बीमारू श्रेणी से बाहर एमपी, कुपोषण अब भी बड़ी चुनौती, 4 विभाग मिलकर लड़ेंगे
समझें क्या है पूरा मामला
- मप्र बीमारू श्रेणी से बाहर हो गया है, लेकिन कुपोषण बड़ी चुनौती बनी है।
- सीएम डॉ. मोहन यादव ने चार विभागों को मिलकर काम करने के निर्देश दिए।
- एनएफएचएस 2026 के मुताबिक, 39.7% बच्चे अभी भी कम वजन के हैं।
- पोषण आहार विवाद सुलझाने के लिए अगली कैबिनेट बैठक में प्रस्ताव आएगा।
- 6 से 23 माह के केवल 12% बच्चों को पर्याप्त पोषण मिल पा रहा है।
एमपी में कुपोषण अब भी बड़ी चुनौती
मध्यप्रदेश अब देश के बीमारू (BIMARU- Bihar, Madhya Pradesh, Rajasthan, Uttar Pradesh) राज्यों की सूची से बाहर निकल चुका है। एमपी के लिए ये एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन सीएम मोहन यादव ने खुद माना कि कुपोषण अभी भी प्रदेश के लिए एक गंभीर चुनौती है। सोमवार को महिला एवं बाल विकास विभाग की समीक्षा बैठक हुई। उसमें सीएम ने साफ कहा कि कुपोषण दूर करने के लिए सभी विभागों को मिलकर काम करना होगा। यह काम अकेले एक विभाग के बस का नहीं है।
4 विभागों को मिला एक्शन का जिम्मा
सीएम मोहन यादव ने निर्देश दिए कि महिला एवं बाल विकास, स्वास्थ्य, स्कूल शिक्षा और पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग मिलकर एक संयुक्त एक्शन प्लान तैयार करें। इन चारों विभागों के बीच तालमेल बिठाकर कुपोषण से मुकाबला करने की रणनीति बनाई जाएगी।
बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के एक बयान का भी जिक्र हुआ। उस बयान में कहा गया था कि मप्र सहित कई राज्य बीमारू श्रेणी से बाहर निकल चुके हैं, लेकिन कुपोषण अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
पोषण आहार विवाद भी सुलझेगा
बैठक में सीएम ने पोषण आहार से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे विवाद को जल्द सुलझाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि पोषण आहार का काम स्वयं सहायता समूहों को दिया जाए या निजी कंपनियों को, इस पर निर्णय लेकर अगली कैबिनेट बैठक में प्रस्ताव लाया जाए। इससे टेंडर प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी। यह विवाद काफी समय से अटका हुआ था। इसके हल होने से जमीन पर कुपोषण से लड़ाई को असल रफ्तार मिलेगी।
क्या कहते हैं एनएफएचएस के आंकड़े?
एनएफएचएस (NFHS- National Family Health Survey) 2026 के आंकड़े बताते हैं कि मप्र (कुपोषण मुक्त मध्य प्रदेश) में 5 साल से कम उम्र के 39.7 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं। इसके साथ ही 23.8 प्रतिशत बच्चे दुबलेपन यानी वेस्टिंग के शिकार हैं। ठिगनेपन यानी स्टंटिंग की स्थिति में थोड़ा सुधार जरूर हुआ है।
यह 35.7 प्रतिशत से घटकर 31.4 प्रतिशत पर आ गई है। लेकिन यह आंकड़ा अभी भी चिंताजनक है। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि 6 से 23 माह के केवल 12 प्रतिशत बच्चों को ही पर्याप्त पोषण मिल पा रहा है। यानी 10 में से 9 से ज्यादा शिशुओं को उनकी जरूरत के मुताबिक खाना नहीं मिल रहा। यह स्थिति बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर गहरा असर डालती है।
क्यों जरूरी है ये एकजुटता?
कुपोषण एक ऐसी समस्या है जो सिर्फ खाने की कमी से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं, साफ-सफाई, जागरूकता और शिक्षा से भी जुड़ी है। इसीलिए एक विभाग के भरोसे इसे नहीं सुलझाया जा सकता।
चार विभागों के मिलकर काम करने से योजनाओं का लाभ जमीन पर ज्यादा असरदार तरीके से पहुंच सकेगा। ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों तक सही समय पर सही पोषण पहुंचाना ही इस पूरे अभियान का मकसद है।
खबर क्यों जरूरी है?
मध्यप्रदेश में कुपोषण की यह स्थिति सिर्फ एक स्वास्थ्य समस्या नहीं है, यह एक सामाजिक और संवैधानिक सवाल भी है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर बच्चे को जीने और स्वस्थ रहने का अधिकार है।
39.7 प्रतिशत बच्चों का कम वजन होना और 12 प्रतिशत शिशुओं को ही पर्याप्त पोषण मिलना, यह संवैधानिक अधिकारों की कसौटी पर बड़ी चूक है। सरकार का चार विभागों को एकजुट करने का निर्णय सही दिशा में एक कदम है।
यह खबर नागरिकों, नीति निर्माताओं और समाज सेवी संस्थाओं सभी के लिए जरूरी है। डिजिटल नैतिकता के लिहाज से यह खबर पूरी तरह तथ्यों पर आधारित है और किसी वर्ग के प्रति भेदभाव से मुक्त है। यह एक जिम्मेदार और सामाजिक सरोकार से जुड़ी पत्रकारिता का उदाहरण है।
FAQ
- मध्यप्रदेश में कुपोषण की मौजूदा स्थिति क्या है?
एनएफएचएस 2026 के आंकड़ों के मुताबिक मध्यप्रदेश में 5 साल से कम उम्र के 39.7 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं। 23.8 प्रतिशत बच्चे दुबलेपन के शिकार हैं। ठिगनेपन की दर 35.7 से घटकर 31.4 प्रतिशत हुई है, जो थोड़ा सुधार दर्शाता है। सबसे चिंताजनक यह है कि 6 से 23 माह के केवल 12 प्रतिशत बच्चों को ही पर्याप्त पोषण मिल पा रहा है। - कुपोषण दूर करने के लिए मप्र सरकार ने क्या कदम उठाए हैं?
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने महिला एवं बाल विकास, स्वास्थ्य, स्कूल शिक्षा और पंचायत एवं ग्रामीण विकास इन चार विभागों को मिलकर संयुक्त एक्शन प्लान बनाने के नि - पोषण आहार विवाद क्या है और यह क्यों अटका हुआ था?
पोषण आहार विवाद इस बात को लेकर था कि बच्चों और महिलाओं को दिया जाने वाला पोषण आहार तैयार करने का काम स्वयं सहायता समूहों को दिया जाए या निजी कंपनियों को। यह फैसला लंबे समय से अटका था, जिससे टेंडर प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही थी। सीएम ने अब निर्देश दिए हैं कि इस पर निर्णय लेकर अगली कैबिनेट बैठक में प्रस्ताव लाया जाए।
ये खबरें भी पढ़ें...
एमपी में कोयले से बनेगी गैस, बिजली-उर्वरक उद्योगों को फायदा, 37,500 करोड़ की योजना मंजूर
सरकारी मोतियाबिंद ऑपरेशन ठप, पैसे खर्च करने को मजबूर ग्रामीण
गर्मी के कारण बढ़ रहा हार्ट अटैक का खतरा, डॉक्टरों ने जारी की चेतावनी
आज कैबिनेट की बैठक करेंगे सीएम मोहन यादव, स्वामित्व योजना पर लेंगे फैसला