मोहनलाल हरगोविंददास विरासत केस में बड़ा फैसला, नीना पटेल को मिला 51 प्रतिशत हक

Neel Tiwari | Jan 14, 2026, 19:44 IST
Photograph: (the sootr)
मोहनलाल हरगोविंददास बीड़ी साम्राज्य पर कमर्शियल कोर्ट का बड़ा फैसला। डॉ. नीना पटेल को मिला 51% मालिकाना हक, कोर्ट ने 1986 की वसीयत को माना वैध।

NEWS IN SHORT

  • मोहनलाल हरगोविंददास’ फर्म की 1986 की मूल वसीयत को कोर्ट ने माना वैध।
  • डॉ. नीना पटेल को 51% हिस्सेदारी का कानूनी अधिकार।
  • 2 लाख रुपए में करोड़ों के कारोबार के ट्रांसफर को बताया अवैध।
  • लंदन भागे श्रवण पटेल का ‘राइट टू एविडेंस’ बंद।
  • MP/MLA कोर्ट में धोखाधड़ी और कूटरचना के लिए आपराधिक केस दर्ज।

बीड़ी उद्योग के एक सदी पुराने साम्राज्य को लेकर चल रहा कानूनी संग्राम अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। कमर्शियल कोर्ट के फैसले ने फर्जी वसीयत, अवैध ट्रांसफर और कॉर्पोरेट कब्जे के आरोपों पर मुहर लगा दी है। 40 साल पुरानी मूल वसीयत ने पूरा खेल पलटते हुए असली वारिस को उसका हक दिलाने की राह खोल दी है।



NEWS IN DETAIL

बीड़ी उद्योग के बेताज बादशाह रहे स्वर्गीय परमानंदभाई पटेल का साम्राज्य लंबे समय से विवाद में है। यह विवाद ‘मेसर्स मोहनलाल हरगोविंददास’ फर्म को लेकर चल रहा है। 10 जनवरी 2026 को इस मामले में कमर्शियल कोर्ट का फैसला आया। फैसले ने फर्म के अस्तित्व को बरकरार रखा। कोर्ट ने उन साजिशों को उजागर किया। इन साजिशों के जरिए करोड़ों की संपत्ति पर कब्जा करने की कोशिश की गई थी। कोर्ट ने डॉ. नीना पटेल को 51% वसीहत का हकदार माना है।



1986 की वसीयत बनी केस की रीढ़

कोर्ट के सामने सबसे मजबूत दस्तावेज के रूप में साल 1986 की मूल वसीयत और कोडिसिल सामने आई। इसे परमानंदभाई पटेल ने पूर्ण मानसिक और शारीरिक क्षमता में तैयार किया था।



इसी वसीयत के जरिए उन्होंने फर्म में अपनी 51 प्रतिशत हिस्सेदारी डॉ. (श्रीमती) नीना वी. पटेल के नाम की थी। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यही वसीयत कानूनी रूप से प्रभावी है और इसके आधार पर डॉ. नीना पटेल बहुमत वाली पार्टनर हैं।



इसके उलट, सिद्धार्थ पटेल द्वारा पेश की गई 1991 की वसीयत और 1996 के कोडिसिल पहले ही 22 मार्च 2017 को एडीजे की अदालत द्वारा खारिज की जा चुकी थीं। अदालत ने माना था कि जिन दस्तावेजों पर अंगूठे के निशान लिए गए, उस समय परमानंदभाई ब्रेन हेमरेज के कारण गंभीर अवस्था में थे। ऐसे में दस्तावेज कानूनन मान्य नहीं हो सकते।



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शारीरिक अक्षमता का उठाया गया अनुचित लाभ

कोर्ट रिकॉर्ड और गवाहियों से यह भी सामने आया कि 1994 के बाद परमानंदभाई लगभग 80 प्रतिशत दृष्टिहीन हो चुके थे। इसी स्थिति का लाभ उठाकर यह दिखाने की कोशिश की गई कि वे स्वयं फर्म को बंद करना चाहते थे। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने साफ कहा कि इस दावे के समर्थन में कोई भी ठोस और वैध साक्ष्य मौजूद नहीं है।



2 लाख रुपए में करोड़ों का कारोबार!

मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू वह कथित ट्रांसफर रहा, जिसके तहत कहा गया कि वर्ष 2000 में पूरा बीड़ी व्यवसाय एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को सौंप दिया गया। डॉ. नीना पटेल की शिकायतों के अनुसार, करोड़ों की संपत्ति और ब्रांड वैल्यू के बदले केवल 2 लाख रुपए का दिखावटी भुगतान दर्शाया गया।



कोर्ट ने माना कि न तो यह ट्रांसफर वैध था और न ही फर्म को कभी कानूनी रूप से भंग किया गया। साथ ही, कंपनी के भीतर शेयरों की कथित हेराफेरी कर डॉ. नीना पटेल को हाशिए पर डालने के आरोप भी रिकॉर्ड पर लिए गए।



लंदन में श्रवण पटेल, नहीं कर सके सबूत पेश

फर्म को भंग करने का मुकदमा दायर करने वाले श्रवण पटेल जब सबूत पेश करने की बारी आई तो अदालत के समन के बावजूद उपस्थित नहीं हुए। बाद में यूके (लंदन) चले गए। कोर्ट ने इसे न्याय प्रक्रिया से बचने का प्रयास मानते हुए उनका ‘राइट टू एविडेंस’ बंद कर दिया। जो उनके केस के लिए बड़ा झटका साबित हुआ।



अब आपराधिक शिकंजा भी कसा

यह विवाद अब केवल सिविल प्रकृति का नहीं रहा। 4 अप्रैल 2025 को डॉ. नीना पटेल की शिकायत पर एमपी-एमएलए कोर्ट (MP/MLA court) ने सिद्धार्थ पटेल, उनके पारिवारिक सदस्यों सहित अन्य आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी, कूटरचना और आपराधिक साजिश की धाराओं में संज्ञान ले लिया है।



फैसले का सीधा असर-

  • कमर्शियल कोर्ट के फैसले के बाद स्थिति स्पष्ट है कि
  • फर्म कभी भंग नहीं हुई
  • डॉ. नीना पटेल 51% हिस्सेदारी के साथ बहुमत वाली पार्टनर हैं
  • प्राइवेट लिमिटेड कंपनी द्वारा किया जा रहा संचालन अवैध है

कानूनी जानकारों का मानना है कि अब अगला चरण फर्म की संपत्तियों की बहाली और वर्षों से अवैध रूप से कमाए गए मुनाफे का हिसाब तय करने का होगा। बीड़ी उद्योग के इतिहास का यह विरासत युद्ध आने वाले दिनों में और बड़े कानूनी व आर्थिक नतीजे ला सकता है।



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बीड़ी उद्योग के जनक, कौन हैं मोहनलाल हरगोविंददास

मोहनलाल हरगोविंद दास(MH) को आधुनिक बीड़ी उद्योग का जनक माना जाता है। उन्होंने स्थानीय परंपराओं और जरूरतों को समझते हुए बीड़ी को एक संगठित उद्योग का स्वरूप दिया। वर्ष 1899 के आसपास गुजरात से रोज़गार की तलाश में जबलपुर आए मोहनलाल पटेल और उनके भाई हरगोविंद दास पटेल ने देखा कि आमजन आम, केला और तेंदू जैसे पत्तों में तंबाकू लपेटकर धूम्रपान करता है।



इसी लोक व्यवहार से प्रेरित होकर उन्होंने गहन प्रयोग किए और तेंदू पत्ते को सबसे उपयुक्त पाया। यह न केवल आसानी से मुड़ता था बल्कि सूखने के बाद भी फटता नहीं था। इस नवाचार ने बीड़ी को सस्ता, टिकाऊ और जन-सुलभ बनाया। तेंदू पत्ते में तंबाकू लपेटकर बनाई गई बीड़ी ने तेज़ी से लोकप्रियता हासिल की। यही प्रयोग आगे चलकर ‘मोहनलाल एंड हरगोविंदास लिमिटेड’ जैसे विशाल व्यवसाय की नींव बना।



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उन्होंने सबसे पहले पहलवान बीड़ी के नाम से यह ब्रांड चालू किया था और बाद में इसे शेर बीड़ी का नाम दिया था। बीड़ी को घर-घर तक पहुंचाने और उसे आम आदमी की पहचान बनाने में उनके योगदान के कारण ही मोहनलाल पटेल को ‘आधुनिक बीड़ी का जनक’ कहा जाता है।



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मोहनलाल हरगोविंददास साम्राज्य के विरासत युद्ध की टाइमलाइन

1899: नींव - मोहनलाल और हरगोविंददास ने तेंदू पत्ते के नवाचार के साथ संगठित बीड़ी उद्योग की शुरुआत की।



1986: मूल वसीयत - परमानंदभाई पटेल ने अपनी 51% हिस्सेदारी डॉ. नीना पटेल को देने की वैध वसीयत तैयार की।



1991-1996: संदिग्ध दस्तावेज - परमानंदभाई की गंभीर बीमारी का लाभ उठाकर कथित फर्जी वसीयत और दस्तावेज तैयार किए गए।



2000: अवैध ट्रांसफर - करोड़ों का साम्राज्य महज 2 लाख रुपए के दिखावटी भुगतान पर एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को सौंप दिया गया।



2017: फर्जीवाड़ा उजागर - कोर्ट ने सिद्धार्थ पटेल द्वारा पेश की गई 1991 की वसीयत को अवैध और फर्जी मानते हुए खारिज कर दिया।



2025: आपराधिक शिकंजा - MP/MLA कोर्ट ने धोखाधड़ी और साजिश के मामले में सिद्धार्थ पटेल व अन्य के खिलाफ संज्ञान लिया।



10 जनवरी 2026: निर्णायक फैसला - कमर्शियल कोर्ट ने डॉ. नीना पटेल को असली वारिस माना और अवैध कब्जों को खारिज कर दिया।



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