MP Assistant Professor Promotion: 9 साल से फाइलों में फंसे प्रोफेसर, योग्यता पूरी फिर भी लाभ अटके
मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग की एक पुरानी प्रशासनिक गड़बड़ी अब सैकड़ों सहायक प्राध्यापकों के लिए बड़ी सजा बन चुकी है। वर्ष 2004 और 2005 में विशेष भर्ती अभियान के तहत नियुक्त सहायक प्राध्यापक पिछले कई वर्षों से प्रमोशन, वेतन लाभ और करियर ग्रोथ से वंचित हैं। हैरानी की बात यह है कि इन शिक्षकों पर योग्यता की कमी का आरोप नहीं है। विवाद सिर्फ “परिवीक्षा समाप्ति की तारीख” को लेकर खड़ा किया गया है। इसी तकनीकी उलझन ने पूरे बैकलॉग बैच का भविष्य अधर में डाल दिया।
नियुक्ति हुई, लेकिन नियमों में फंस गया पूरा बैच
वर्ष 2004-05 में लोक सेवा आयोग के माध्यम से उच्च शिक्षा विभाग में विशेष भर्ती अभियान चलाया गया था। इस भर्ती में नियुक्त सहायक प्राध्यापकों को शर्त दी गई थी कि उन्हें दो साल के भीतर NET/SET पास करना होगा या पीएचडी करनी होगी।
लेकिन बड़ा सवाल यही है कि जब वर्षों तक SET परीक्षा आयोजित ही नहीं हुई, तो शिक्षक योग्यता कैसे पूरी करते? दूसरी तरफ दो साल के भीतर पीएचडी पूरी करना भी व्यवहारिक रूप से संभव नहीं था। यहीं से शुरू हुई वह प्रशासनिक गड़बड़ी, जिसका खामियाजा आज तक शिक्षक भुगत रहे हैं।
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विभाग ने खुद बढ़ाई समय सीमा, फिर अचानक बदल दिए नियम
उच्च शिक्षा विभाग ने बाद में इस समस्या को स्वीकार करते हुए योग्यता हासिल करने की समयसीमा बढ़ाकर वर्ष 2017 तक कर दी थी। यानी विभाग खुद मान चुका था कि तय समय में योग्यता प्राप्त करना संभव नहीं था।लेकिन इसके बाद विभाग ने नया मोड़ दे दिया।
कई सहायक प्राध्यापकों की परिवीक्षा अवधि नियुक्ति के दो साल बाद समाप्त मानने के बजाय, योग्यता प्राप्त करने की तारीख से जोड़ दी गई। यहीं से पूरा विवाद खड़ा हो गया।
एक आदेश ने रोक दिए प्रमोशन और आर्थिक लाभ
इस फैसले के बाद वर्ष 2004-05 बैकलॉग भर्ती वाले शिक्षकों की करियर प्रगति रुक गई। कई प्राध्यापक वर्षों से पदोन्नति का इंतजार कर रहे हैं, जबकि आर्थिक लाभ भी अटक गए हैं।
प्रभावित शिक्षकों का कहना है कि वे सभी UGC नियमों के तहत पूरी तरह पात्र हैं। फिर भी विभाग सिर्फ तारीखों की तकनीकी व्याख्या के आधार पर उन्हें परेशान कर रहा है।
9 साल से चल रही लड़ाई, लेकिन समाधान नहीं
प्राध्यापक संघ का दावा है कि इस मामले को लेकर कई बार विभाग को ज्ञापन और आवेदन दिए जा चुके हैं। इसके बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। बताया जा रहा है कि मामला करीब 9 वर्षों से लंबित पड़ा है। इस दौरान सैकड़ों शिक्षक मानसिक तनाव और आर्थिक नुकसान झेल रहे हैं। शिक्षकों के सामने सबसे बड़ी परेशानियां
मुख्य समस्याएं इस प्रकार हैं:
- प्रमोशन प्रक्रिया पर रोक
- वेतन और एरियर संबंधी लाभ अटके
- वरिष्ठता विवाद पैदा हुआ
- सेवा रिकॉर्ड प्रभावित
- मानसिक और आर्थिक दबाव बढ़ा
- विभागीय फाइलों में मामला वर्षों से लंबित
सवाल सरकार से भी
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विभाग खुद समय सीमा बढ़ा चुका था, तो बाद में नियमों की अलग व्याख्या क्यों की गई? अगर शिक्षक नियुक्ति नियमों के अनुसार पात्र थे, तो फिर सिर्फ परिवीक्षा समाप्ति की तारीख को आधार बनाकर उनका करियर क्यों रोका गया? उच्च शिक्षा विभाग की यह प्रशासनिक उलझन अब सरकार की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर रही है।
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क्या बोले प्राध्यापक संघ के प्रांताध्यक्ष
प्रांतीय शासकीय महाविद्यालयीन प्राध्यापक संघ के प्रांताध्यक्ष आनंद शर्मा ने कहा कि वर्ष 2004-05 बैकलॉग भर्ती के सहायक प्राध्यापकों के साथ लंबे समय से अन्याय हो रहा है। उन्होंने कहा कि सभी प्राध्यापक नियमानुसार योग्य हैं, लेकिन परिवीक्षा अवधि की तारीख को लेकर विभागीय विसंगति बनाई गई है। संघ ने मांग की है कि सभी सहायक प्राध्यापकों की परिवीक्षा नियुक्ति दिनांक से दो वर्ष बाद मानते हुए उनके प्रमोशन और आर्थिक लाभ तत्काल बहाल किए जाएं।