मंदसौर CMHO निलंबित, 311 पदों की भर्ती में भ्रष्टाचार के आरोप, जांच में खुलासा
समझें क्या है पूरा मामला।।।
- मंदसौर CMHO डॉ। चौहान निलंबित, भर्ती में भ्रष्टाचार के आरोप।
- 311 पदों की भर्ती में गड़बड़ी, जांच में खुलासा।
- आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की अनुशंसा, कलेक्टर सख्त।
- विधायक की शिकायत पर शुरू हुई थी पूरी जांच।
- लोकायुक्त में भी पहले से जांच के घेरे में CMHO।
मंदसौर में आउटसोर्स भर्ती में गड़बड़ी के आरोप में CMHO डॉ। गोविंद सिंह चौहान निलंबित कर दिए गए हैं। कलेक्टर अदिति गर्ग ने यह कार्रवाई की है। पांच सदस्यीय जांच समिति ने भर्ती प्रक्रिया में कई गंभीर खामियां पाईं।
समिति ने डॉ। चौहान के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की भी अनुशंसा की है। यह मामला विधायक हरदीप सिंह डंग की शिकायत के बाद सामने आया था।
मामला क्या है
मंदसौर जिले में स्वास्थ्य विभाग की आउटसोर्स भर्ती में बड़ी गड़बड़ी सामने आई है। इसके बाद कलेक्टर अदिति गर्ग ने बड़ा एक्शन लिया। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी यानी सीएमएचओ (CMHO – Chief Medical and Health Officer) डॉ। गोविंद सिंह चौहान को तुरंत प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। जिले के स्वास्थ्य महकमे में यह कार्रवाई काफी बड़ी मानी जा रही है।
जिले में आउटसोर्स के जरिए 311 मल्टीवर्करों की भर्ती की जानी थी। इसी भर्ती प्रक्रिया में कथित भ्रष्टाचार और आर्थिक अनियमितताओं के आरोप लगे हैं। पांच सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट में गंभीर खामियां सामने आई हैं। समिति ने डॉ। चौहान के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की भी अनुशंसा की है।
विधायक की शिकायत से शुरू हुई जांच
यह पूरा मामला सुवासरा से बीजेपी विधायक हरदीप सिंह डंग की शिकायत के बाद सामने आया। उन्होंने 15 मई 2026 को कलेक्टर को शिकायत सौंपी थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि भर्ती प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुई हैं।
शिकायत के मुताबिक कुछ उम्मीदवारों से कथित तौर पर पैसे लेकर बिना विधिवत आदेश के अस्पतालों में काम पर लगाया गया। यह भी आरोप है कि इसके लिए अधिकारियों पर दबाव भी बनाया गया।
311 पदों पर उठे सवाल
जिले में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, उपस्वास्थ्य केंद्र और सिविल अस्पताल के लिए यह भर्ती प्रस्तावित थी। सूत्रों के मुताबिक कलेक्टर ने शुरुआत में सिर्फ 66 पदों यानी करीब 25 फीसदी पदों पर ही नियुक्ति की अनुमति दी थी।
यह अनुमति भी सिर्फ प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तक सीमित थी। आरोप है कि इसके बावजूद बाकी संस्थानों में भी नियुक्तियां कर दी गईं। यानी तय सीमा से बाहर जाकर भर्तियां हुईं।
जांच में मिलीं कई गंभीर खामियां
कलेक्टर की बनाई पांच सदस्यीय समिति ने कई गंभीर अनियमितताएं पकड़ीं। रिपोर्ट के मुताबिक सक्षम अनुमति और कार्यादेश के बिना ही कर्मचारियों को वेतन दे दिया गया। आउटसोर्स भर्ती से जुड़ी टेंडर प्रक्रिया दो साल बाद भी पूरी नहीं हो पाई।
पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट (PC&PNDT Act – Pre-Conception and Pre-Natal Diagnostic Techniques Act) से जुड़े जरूरी रिकॉर्ड जांच टीम को नहीं दिखाए गए। जबकि सरकारी पोर्टल पर यह काम पूरा दिखाया गया था।
निजी उपचार गृहों के लाइसेंस और पंजीयन के रिकॉर्ड में भी गड़बड़ी मिली। रिपोर्ट में डॉ। चौहान के साथ उनके एक कथित परिजन की भूमिका को भी संदिग्ध बताया गया है।
पहले से चल रही थीं कई शिकायतें
निलंबन आदेश में यह भी लिखा है कि डॉ. चौहान के खिलाफ पहले से कई शिकायतें मिल रही थीं। इनमें स्वास्थ्य सेवाओं में अनियमितता, कर्मचारियों के नियम विरुद्ध तबादले और आर्थिक गड़बड़ियां शामिल हैं।
जनप्रतिनिधियों ने भी कई बैठकों में उनकी कार्यप्रणाली पर आपत्ति जताई थी। स्थानीय और राज्य स्तरीय मीडिया में भी लगातार शिकायतें छपती रही थीं।
डॉ। चौहान के खिलाफ एक और मामला पहले से उज्जैन लोकायुक्त में जांचाधीन है। यह मामला नर्सिंग कॉलेज की छात्राओं के स्टाइपेंड में कथित गड़बड़ी से जुड़ा है।
इसके अलावा कर्मचारियों के ईपीएफ, ईएसआईसी और न्यूनतम वेतन भुगतान से जुड़ी शिकायतों की भी अलग जांच चल रही है। 19 मई को लोकायुक्त की विशेष टीम मंदसौर पहुंचकर उनसे पूछताछ भी कर चुकी है।
सीएम हेल्पलाइन में भी लापरवाही के आरोप
निलंबन आदेश में यह भी कहा गया है कि डॉ. चौहान ने लोक सेवा गारंटी अधिनियम के तहत आए आवेदनों का समय पर निपटारा नहीं किया। इसे लेकर उन्हें पहले कारण बताओ नोटिस भी दिया जा चुका था। सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों के निपटारे और विभागीय बैठकों में उपस्थिति को लेकर भी सवाल उठे हैं।
अतिरिक्त प्रभार किसे मिला
कलेक्टर ने मध्यप्रदेश सिविल सेवा नियमों के तहत यह निलंबन आदेश जारी किया है। निलंबन अवधि के दौरान डॉ. चौहान का मुख्यालय कलेक्टोरेट मंदसौर तय किया गया है। वहीं जिला अस्पताल के ईएनटी विशेषज्ञ डॉ। आर।के। द्विवेदी को अगले आदेश तक सीएमएचओ का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है।
फिलहाल यह पूरा मामला जांच के दायरे में है। समिति ने आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की अनुशंसा जरूर की है, लेकिन अंतिम फैसला आगे की कार्रवाई पर निर्भर करेगा। डॉ.चौहान की तरफ से अब तक कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
यह मामला मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में चल रही भर्ती प्रक्रियाओं पर भी सवाल खड़े करता है। आउटसोर्स भर्तियों में पारदर्शिता को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है।
इस निलंबन के बाद जिले के अन्य अधिकारियों की भूमिका पर भी नजर रहेगी। आगे जांच पूरी होने पर ही यह साफ होगा कि जिम्मेदारी किस स्तर तक तय होती है।
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