एमपी बार काउंसिल चुनाव में बवाल: फाइनल लिस्ट जारी, लेकिन पूरी प्रक्रिया पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप
News in Short
- एमपी स्टेट बार काउंसिल चुनाव के लिए 121 उम्मीदवारों की फाइनल लिस्ट जारी।
- सूची में केवल 19 महिला प्रत्याशी, जबकि 30% आरक्षण का प्रावधान।
- 52,000 से अधिक वकीलों के नाम वोटर लिस्ट से गायब होने का आरोप।
- चुनाव प्रक्रिया में इलेक्शन रूल्स 1968 के उल्लंघन का दावा।
- हाईकोर्ट बार अध्यक्ष धन्या कुमार जैन ने चुनाव रद्द करने की मांग उठाई।
News in detail
मध्य प्रदेश के कानूनी गलियारों में इस समय सियासी माहौल जैसा तनाव देखने को मिल रहा है। एक ओर स्टेट बार काउंसिल चुनाव के लिए उम्मीदवारों की अंतिम सूची जारी हो गई है। वहीं, दूसरी ओर नियमों और निर्वाचन समिति को लेकर ही विवाद भड़क उठा है। भारी गड़बड़ियों और नियमों के उल्लंघन के आरोपों के बीच चुनाव रद्द करने की मांग तेज हो गई है।
स्टेट बार चुनाव में उठे पारदर्शिता पर सवाल
जबलपुर सहित पूरे मध्य प्रदेश के कानूनी क्षेत्र में उस समय हलचल तेज हो गई जब राज्य अधिवक्ता परिषद चुनाव के लिए 121 उम्मीदवारों की अंतिम सूची जारी की गई। यह सूची चुनाव प्रक्रिया के अगले चरण की शुरुआत मानी जा रही थी, लेकिन इसके साथ ही विवाद भी खड़ा हो गया।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय अधिवक्ता संघ ने इस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे संदिग्ध बताया है। उनका कहना है कि चुनाव नियमों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया।
नए नियम बने विवाद की जड़
इस पूरे विवाद की मुख्य वजह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा लागू किए गए नए नियम हैं। इन नियमों के अनुसार कोई भी अधिवक्ता एक साथ हाईकोर्ट बार एसोसिएशन और स्टेट बार काउंसिल में पद पर नहीं रह सकता। यहीं पर मतभेद उभर कर सामने आया है।
एक पक्ष का मानना है कि चुनाव जीतने के बाद पद छोड़ा जा सकता है, जबकि दूसरा पक्ष कहता है कि चुनाव में भाग लेने से पहले ही पद छोड़ना अनिवार्य है। इसी व्याख्या के अंतर ने पूरे चुनाव को विवादों में ला खड़ा किया है।
महिला आरक्षण पर भी उठे सवाल
चुनाव समिति द्वारा जारी की गई सूची में कुल 121 उम्मीदवारों में से केवल 19 महिलाएं शामिल हैं, जो लगभग 15.7 प्रतिशत ही बनता है। जबकि नियमों के अनुसार महिलाओं को 30 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए।
ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या महिला प्रतिनिधित्व के नियमों का पालन किया गया है या नहीं। यह मुद्दा भी चुनाव की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। हालांकि नियमों के अनुसार महिलाओं के पदों को चुनाव के बाद भी समिति द्वारा भरा जा सकता है।
आरोप: 52 हजार वकीलों के नाम गायब
सबसे बड़ा और गंभीर आरोप मतदाता सूची को लेकर सामने आया है। दावा किया गया है कि प्रदेश में कुल 1,39,572 पंजीकृत अधिवक्ता हैं, लेकिन वोटर लिस्ट में केवल 87,414 नाम ही शामिल किए गए हैं।
यानी करीब 52,158 वकीलों को मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया गया। इसे लेकर आरोप है कि यह एक सुनियोजित तरीके से किया गया कदम है, जिससे चुनाव के परिणाम प्रभावित हो सकते हैं।
चुनाव नियमों के उल्लंघन का दावा
आरोप यह भी लगाया गया है कि इलेक्शन रूल्स 1968 के तहत मतदाता सूची तैयार करने के लिए निर्धारित 160 दिनों की अवधि का पालन नहीं किया गया।
इतना ही नहीं, जिन अधिवक्ताओं का सत्यापन नहीं हुआ, उन्हें नियम 13 के तहत 60 दिन का नोटिस देना जरूरी था, जो नहीं दिया गया। इससे पूरी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
जेल भेज दो, लेकिन नहीं झुकूंगा: बार अध्यक्ष
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष धन्या कुमार जैन ने इस पूरे मामले में तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया को “घोर भ्रष्टाचार” बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की है।
इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनकी सदस्यता रद्द करने की धमकी दी गई है। इस पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि वे नियमों के खिलाफ हैं तो सिर्फ सदस्यता रद्द न की जाए, बल्कि उन्हें जेल भेज दिया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि वे किसी भी स्थिति में भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज नहीं दबाएंगे।
साख पर सवाल, अब निगाहें अगले फैसले पर
जहां एक ओर चुनावी प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है और उम्मीदवार मैदान में हैं, वहीं दूसरी ओर इतने गंभीर आरोपों ने मध्य प्रदेश राज्य अधिवक्ता परिषद की साख पर सवालिया निशान लगा दिया है।
अब यह देखना बेहद अहम होगा कि न्यायालय और संबंधित प्राधिकरण इन आरोपों पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या चुनाव प्रक्रिया को जारी रखा जाएगा या फिर इसे रद्द कर नए सिरे से चुनाव कराए जाएंगे।
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