मलाईदार निगम-मंडलों पर ‘ग्रहण? अंदरूनी खींचतान से अटकी अगली सूची, संगठन पर बढ़ा दबाव

Ramanand Tiwari | Apr 28, 2026, 22:41 IST
Photograph: (the sootr)
मध्य प्रदेश में निगम-मंडलों की नियुक्तियां चल रही हैं, लेकिन अंदरूनी खींचतान और सिफारिशों का दबाव इसे अटका रहा है। नेताओं में बढ़ती नाराजगी और "मलाईदार" पदों के लिए संघर्ष जारी है। अगली सूची में देरी हो सकती है, जो राजनीतिक संतुलन पर सवाल खड़ा कर रही है।

मध्य प्रदेश में निगम-मंडलों की नियुक्तियों का सिलसिला शुरू तो हो गया है, लेकिन तस्वीर उतनी साफ नहीं है जितनी दिखाई जा रही है। पहली सूची के बाद ही सत्ता और संगठन के भीतर खींचतान तेज हो गई है। कई दावेदार नाराज हैं, जबकि “मलाईदार” निगमों पर कब्जे को लेकर भोपाल में सिफारिशों का दौर चरम पर है। हालात ऐसे हैं कि अगली नियुक्तियां अब टल भी सकती हैं।



क्या है पूरा मामला?

सरकार ने हाल ही में प्राधिकरणों में अध्यक्ष और उपाध्यक्षों की नियुक्तियां की हैं। दावा किया गया कि इसमें संगठन और नेताओं के बीच संतुलन साधा गया है। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि यह संतुलन अधूरा है। कई बड़े चेहरे और उनके समर्थक अभी भी बाहर हैं, जिससे असंतोष धीरे-धीरे सतह पर आने लगा है।



प्राधिकरणों में नियुक्तियां हुईं, लेकिन बड़े निगम अभी बाकी

“मलाईदार” पदों को लेकर नेताओं में खुली खींचतान है। भोपाल में दावेदारों का जमावड़ा, सिफारिशों की होड़ लगी है। कई नेताओं के समर्थक बाहर, नाराजगी बढ़ी। अगली सूची पर अनिश्चितता, एक हफ्ते तक टल सकती है घोषणा।



संगठन पर दबाव और अंदरूनी “नूरा कुश्ती” तेज

मलाईदार निगमों पर सबसे ज्यादा घमासान असल लड़ाई अब शुरू हुई है। खनिज विकास निगम, ऊर्जा, पर्यटन, खादी ग्रामोद्योग, मध्य प्रदेश बीज एवं फर्म विकास निगम, पाठ्यपुस्तक निगम, मध्य प्रदेश कौशल विकास एवं रोजगार निर्माण बोर्ड, गृहनिर्माण, कौशल विकास, कर्मचारी कल्याण समिति, जन अभियान परिषद जैसे बड़े और प्रभावशाली संस्थानों पर कब्जे की जंग छिड़ी हुई है। यहीं से असली राजनीतिक ताकत और संसाधन मिलते हैं। इसलिए हर नेता अपने गुट के लिए कुर्सी सुरक्षित करने में लगा है।



भोपाल बना ‘पावर सेंटर’, सिफारिशों की बारिश

जो नेता जिले में जगह नहीं बना पाए, वे अब राजधानी भोपाल में डेरा डाले बैठे हैं। बड़े नेताओं से लेकर संगठन के शीर्ष तक दबाव बनाया जा रहा है। स्थिति यह है कि “ एडी-चोटी का जोर” लगाकर कुर्सी हासिल करने की कोशिशें खुलकर सामने आ रही हैं।



संतुलन का दावा, लेकिन अंदर से दरारें

पहली सूची में संगठन ने अपने विवेक से फैसले लिए न सिंधिया खेमे की पूरी चली, न तोमर गुट का दबदबा दिखा। लेकिन यही फैसला अब कई नेताओं को खटक रहा है। जिन लोगों को ज्यादा वेटेज मिलने की उम्मीद थी, उनके मंसूबों पर पानी फिर गया।



ग्वालियर-चंबल में संदेश, लेकिन सवाल भी

केपी यादव को सिविल सप्लाईज कॉर्पोरेशन का अध्यक्ष बनाना बड़ा संकेत माना जा रहा है। 2019 में सिंधिया को हराने वाले यादव को यह जिम्मेदारी देकर पार्टी ने अलग संदेश दिया है। वहीं ग्वालियर विकास प्राधिकरण में संघ, सिंधिया और तोमर—तीनों खेमों को साधने की कोशिश दिखी। लेकिन यह संतुलन टिकेगा या नहीं, यही सबसे बड़ा सवाल है।



नाराजगी की ‘फुसफुसाहट’ अब तेज

नियुक्तियों के बाद कई दावेदार मायूस हैं। अभी यह नाराजगी खुले विरोध में नहीं बदली है, लेकिन अंदर ही अंदर “फुसफुसाहट” तेज हो रही है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि अगर जल्द संतुलन नहीं बैठा, तो यह असंतोष विस्फोटक रूप ले सकता है।



अगली सूची पर संकट क्यों?

संगठन के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब बाकी निगम-मंडलों की नियुक्तियां हैं। अंदरूनी खींचतान इतनी बढ़ चुकी है कि फैसले टल सकते हैं या सूची में देरी हो सकती है। या फिर नए विवाद भी खड़े हो सकते हैं



‘कुर्सी की लड़ाई’ बन सकती है बड़ी मुसीबत

मध्य प्रदेश में निगम-मंडलों की नियुक्तियां सिर्फ पद भरने की प्रक्रिया नहीं रह गई हैं। यह अब सत्ता संतुलन, गुटबाजी और राजनीतिक दबाव की खुली लड़ाई बन चुकी है। अगर यही हाल रहा, तो “मलाईदार” निगमों की अगली सूची पर सच में ग्रहण लग सकता है और संगठन को अपनी ही बनाई सियासी बारूद का सामना करना पड़ सकता है।



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