जमीन विवाद पर दीपाली रस्तोगी ने सीएस अनुराग जैन से कहा- ग्राउंड रियलिटी से अंजान हैं आप
भोपाल. मध्यप्रदेश के मंत्रालय में बुधवार (8 अप्रैल) को हुई सीनियर अधिकारियों की बैठक के आखिरी 5 मिनट बेहद खास रहे। मुख्य सचिव अनुराग जैन की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक में करीब 80 सीनियर अधिकारी मौजूद थे। प्रारंभिक दौर में विभागीय योजनाओं और हितग्राही केंद्रित कार्यक्रमों की समीक्षा हुई।
जब बैठक के अंतिम 5 मिनट अनौपचारिक बातचीत में बदल गए तो राजस्व और वन भूमि को लेकर विवाद ने माहौल गरम कर दिया। बातचीत में यह भी सामने आया कि तीन साल से एक तहसील के तहसीलदार को डीडीओ पावर नहीं मिले सके हैं। इंडस्ट्रीज को जमीन मिलने के मामले में भी विवाद खड़ा हुआ। कहा गया कि राजस्व विभाग जमीन दे देता है, लेकिन वन विभाग निर्माण के समय अड़ंगा लगाता है। सीएस अनुराग जैन ने कहा- मैं चीफ कंप्लेंट ऑफिसर बन गया हूं, मेरे पास विभागों की शिकायतें आती ही रहती हैं।
पढ़िए किसने क्या कहा?
बैठक के बीच एसीएस जीएडी संजय शुक्ला ने कहा कि मध्यप्रदेश में 52 हजार गांव हैं, लेकिन किसी भी जगह यह साफ नहीं है कि कौन सी जमीन वन विभाग की है और कौन सी राजस्व की। सीएस अनुराग जैन ने तुरंत कहा कि अब डिजिटल का जमाना है, इसे ठीक किया जाना चाहिए। इस पर एसीएस अशोक वर्णवाल ने जवाब दिया कि वन भूमि का रिकॉर्ड पहले ही पोर्टल पर दर्ज है, लेकिन पंचायत विभाग की एसीएस दीपाली रस्तोगी ने सीधा सवाल उठाया कि आम आदमी उसे कैसे देख सकता है?
उन्होंने सीएस की ओर मुखातिब होते हुए कहा, सर, मैं दावे से कह सकती हूं कि यहां जो बातें हो रही हैं, ग्राउंड रियलिटी उससे बिल्कुल अलग है। आम आदमी को रिकॉर्ड तक पहुंचना मुश्किल है। किसी भी गांव का रिकॉर्ड सही नहीं है, हर जगह 6-8 मीटर का अंतर बना हुआ है।
कहीं भी जाएं, हर जगह उलझन है...
दीपाली रस्तोगी ने राजस्व और वन भूमि (जमीन विवाद)के उलझे हुए मसले को साफ करते हुए तीन प्रमुख समस्याएं गिनाईं। उन्होंने कहा कि दोनों विभागों का स्केल अलग है। वन विभाग के फील्ड ऑफिसर अपने ही विभाग के सीनियर अफसरों के निर्देश दरकिनार कर देते हैं। जमीन के अधिकार और रिकॉर्ड में व्याप्त उलझन का कोई ठोस समाधान नहीं है। दीपाली रस्तोगी ने कहा, आप मेरी बात न मानें, लेकिन सच यही है। किसी भी गांव में जाएं, राजस्व और वन विभाग को लेकर उलझन है। इसी दौरान इंडस्ट्रीज विभाग के पीएस राघवेंद्र कुमार सिंह ने पीथमपुर का उदाहरण भी दिया।
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पीथमपुर में चार नोटिफिकेशन
बैठक में सामने आया कि पीथमपुर में चार तरह के नोटिफिकेशन चल रहे हैं। जब कोई इंडस्ट्री लगती है तो वन विभाग आपत्ति करता है। प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी जमीन को लेकर उलझन बनी हुई है। कई बार रेंजर और डीएफओ अलग-अलग आदेश दे देते हैं।
तहसीलदार को नहीं मिले थे डीडीओ पावर
बातचीत के दौरान मुख्य सचिव अनुराग जैन ने एक तहसील के निर्माण और तहसीलदार को डीडीओ पावर नहीं दिए जाने की शिकायत की बात कही। इस पर ट्रेजरी कमिश्नर भास्कर लक्षाकार ने कहा कि यह मामला हाल ही में सुलझ गया है। आपको बता दें कि यह तहसील 2023 में बन गई थी, लेकिन तहसीलदार को पावर नहीं मिले थे। सीएस ने पुलिस विभाग पर भी फोकस किया। उन्होंने कहा कि पुलिस में सीएम हेल्पलाइन की शिकायतें ज्यादा हैं। एफआईआर समय पर क्यों नहीं होती, इस पर जवाब तलब किया गया।
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राजस्व और वन भूमि की जटिलता का समाधान कर्नाटक में शुरू किए गए भूमि प्रोजेक्ट में नजर आता है। यह पायलट प्रोजेक्ट कुछ प्रमुख बातें सुनिश्चित करता है..
1. यह डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो हर ग्राम और ब्लॉक स्तर पर जमीन की स्पष्ट जानकारी देता है।
2. बताता है कि किसकी जमीन है, कौन सा हिस्सा वन विभाग की, और कौन सा राजस्व विभाग की।
3. यह भी दर्शाता है कि कौन-सी जमीन खरीदी या बिक्री के लिए उपलब्ध है।
4. इससे विभागीय विवाद, निवेश में रुकावट और भूमि संबंधी उलझन काफी हद तक कम हो जाती है।