MP में ड्रग नेटवर्क पर नकेल की तैयारी, पर सवाल- एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स को कितने मिलेंगे फ्री हैंड अधिकार?
क्या वह दूसरे राज्यों तक फैले नेटवर्क को भी खंगाल पाएगी? इन सवालों के जवाब प्रस्ताव मंजूर होने के बाद साफ होंगे।
फोर्स का प्रस्ताव, अब संसाधन
मध्यप्रदेश में नारकोटिक्स के खिलाफ कार्रवाई अब नए चरण की ओर बढ़ रही है। एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स गठित करने का प्रस्ताव अभी तैयार हो रहा है। एडीजी (Additional Director General) नारकोटिक्स डी. श्रीनिवास वर्मा ने यह जानकारी दी। उनके अनुसार प्रस्ताव जल्द ही शासन को भेजा जाएगा।
यहीं से पूरी योजना का सबसे बड़ा सवाल निकलता है। नई फोर्स बनेगी, लेकिन वह मौजूदा व्यवस्था से अलग कैसे होगी? वह ज्यादा असरदार कैसे साबित होगी?
ड्रग नेटवर्क अब किसी एक जिले या राज्य की सीमा तक सीमित नहीं हैं। ऐसे में केवल नया पुलिस ढांचा बना देना काफी नहीं होगा। उसे विशेषज्ञ जांच अधिकारी चाहिए। साइबर इंटेलिजेंस, फॉरेंसिक सहायता और वित्तीय जांच की टीम भी जरूरी होगी। मजबूत मुखबिर नेटवर्क के बिना जमीन पर पकड़ बनाना मुश्किल रहेगा।
थाने बढ़ेंगे, स्टाफ कहां से आएंगे?
सरकार नारकोटिक्स थानों की संख्या बढ़ाने की दिशा में भी काम कर रही है। मौजूदा विशेष थाना व्यवस्था का विस्तार प्रस्तावित है। यह कदम सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन असली सवाल इसके पीछे के इंतजाम का है।
नए थाने खोलने के साथ प्रशिक्षित अमला कहां से आएगा? विशेषज्ञ जांच टीमों का ढांचा क्या होगा? अतिरिक्त बजट कितना मिलेगा? इन सवालों की पूरी तस्वीर अभी सामने नहीं आई है।
यानी चुनौती सिर्फ थाने बढ़ाने की नहीं है। उन्हें वास्तव में जांच करने लायक बनाना असली काम होगा।
सीमा पार तक पहुंचेगी जांच?
उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात और छत्तीसगढ़ से समन्वय मजबूत करने की तैयारी है। वजह साफ है। अलग-अलग मामलों की जांच में कई जानकारियां सामने आई हैं। इनमें नशीले पदार्थ, केमिकल और सप्लाई नेटवर्क के तार शामिल हैं। ये तार राज्य की सीमा के बाहर तक जाते हैं।
इसलिए नई टास्क फोर्स की सबसे कठिन परीक्षा सीमा पर होगी। यह परीक्षा वहां शुरू होगी, जहां मध्यप्रदेश की सीमा खत्म होती है। एक राज्य में गिरफ्तारी के बाद जांच कितनी तेजी से आगे बढ़ती है? दूसरे राज्य के सप्लायर, फाइनेंसर या केमिकल देने वाले तक कौन पहुंचेगा? इसी रफ्तार से नई व्यवस्था की क्षमता का अंदाजा लगेगा।
लैब पकड़ीं, अब सवाल नेटवर्क की जड़ का?
प्रदेश में गुप्त ड्रग लैब पकड़े जाने की जानकारी सामने आ चुकी है। भोपाल, आगर-मालवा, मंदसौर और महू जैसे क्षेत्रों में बड़ी कार्रवाइयां हुई हैं। ये कार्रवाइयां सिंथेटिक ड्रग से जुड़ी रही हैं।
यहां आंकड़े का दूसरा पहलू ज्यादा अहम है। लैब पकड़ना कार्रवाई है। लेकिन उसके पीछे के पूरे नेटवर्क तक पहुंचना जांच की अगली मंजिल है। कच्चा माल किसने दिया? पैसा किसने लगाया? तैयार माल कहां जाना था? कमाई किसके पास पहुंची? नई टास्क फोर्स की सफलता इन्हीं कड़ियों तक पहुंचने से तय होगी।
पैसे का खेल पकड़ना मुश्किल
ड्रग कारोबार के खिलाफ पुलिसिंग में सिर्फ बरामदगी को सफलता का आखिरी पैमाना नहीं माना जा सकता। नेटवर्क की आर्थिक रीढ़ तोड़ना जरूरी है।
इसके लिए बैंकिंग लेनदेन और संदिग्ध संपत्ति की कानूनी जांच अहम होगी। हवाला जैसे दूसरे वित्तीय माध्यमों पर भी नजर रखनी होगी। सरकार की रणनीति में तस्करों की संपत्ति की जांच पर भी जोर है। पैसों के लेनदेन की जांच भी इसमें शामिल है। लेकिन नतीजे कितने सामने आते हैं, यही आगे अहम रहेगा।
स्पेशल कोर्ट और सजा का सवाल
एनडीपीएस (Narcotic Drugs and Psychotropic Substances) मामलों के लिए विशेष न्यायालय प्रस्तावित है। इससे मामलों के जल्द निपटारे की कोशिश होगी।
मगर गिरफ्तारी के बाद मजबूत साक्ष्य जरूरी हैं। समय पर चार्जशीट और अदालत में दोषसिद्धि भी उतनी ही अहम है। यानी कोर्ट बनाना एक कदम है। सजा दिलाना दूसरा और बड़ा कदम है।
इसलिए भविष्य में सिर्फ यह नहीं गिना जाए कि कितने आरोपी पकड़े गए। यह भी गिना जाए कि कितनों को सजा मिली। यही आंकड़ा अभियान का बड़ा पैमाना होना चाहिए।
2029 का लक्ष्य और असली कसौटी
मध्यप्रदेश को 31 दिसंबर 2029 तक नशामुक्त बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसी दिशा में कुछ कदम प्रस्तावित हैं। इनमें तीन साल की कार्ययोजना शामिल है। नारकोटिक्स पुलिसिंग का विस्तार और टास्क फोर्स भी इसमें हैं।
सरकार अब स्थानीय बरामदगी से आगे बढ़ने की तैयारी में है। उसका फोकस अंतरराज्यीय नेटवर्क, वित्तीय कड़ियों और विशेष जांच ढांचे पर रहेगा। फिलहाल टास्क फोर्स प्रस्ताव के स्तर पर ही है।
इसके आकार, अधिकार, विशेषज्ञ स्टाफ और बजट का विस्तृत खाका सामने आना बाकी है। पूरी तरह सक्रिय होने की समयसीमा भी सार्वजनिक नहीं हुई है। इसलिए सबसे बड़ा सवाल फोर्स बनने का नहीं, उसे मिलने वाली ताकत का है।
चार आंकड़े जो तय करेंगे नतीजा
नई व्यवस्था की कमजोर कड़ी घोषित दिशा और जमीन की क्षमता का फर्क है। ड्रग नेटवर्क अंतरराज्यीय और तकनीकी होता जा रहा है। दूसरी ओर सरकार को अब विशेष पुलिस ढांचे का विस्तार करना है।
आने वाले समय में चार आंकड़े सबसे अहम होंगे। बड़े नेटवर्क कितने टूटे, यह पहला पैमाना है। वित्तीय सरगना कितने पकड़े गए, यह दूसरा है। अवैध संपत्ति कितनी जब्त हुई, यह तीसरा है। एनडीपीएस मामलों में दोषसिद्धि कितनी बढ़ी, यह चौथा है।
अंतिम सवाल: ताकत कितनी?
स्पेशल फोर्स का प्रस्ताव तैयार होगा। लेकिन क्या उसे ड्रग नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने जितनी ताकत भी मिलेगी? इसका जवाब गठन की घोषणा से नहीं मिलेगा। जवाब जमीन पर होने वाली कार्रवाई देगी।
FAQs
- मध्यप्रदेश को नशामुक्त बनाने का लक्ष्य कब तक है?
राज्य को 31 दिसंबर 2029 तक नशामुक्त बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए तीन साल की कार्ययोजना, नारकोटिक्स पुलिसिंग का विस्तार और टास्क फोर्स जैसे कदम प्रस्तावित हैं।