MP में 1102 इंसानों और 1492 पशुओं की मौत के बाद भी क्यों नहीं जागा बिजली विभाग?
मध्य प्रदेश में बिजली अब सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि कई इलाकों में जानलेवा खतरा बन चुकी है। NCRB और MPERC की रिपोर्टों ने जो तस्वीर सामने रखी है, वह सरकार और बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
साल 2024 में प्रदेशभर में करंट लगने से 1,102 लोगों और 1,492 पशुओं की मौत हुई। रिपोर्ट साफ बताती है कि ये हादसे अचानक नहीं हुए, बल्कि खुले तारों, जर्जर खंभों, खराब ट्रांसफॉर्मरों और वर्षों की लापरवाही का नतीजा थे।
अब सवाल यह है कि हर साल बारिश में ऐसे हादसे होते हैं, जांच बैठती है, कुछ तार बदलते हैं, कुछ अफसर नोटिस लेते हैं। लेकिन क्या व्यवस्था वास्तव में बदलती है या फिर सब कुछ चार दिन की कार्रवाई तक ही सीमित रह जाता है?
रिपोर्ट ने खोली सिस्टम की पोल
कांग्रेस नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने NCRB और बिजली विभाग से जुड़ी रिपोर्टों का हवाला देते हुए सरकार पर सीधा हमला बोला है। उनका कहना है कि प्रदेश में बिजली व्यवस्था सुधार के दावों से नहीं, बल्कि मौतों के आंकड़ों से पहचानी जा रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक जिन लोगों की जान गई, उनमें किसान, मजदूर और बच्चे शामिल थे। कोई खेत जाते समय करंट की चपेट में आया, कोई काम से लौटते वक्त, तो कोई घर के बाहर खेलते हुए मौत का शिकार बन गया।
सबसे ज्यादा मौतें कहां हुईं?
प्रदेश के तीनों डिस्कॉम क्षेत्रों में हालात चिंताजनक रहे। लेकिन सबसे ज्यादा मौतें वेस्ट डिस्कॉम क्षेत्र में दर्ज हुईं।
क्षेत्रवार मौतों का आंकड़ा
वेस्ट डिस्कॉम: 440 मौतें
ईस्ट डिस्कॉम: 342 मौतें
सेंट्रल डिस्कॉम: 320 मौतें
पशुओं की मौत के मामलों में भी ईस्ट डिस्कॉम क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित रहा, जहां 637 पशुओं की जान गई।
बिजली के तार मौत का जाल?
रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि मई से जुलाई के बीच सबसे ज्यादा हादसे हुए। यानी मानसून शुरू होते ही खुले और टूटे बिजली तार लोगों की जान लेने लगे। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब विभाग को पहले से पता था कि बारिश में खुले तार और खराब लाइनें खतरनाक साबित होती हैं, तो समय रहते मरम्मत क्यों नहीं हुई?
MPERC जांच में सामने आईं चौंकाने वाली वजहें
मध्यप्रदेश विद्युत नियामक आयोग (MPERC) की जांच में जिन कारणों को जिम्मेदार माना गया, वे बेहद गंभीर हैं।
रिपोर्ट बताती है कि ये तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि वर्षों से जमा होती प्रशासनिक लापरवाही थीं।
स्मार्ट मीटर पर जोर, सुरक्षा पर चुप्पी?
प्रदेश की बिजली कंपनियां पहले से घाटे में चल रही हैं। दूसरी तरफ उपभोक्ताओं पर लगातार आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।
स्मार्ट मीटर और बढ़े हुए बिलों को लेकर जनता पहले ही नाराज है। सवाल उठ रहा है कि वसूली के बावजूद सुरक्षा क्यों कमजोर है। विभाग का फोकस केवल राजस्व बढ़ाने पर है। जमीनी सुरक्षा के मुद्दे पीछे रह गए हैं।
हर साल हादसे, हर साल कार्रवाई…
मध्य प्रदेश में यह पहली बार नहीं हुआ। हर मानसून के दौरान बिजली करंट से मौतों की खबरें सामने आती हैं। हादसे होते हैं, मुआवजे घोषित होते हैं, जांच बैठती है और कुछ दिन बाद पूरा मामला ठंडा पड़ जाता है। सरकारी फाइलों में सुधार दिखता है, लेकिन जमीन पर खुले तार वैसे ही लटकते रहते हैं। गांवों और कस्बों में आज भी कई जगह बिजली के खंभे और ट्रांसफॉर्मर लोगों के लिए खतरा बने हुए हैं।
सबसे बड़ा सवाल: जिम्मेदार कौन?
1102 इंसानों और 1,492 पशुओं की मौत केवल आंकड़े नहीं हैं। ये उन परिवारों की कहानियां हैं जिन्होंने सिस्टम की लापरवाही की कीमत अपनी जान देकर चुकाई। अब देखना यह होगा कि सरकार इस रिपोर्ट के बाद स्थायी सुधार करती है या फिर यह मामला भी कुछ बैठकों, नोटिसों और बयानबाजी तक सीमित रह जाएगा।
उमंग सिंघार ने सरकार को घेरा
इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने प्रदेश सरकार और बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल तकनीकी खामी का मामला नहीं, बल्कि सिस्टम की लगातार लापरवाही का परिणाम है।
उमंग सिंघार ने आरोप लगाया कि सरकार बिजली व्यवस्था सुधारने के बड़े-बड़े दावे करती है। लेकिन जमीनी हकीकत में लोग खुले तारों और जर्जर लाइनें के बीच जिंदगी जीने को मजबूर हैं। उन्होंने कहा समय पर बिजली लाइनों की मरम्मत और खंभों की सुरक्षा जरूरी थी। इससे सैकड़ों लोगों और पशुओं की जान बच सकती थी।
सिंघार ने कहा बिजली कंपनियां घाटे और वसूली पर ध्यान देती हैं। सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के प्रयास दिखाई नहीं देते। स्मार्ट मीटर और बढ़े बिजली बिल पर जोर है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में खराब बिजली ढांचा खतरा बना हुआ है।
उमंग सिंघार के मुताबिक, हर साल मानसून के दौरान करंट से मौतों की घटनाएं सामने आती हैं। लेकिन सरकार केवल जांच और मुआवजे तक सीमित रह जाती है। स्थायी समाधान और जवाबदेही तय करने की दिशा में ठोस कार्रवाई अब तक नजर नहीं आई है।
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