GMT की जगह महाकाल स्टैंडर्ड टाइम, मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का बयान
उज्जैन से उठी नई मांग
मध्यप्रदेश के उज्जैन में 05 अप्रैल 2026 को एक अनोखा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। इसका नाम था महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम। इस सम्मेलन के उद्घाटन पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने एक बड़ा बयान दिया।
उन्होंने कहा कि अब वक्त आ गया है कि GMT (Greenwich Mean Time) यानी ग्रीनविच मीन टाइम की जगह महाकाल स्टैंडर्ड टाइम (MST) को दुनिया के सामने रखा जाए।
धर्मेंद्र प्रधान ने वैज्ञानिकों और विचारकों से अपील की कि इस विषय पर खुलकर बहस होनी चाहिए। यह सिर्फ नाम बदलने की बात नहीं है। उनके मुताबिक यह भारत की हजारों साल पुरानी वैज्ञानिक विरासत को फिर से दुनिया के सामने लाने का मौका है।
उज्जैन और समय का पुराना रिश्ता
केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि उज्जैन वह जगह है जहां भूमध्य रेखा और कर्क रेखा आपस में मिलती हैं। प्राचीन भारत में यहीं से दुनिया के समय की गणना की जाती थी। कुछ इतिहासकार भी यह मानते हैं कि प्राचीन भारत में उज्जैन को प्रमुख मध्याह्न रेखा (Prime Meridian) का दर्जा मिला हुआ था। यानी वह बिंदु जहां से समय का हिसाब शुरू होता था।
उन्होंने यह भी कहा कि आज के आधुनिक AI (Artificial Intelligence) टूल्स भी यह मानते हैं कि समय की गणना का मूल केंद्र उज्जैन के आसपास का क्षेत्र रहा है। उनके मुताबिक भारत को अपने इस वैज्ञानिक गौरव को दुनिया के सामने मजबूती से दोबारा स्थापित करना चाहिए।
GMT कहां से आया?
आज दुनिया भर के टाइमजोन GMT यानी ग्रीनविच मीन टाइम के आधार पर तय होते हैं। ग्रीनविच दक्षिण-पूर्वी लंदन का एक हिस्सा है, जहां रॉयल ऑब्जर्वेटरी (Royal Observatory) स्थित है। पहले हर देश और शहर सूरज की स्थिति के हिसाब से अपना अलग स्थानीय समय मानता था। रेल और जहाजों का इस्तेमाल बढ़ने के बाद यात्रा और संचार में बड़ी दिक्कतें आने लगीं।
1884 में अंतरराष्ट्रीय मेरिडियन सम्मेलन हुआ था। इसमें दुनिया के कई देशों ने हिस्सा लिया था। तय हुआ कि लंदन के ग्रीनविच से गुजरने वाली रेखा को 0 डिग्री देशांतर माना जाएगा और यहीं से दुनिया के समय की गणना होगी। ब्रिटेन ने पहले इसे कानूनी रूप से अपने देश में लागू किया और बाद में दुनिया ने इसे मान लिया।
विज्ञान और अध्यात्म का संगम
धर्मेंद्र प्रधान ने उज्जैन को विज्ञान और अध्यात्म के मिलन की जगह बताया। उन्होंने कहा कि उज्जैन में साइंस सेंटर और प्लैनेटेरियम (Planetarium) को मजबूत करना एक जरूरी कदम है। इससे आने वाली पीढ़ियां वैज्ञानिक सोच के साथ आगे बढ़ सकेंगी। उनके मुताबिक उज्जैन वह जगह है जहां आध्यात्मिकता और विज्ञान के बीच की दूरी खत्म हो जाती है।
उन्होंने महाकालेश्वर मंदिर में एक खास परंपरा का भी जिक्र किया। वैशाख महीने के पहले दिन से भगवान शिव पर मिट्टी के बर्तन से लगातार पानी चढ़ाने की यह प्रथा सिर्फ धार्मिक नहीं है। उनके अनुसार इसका एक वैज्ञानिक पहलू भी है जो गर्मी और पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं को समझने से जोड़ा जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि आध्यात्मिकता के बिना विज्ञान अधूरा है।
क्या बदल सकता है GMT?
यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या वाकई GMT की जगह कोई नया मानक आ सकता है? फिलहाल धर्मेंद्र प्रधान का बयान एक वैचारिक प्रस्ताव है। उन्होंने इसे किसी सरकारी नीति के रूप में नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और ऐतिहासिक चर्चा के निमंत्रण के रूप में रखा है।
GMT को बदलना एक बेहद जटिल अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया है जिसमें दुनिया भर के देशों की सहमति जरूरी होगी। वहीं, यह बयान भारत की सभ्यतागत पहचान और वैज्ञानिक योगदान को लेकर एक बड़ी बहस को जन्म जरूर देता है।
FAQ
- GMT यानी ग्रीनविच मीन टाइम की शुरुआत कैसे हुई?
GMT की शुरुआत 1884 के अंतरराष्ट्रीय मेरिडियन सम्मेलन से हुई। इस सम्मेलन में तय हुआ कि लंदन के ग्रीनविच इलाके की रॉयल ऑब्जर्वेटरी से गुजरने वाली रेखा को 0 डिग्री देशांतर (Prime Meridian) माना जाएगा। इससे पहले हर शहर सूरज की स्थिति के अनुसार अपना अलग समय मानता था। रेलवे और समुद्री यात्राओं में बढ़ती दिक्कतों के बाद एक समान समय प्रणाली की जरूरत महसूस हुई और GMT को दुनिया ने अपना मानक बना लिया।
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