मंडला एसपी को हाईकोर्ट ने फटकारा, कहा- पुलिस बिना पढ़े, आंखें बंदकर तैयार करती है रिपोर्ट
News In Short
- POCSO में दोषी अन्नू वनवासी ने हाईकोर्ट में जमानत के लिए अपील की थी।
- उसने बड़े भाई की शादी के लिए अस्थायी जमानत मांगी थी।
- घुघरी थाने ने गलत रिपोर्ट दी कि शादी खुद आरोपी की है।
- जबलपुर हाईकोर्ट ने रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हुए एसपी को तलब किया।
- मंडला एसपी रजत सकलेचा ने कोर्ट में खुद आकर माफी मांगी है।
News In Detail
हाईकोर्ट ने क्यों लगाई फटकार?
जबलपुर हाईकोर्ट ने मंडला पुलिस की कार्यशैली पर तीखी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस बिना पढ़े, आंखें बंदकर रिपोर्ट तैयार करती है। यह बेहद गंभीर बात है क्योंकि इस रिपोर्ट के आधार पर ही जमानत का फैसला होना था।
दरअसल POCSO और बलात्कार के मामले में मंडला जिला न्यायालय ने अभियुक्त अन्नू वनवासी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। उसने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। अपील की सुनवाई के दौरान उसने अस्थायी जमानत का आवेदन दिया था। उसने कहा कि उसके बड़े भाई की शादी है, इसलिए उसे कुछ दिन के लिए रिहा किया जाए।
पुलिस रिपोर्ट में क्या गलती हुई?
हाईकोर्ट ने संबंधित थाने से रिपोर्ट मंगाई थी। घुघरी थाने ने जो रिपोर्ट कोर्ट में पेश की, उसमें लिखा था कि 18 अप्रैल को शादी बड़े भाई की नहीं बल्कि खुद याचिकाकर्ता की है। यानी थाने की रिपोर्ट ने आवेदन की पूरी बात को उलट दिया।
यह रिपोर्ट न केवल गलत थी, बल्कि इससे न्यायालय को भ्रमित करने की आशंका भी पैदा हुई। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस एके सिंह की युगलपीठ ने इसे बेहद गंभीरता से लिया। कोर्ट ने तुरंत मंडला पुलिस अधीक्षक को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया था।
एसपी ने कोर्ट में मांगी माफी
शुक्रवार, 17 अप्रैल को हुई सुनवाई में मंडला एसपी रजत सकलेचा खुद हाईकोर्ट पहुंचे। उन्होंने युगलपीठ के सामने गलत रिपोर्ट पेश करने पर खेद जताया और माफी मांगी।
कोर्ट ने इस माफी को स्वीकार करते हुए आगे के लिए सख्त निर्देश दिए है। युगलपीठ ने कहा कि एसपी अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को जरूरी दिशा-निर्देश जारी करें। ताकि भविष्य में इस तरह की लापरवाही दोबारा न हो।
जमानत पर क्या हुआ फैसला?
सुनवाई के बाद युगलपीठ ने अभियुक्त अन्नू वनवासी को 20 अप्रैल तक के लिए अस्थायी जमानत दे दी है। यह जमानत बड़े भाई की शादी में शामिल होने के लिए दी गई है। याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता अरुण कुमार विश्वकर्मा ने पैरवी की।
यह फैसला पुलिस की गलती के बावजूद आया है। इससे साफ है कि हाईकोर्ट ने आरोपी के साथ अन्याय नहीं होने दिया। साथ ही पुलिस की जवाबदेही भी तय की।
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