बीमार बेटे की देखभाल के लिए मां को मिलेगी चाइल्ड केयर लीव, कोर्ट में नहीं चला सरकार का बहाना
News in Short
- बीमार बेटे की देखभाल के लिए मां की याचिका।
- DMD जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित बच्चा।
- हाईकोर्ट ने 7 दिन में निर्णय का आदेश दिया।
- विभागीय देरी पर कोर्ट ने जताई नाराजगी।
- अधिवक्ता निखिल तिवारी ने रखा पक्ष।
News in detail
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक संवेदनशील मामले में बीमार बेटे की देखभाल के लिए मां को चाइल्ड केयर लीव देने पर सख्ती दिखाई है। इस मामले में मां के संविदाकर्मी होने का हवाला देते हुए सरकार सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है। अब हाई कोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए मानवीय दृष्टिकोण से 7 दिन में निर्णय लेने का आदेश दिया है।
नहीं दी चाइल्ड केयर लीव
जबलपुर हाईकोर्ट ने एक मां की पीड़ा को समझते हुए प्रशासनिक उदासीनता पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा कि जब मामला गंभीर रूप से बीमार बच्चे और उसकी देखभाल से जुड़ा हो, तो तकनीकी आधारों पर मामले को टालना उचित नहीं है। याचिकाकर्ता आयशा की ओर से अधिवक्ता निखिल तिवारी और अधिवक्ता आदित्य अहिवासी ने मानवीय पक्ष रखा। हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि केवल संविदाकर्मी होने के कारण आयशा से भेदभाव नहीं किया जा सकता।
दुर्लभ बीमारी से जूझता मासूम
इस मामले में याचिकाकर्ता आयशा शेख खंडवा जिले में जिला शिक्षा केंद्र (सर्व शिक्षा अभियान) में प्रोग्रामर के पद पर कार्यरत हैं। उनका बेटा 'ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (DMD)' जैसी दुर्लभ और गंभीर जेनेटिक बीमारी से पीड़ित है। यह बीमारी धीरे-धीरे मांसपेशियों को कमजोर कर देती है, जिससे बच्चा सामान्य गतिविधियों के लिए पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाता है। बेटे की इस स्थिति में आयशा की लगातार उपस्थिति और देखभाल जरूरी है।
संविदा नौकरी बनी सबसे बड़ी बाधा
आयशा शेख ने अपने बेटे की देखभाल के लिए 240 दिनों की चाइल्ड केयर लीव की मांग की थी। हालांकि विभाग ने यह कहते हुए उनके आवेदन को लंबित रखा कि वह संविदा कर्मचारी हैं। यह विवाद पहले भी हाईकोर्ट और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा था। जहां यह स्पष्ट किया जा चुका है कि ऐसे मामलों में भेदभाव उचित नहीं है। इसके बावजूद आयशा को अपने अधिकार के लिए बार-बार कोर्ट का सहारा लेना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट में जीत के बाद भी संघर्ष जारी
जब यह मामला पहले हाईकोर्ट पहुंचा था तो कोर्ट ने यह माना था कि आयशा को चाइल्ड केयर लीव दी जानी चाहिए। लेकिन इसके बाद आयशा के खिलाफ विभाग सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। सुप्रीम कोर्ट से भी आयशा के पक्ष में ही फैसला आया।
सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बाद, आयशा ने नवंबर 2025 से जुलाई 2026 तक की छुट्टी के लिए आवेदन किया। विभाग ने सिफारिश के बावजूद कोई आदेश जारी नहीं किया। देरी और अनिश्चितता से परेशान होकर उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
हाईकोर्ट का विभाग को निर्देश
इस मामले में आयशा की ओर से अधिवक्ता निखिल तिवारी और अधिवक्ता आदित्य अहिवासी ने पक्ष रखा। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की एकलपीठ ने राज्य शिक्षा केंद्र के कमिश्नर को निर्देश दिया कि वे जिला स्तर से प्राप्त सिफारिश पर 7 दिनों के भीतर निर्णय लें। यदि आयशा के पास लीव कम है या अवकाश स्वीकृत नहीं होता है, तो उसका कारण 10 दिनों के भीतर लिखित रूप में दिया जाए। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।
आखिरकार हुई ममता की जीत
यह मामला इस बात का उदाहरण है कि जब एक मां अपने बच्चे के लिए संघर्ष करती है, तो न्यायपालिका उसकी पीड़ा को समझते हुए उचित निर्णय लेती है। हाईकोर्ट के इस आदेश ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं से ऊपर मानवीय संवेदनाओं को महत्व दिया जाना चाहिए। अब देखना होगा कि संबंधित विभाग इस आदेश का पालन कितनी शीघ्रता से करता है।
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