अब ‘हर मिनट’ की लड़ाई में फंसे राजेंद्र भारती, दिल्ली से भोपाल तक दौड़ तय करेगी विधायकी का भविष्य
मध्यप्रदेश की दतिया सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े राजेंद्र भारती के लिए अब वक्त घड़ी की टिक-टिक से भी तेज दौड़ रहा है। 27 साल पुराने एफडी हेराफेरी मामले में कोर्ट ने उन्हें तीन साल की सजा सुनाई है। इसी के साथ उनकी विधायकी पर संकट गहराता जा रहा है।
यह मामला अब एक तरह से हर मिनट की कानूनी रेस का बन गया है, जहां दिल्ली की अदालत और भोपाल विधानसभा के बीच की प्रोसेस ही तय करेगी कि राजेंद्र भारती विधायक बने रहेंगे या उनकी कुर्सी चली जाएगी।
पूरे मामले को समझने के लिए 'द सूत्र' ने भोपाल से लेकर जबलपुर और दिल्ली तक के एक्सपर्ट से बात की। पढ़िए ये खास खबर...
क्यों हर मिनट इतना अहम है?
कोर्ट का फैसला आते ही कानूनी घड़ी भी शुरू हो गई है। दरअसल, नियम कहता है कि दो साल या उससे ज्यादा की सजा मिलने पर जनप्रतिनिधि अयोग्य हो जाता है। ऐसे में कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती के पास अब सिर्फ एक ही रास्ता बचता है कि वे ऊपरी अदालत से जल्द से जल्द स्टे लें।
यही वह गोल्डन टाइम है, जिसमें खेल पलट सकता है। यदि भारती इस बीच कोर्ट से राहत ले आते हैं तो उनकी विधायकी बच सकती है, लेकिन यदि विधानसभा की प्रक्रिया पहले पूरी हो गई तो उनकी सीट रिक्त घोषित हो जाएगी और आने वाले समय में वहां चुनाव होंगे।
यानी सीधे तौर पर कहें तो कोर्ट और विधानसभा के बीच जो पहले कदम उठेगा, वही तय करेगा कि भारती विधायक रहेंगे या नहीं।
दिल्ली बनाम भोपाल: कैसे बन गया पूरा मामला
इस पूरे घटनाक्रम में दो जगहें सबसे अहम बन गई हैं-
- दिल्ली: जहां ऊपरी अदालत (हाईकोर्ट/सुप्रीम कोर्ट) में अपील और स्टे की लड़ाई लड़ी जाएगी।
- भोपाल: जहां मध्यप्रदेश विधानसभा सचिवालय अपनी प्रक्रिया पूरी करेगा और कार्रवाई आगे बढ़ाएगा।
दिल्ली में राजेंद्र भारती के वकील स्टे लेने की कोशिश करेंगे, जबकि भोपाल में विधानसभा सचिवालय नोटिफिकेशन जारी कर सीट को रिक्त घोषित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है।
यानी यह सिर्फ कानूनी मामला नहीं, बल्कि टाइमिंग का खेल बन चुका है। दिल्ली में स्टे पहले आया तो कुर्सी बची और भोपाल में नोटिफिकेशन पहले निकला तो सीट गई।
क्या कहता है कानून?
इस पूरे मामले की जड़ में है जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8(3) है। इस धारा के मुताबिक, यदि किसी सांसद या विधायक को दो साल या उससे ज्यादा की सजा होती है तो उसकी सदस्यता खत्म मानी जाती है। पहले इसमें कुछ राहत मिलती थी, लेकिन 2013 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने इसे बदल दिया था।
दरअसल, लिली थॉमस बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया था कि सजा सुनाए जाने के साथ ही सदस्यता खत्म मानी जाएगी। इसके लिए किसी अतिरिक्त नोटिफिकेशन की जरूरत नहीं होगी। यही फैसला अब भारती के मामले में कानूनी आधार बन रहा है।
एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
सीनियर एडवोकेट विवेक तन्खा के अनुसार, तीन साल की सजा के बाद विधायक अयोग्य हो जाता है, लेकिन सदस्यता खत्म होने की प्रक्रिया विधानसभा के नोटिफिकेशन से पूरी होती है। इस बीच यदि कोर्ट से स्टे मिल जाए तो स्थिति बदल सकती है।
वहीं सीनियर एडवोकेट विराग गुप्ता का कहना है कि अभी प्रक्रिया का समय मिलेगा और अंतिम फैसला विधानसभा सचिवालय करेगा।
पूर्व प्रमुख सचिव एपी सिंह के मुताबिक, विधानसभा नोटिफिकेशन जारी करेगी, उसके बाद सीट आधिकारिक रूप से रिक्त होगी।
एडवोकेट अजय गुप्ता भी यही मानते हैं कि यदि विधानसभा की प्रोसेस पूरी होने से पहले स्टे मिल जाता है तो राजेंद्र भारती की विधायकी बच सकती है।
तो अब आगे क्या होगा...
बैरिस्टर जसवीन सिंह गुजराल का कहना है कि कानून के हिसाब से सजा के साथ ही सदस्यता समाप्त मानी जाती है और इसके बाद निर्वाचन प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
गुजराल ने कहा कि राजेंद्र भारती के मामले में कनविक्शन हो चुका है और जजमेंट भी आ चुका है। अब विधानसभा अध्यक्ष नोटिफिकेशन जारी करेंगे और निर्वाचन अधिकारी के रूप में कलेक्टर दोबारा चुनाव की घोषणा करेंगे।
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