाजोरी की राजनीति पर उतर आई है।
उनके मुताबिक आरक्षण की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी होती है। वहीं, बाद में बनी भाजपा सरकारों ने अदालत के सामने सच्चाई नहीं रखी है। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस सरकार ने जल्दबाजी में आरक्षण दिया, यह भाजपा नेताओं का भ्रामक प्रचार है। कमलनाथ ने ऐसे बयानों को अदालत के आदेश की गलत व्याख्या बताया है।
भाजपा पर 6 साल का आरोप
कमलनाथ का कहना है कि 2019 में कांग्रेस सरकार ने विधानसभा में कानून पास किया था। उनके अनुसार यह संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करके हुआ था। फिर 2020 से प्रदेश में भाजपा की सरकारें हैं।
उनका आरोप है कि इन छह साल में भाजपा ने जानबूझकर ओबीसी आबादी के सही आंकड़े अदालत में नहीं रखे थे। अदालत में मामला मजबूती से रखने की जिम्मेदारी सरकार की थी। उन्होंने यह तक कहा कि भाजपा नेताओं के बयान सच मानें, तो पार्टी ने छह साल में ओबीसी का पक्ष रखा ही नहीं था।
कमलनाथ की दो मांगें
कमलनाथ ने भाजपा से दो मांगें रखीं। पहली, यदि पार्टी में ओबीसी वर्ग के प्रति जरा भी संवेदनशीलता है, तो सुप्रीम कोर्ट में तुरंत याचिका लगाए। दूसरी, विधानसभा में नया कानून पास करके 27 फीसदी आरक्षण बहाल करे।
ये दोनों मांगें अभी राजनीतिक मांगें हैं। सरकार ने इन पर कोई औपचारिक फैसला नहीं बताया है। वहीं, सूत्रों का कहना है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने पर विचार कर सकती है।
हाईकोर्ट के फैसले में क्या है
जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की पीठ ने फैसला सुनाया है। पीठ ने 2019 में ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी करने वाले संशोधन कानून को असंवैधानिक माना है। वहीं, अब कानून रद्द हो गया और ओबीसी आरक्षण 14 फीसदी रह गया है।
कोर्ट ने कहा कि 50 फीसदी की सीमा पार करने के लिए असाधारण परिस्थिति साबित करनी होती है। अदालत को ऐसी परिस्थिति नहीं मिली है। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से जरूरी परामर्श न लेने का मुद्दा भी अहम रहा। 1983 की महाजन आयोग की पुरानी रिपोर्ट पर निर्भरता पर भी सवाल उठे हैं।
अदालत ने ओबीसी की सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी के आंकड़े भी देखे थे। उसके मुताबिक हिस्सेदारी करीब 28.16 फीसदी थी। ओबीसी के लिए स्वीकृत पदों में से करीब 51.17 फीसदी खाली थे। यानी अदालत ने सिर्फ आरक्षण के प्रतिशत को वजह नहीं माना है।
13% होल्ड पदों का क्या होगा
29 सितंबर 2022 के बाद भर्तियों में 87-13 का फॉर्मूला चल रहा था। यानी 87 फीसदी पदों के नतीजे जारी होते थे। 13 फीसदी पद रोके गए थे। इन्हें होल्ड पद कहा जाता है।
हाईकोर्ट ने इन रोके गए 13 फीसदी पदों पर अनारक्षित वर्ग के पात्र उम्मीदवारों को नियुक्ति देने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए अधिकतम तीन महीने का समय दिया गया है। मार्च 2019 से 29 सितंबर 2022 के बीच 27 फीसदी आरक्षण से नौकरी पाने वालों की नियुक्तियां रद्द नहीं होंगी।
दूसरे पक्षों की प्रतिक्रिया
महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने कहा कि 159 पन्नों के आदेश का विश्लेषण हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट जाने के सवाल पर उन्होंने साफ जवाब नहीं दिया है। नई स्थिति बनने पर जानकारी देने की बात कही है।
ओबीसी पक्ष के वकील पुष्पेंद्र शाह ने कहा कि फैसले में कई बातें साफ नहीं हैं। उनके मुताबिक ओबीसी पक्ष जल्द सुप्रीम कोर्ट जाएगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार भी इसे चुनौती देगी।
वहीं अनारक्षित वर्ग की ओर से पैरवी करने वाले वकील आदित्य सांघी ने फैसले को ऐतिहासिक बताया है। उनके मुताबिक सरकार असाधारण परिस्थिति साबित नहीं कर पाई है।
अब आगे क्या होगा
अब सबकी नजर सरकार के अगले कदम पर है। क्या वह सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी? क्या विधानसभा में नया कानून आएगा? इन सवालों का जवाब अभी नहीं मिला है।
यदि नया कानून आया, तो उसे भी अदालत की कसौटी पर परखा जाएगा। वहीं, अपील हुई, तो सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई लंबी चल सकती है। तब तक होल्ड पदों और भर्तियों पर असमंजस रह सकता है।
कमलनाथ के आरोप और सरकार का जवाब, दोनों इस मुद्दे का हिस्सा हैं। लेकिन अदालत का लिखा आदेश सबसे अहम दस्तावेज है। इसलिए पाठकों को राजनीतिक बयानों के साथ आदेश की बातें भी देखनी चाहिए।
FAQs
- कमलनाथ ने ओबीसी आरक्षण के बारे में क्या कहा है?
कमलनाथ ने आरोप लगाया है कि 2019 में उनकी सरकार द्वारा दिया गया 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण एक षड्यंत्र के माध्यम से खत्म कर दिया गया। उन्होंने कहा कि आरक्षण की रक्षा सरकार की जिम्मेदारी होती है और भाजपा सरकार ने अदालत में सही तथ्य नहीं रखे। - ओबीसी आरक्षण पर हाईकोर्ट का फैसला क्या है और इसका असर क्या होगा?
हाईकोर्ट ने 2019 में लागू 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को असंवैधानिक मानते हुए रद्द कर दिया है और अब ओबीसी आरक्षण 14 फीसदी पर वापस आ गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि असाधारण परिस्थितियों को साबित करने के लिए जरूरी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया था। - ओबीसी आरक्षण पर अब सरकार का अगला कदम क्या होगा?
सरकार के अगले कदम पर सभी की नजर है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी या विधानसभा में नया कानून लाएगी। यदि नया कानून लाया गया, तो उसे भी अदालत की कसौटी पर परखा जाएगा।