खेतों में नहीं, फाइलों में उगेगी फसल! RTI वाले अफसर बेंगलुरु में सीखेंगे प्राकृतिक खेती

Amresh Kushwaha | Sept 16, 2026, 09:41 IST
प्राकृतिक खेती
मध्य प्रदेश कृषि विभाग ने प्राकृतिक खेती सीखने अफसरों को बेंगलुरू भेजा है। सूची में कुछ अफसर 12 से 90 दिन में रिटायर हो रहे हैं। जांच, बजट और आरटीआई देखने वाले अफसर भी शामिल हैं।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • मध्य प्रदेश कृषि विभाग ने अफसरों को बेंगलुरू ट्रेनिंग पर भेज रहा है।
  • यह ट्रेनिंग प्राकृतिक खेती और योग-ध्यान से जुड़ी बताई जा रही है।
  • सूची में कुछ अफसर सिर्फ 12 से 90 दिन में रिटायर हो रहे हैं।
  • जांच और आरटीआई जैसे काम देखने वाले अफसर भी ट्रेनिंग में शामिल हैं।
  • इसे लेकर विभाग की मंशा और खर्च पर सवाल उठ रहे हैं।

मध्य प्रदेश के कृषि विभाग ने एक नई ट्रेनिंग को लेकर विवाद खड़ा कर दिया है। विभाग ने प्राकृतिक खेती सीखने के लिए अफसरों को बेंगलुरू भेज रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक शुरुआत में 75 अफसरों को भेजने की बात कही गई थी। बाद में कुल 58 अधिकारियों के ट्रेनिंग पर जाने का जिक्र आया।



क्या है पूरी ट्रेनिंग योजना

कृषि विभाग यह ट्रेनिंग तीन दिन की आवासीय ट्रेनिंग के रूप में करा रहा है। इसके लिए अपर संचालक से स्टेट कोआर्डिनेटर स्तर तक के अफसरों को चुना गया है। इन अफसरों के 15-15 के पांच बैच बनाए गए हैं। ट्रेनिंग 16 सितंबर से शुरू हो चुकी है। यह नवंबर के पहले पखवाड़े तक चलेगी। सूत्रों का कहना है कि इसमें प्राकृतिक खेती के साथ योग और ध्यान भी सिखाया जाएगा।



किस संस्थान ने भेजा प्रस्ताव

यह ट्रेनिंग श्री अन्नाम इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी, बेंगलुरू करा रहा है। इस संस्थान ने 30 जुलाई को विभाग को प्रस्ताव भेजा था। सचिव स्तर पर सहमति मिलने के बाद ही अफसरों को भेजने का फैसला हुआ।



किन अफसरों पर उठे सवाल

सूची में कुछ ऐसे अफसरों के नाम भी शामिल हैं, जो बहुत कम समय में रिटायर होने वाले हैं। सहायक संचालक सविता श्रीवास्तव 30 सितंबर को रिटायर हो रही हैं। उनका पहला बैच 16 से 18 सितंबर के लिए तय किया गया था। अपर संचालक जीपी प्रजापति 31 दिसंबर को रिटायर हो रहे हैं। वे सीएम मॉनिटर से जुड़ा काम देखते हैं। उनका नाम 25 और 27 सितंबर वाले बैच में है।



जांच और सूचना वाले अफसर भी शामिल

सूची में डीएल कोरी का भी नाम है। वे संचालनालय में कार्यालय प्रमुख हैं और स्थापना का काम देखते हैं। उनका नाम 22 से 24 सितंबर वाले बैच में दर्ज है। उप संचालक डॉ मनीषा जायसवाल बजट और योजना का काम देखती हैं। सहायक संचालक एफएल इवने विभागीय जांच का काम देखते हैं।



सहायक संचालक दुष्यंत कुमार धाकड़ लिटिगेशन यानी कानूनी मामलों का काम देखते हैं। इन तीनों का नाम भी 22 से 24 सितंबर वाले बैच में शामिल है। 25 और 27 सितंबर वाले बैच में स्थापना, आरटीआई (Right To Information) और सूचना का काम देखने वाले अफसरों के नाम भी हैं। इनके अलावा उप संचालक अजय परियानी और सहायक संचालक दिलवर सिंह कौरव भी सूची में शामिल हैं। ये दोनों भी प्रशासनिक और समन्वय से जुड़ा काम देखते हैं।



ट्रेनिंग पर होगा कितना खर्च

इस ट्रेनिंग पर राज्य सरकार के लाखों रुपए खर्च होंगे। प्रस्ताव के मुताबिक सिंगल एसी कमरे का खर्च 30 हजार रुपए प्रतिदिन रखा गया है। डबल कमरे का खर्च 25 हजार रुपए और शेयरिंग रूम का खर्च 15 हजार रुपए प्रतिदिन प्रस्तावित है। कुल खर्च चार से 4.5 लाख रुपए के आसपास बताया जा रहा है। इसमें टीए-डीए यानी यात्रा भत्ता और दैनिक भत्ता अलग से शामिल होगा।



पहले भी हुई ऐसी ट्रेनिंग

विभागीय अफसरों को देश और विदेश में ट्रेनिंग भेजने की पुरानी परंपरा रही है। इससे पहले अफसरों को जोधपुर, अंडमान, ऊटी और जापान भी भेजा गया है। आरोप है कि इस बार बेंगलुरू भेजे जा रहे कई अफसरों का प्राकृतिक खेती से कोई संबंध नहीं है। सूत्रों का कहना है कि कुछ अफसर लगभग हर ट्रेनिंग की सूची में शामिल रहते हैं।



विभाग का क्या है जवाब

इस पूरे मामले पर कृषि विभाग के संचालक उमाशंकर भार्गव ने अपनी बात रखी। उनका कहना है कि सिर्फ मुख्यालय के अफसर नहीं, जिलों से भी अधिकारी ट्रेनिंग पर भेजे गए हैं। उन्होंने दावा किया कि जहां तक उन्हें जानकारी है, सभी अफसरों के रिटायरमेंट में अभी एक साल बचा है।



सूची और बयान में दिखा अंतर

हालांकि विभाग की अपनी सूची इससे अलग तस्वीर दिखाती है। सूची में सविता श्रीवास्तव का रिटायरमेंट 30 सितंबर बताया गया है। इसी तरह जीपी प्रजापति की रिटायरमेंट तारीख 31 दिसंबर दर्ज है। यह तारीखें संचालक के बयान से मेल नहीं खाती हैं। इससे साफ है कि सूची और अफसर के जवाब में अंतर है।



आगे क्या होगा असर

बीते कुछ सालों में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने पर सरकार का जोर बढ़ा है। किसानों को रसायन मुक्त खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसी कड़ी में अफसरों को भी नई तकनीक सीखने के लिए बाहर भेजा जाता है। लेकिन सवाल यह है कि रिटायरमेंट के करीब खड़े अफसरों को यह ट्रेनिंग देने का फायदा क्या होगा। आलोचकों का कहना है कि इससे सरकारी खजाने पर बेवजह बोझ पड़ता है।



यह पूरा मामला अब विभाग की मंशा पर सवाल खड़े कर रहा है। आम लोगों के टैक्स के पैसों से चल रही यह ट्रेनिंग चर्चा का विषय बन गई है। जांच, बजट और आरटीआई जैसे अहम काम देखने वाले अफसरों का ट्रेनिंग पर जाना भी लोगों को अटपटा लग रहा है। आने वाले दिनों में इस पूरे मामले में और खुलासे हो सकते हैं। विभाग को अब सूची को लेकर स्पष्टीकरण भी देना पड़ सकता है।



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