भाजपा संगठन पर ‘दोहरी नीति’ के आरोप : छोटे कार्यकर्ता पर कार्रवाई, बड़े नेताओं पर खामोशी क्यों?
News in Short
- भाजपा संगठन पर अनुशासन की नीति में भेदभाव का आरोप, छोटे कार्यकर्ताओं पर कड़ी कार्रवाई।
- बड़े नेताओं पर विवादित बयानों के बावजूद कोई सख्त कदम नहीं उठाए जाते।
- उज्जैन विधायक अनिल जैन को हिदायत देकर मामले को शांत कर दिया गया।
- सागर के भाजपा कार्यकर्ता देवेंद्र कटारे को सोशल मीडिया पोस्ट के कारण पद से हटाया गया।
- कार्यकर्ताओं में नाराजगी, आरोप है कि प्रभावशाली नेताओं को संरक्षण मिलता है।
News in Detail
BHOPAL. मध्यप्रदेश भाजपा संगठन एक ओर अनुशासन की सख्त नीति का दावा करता है, लेकिन हाल के कुछ घटनाक्रमों ने इस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कई मामलों में देखा गया है कि जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं पर तो तुरंत कार्रवाई हो जाती है, जबकि बड़े और प्रभावशाली नेताओं के विवादित बयानों या गतिविधियों पर संगठन की प्रतिक्रिया बेहद नरम दिखाई देती है। यही वजह है कि पार्टी के अंदर और बाहर अब यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या भाजपा संगठन में अनुशासन लागू करने के लिए अलग-अलग पैमाने अपनाए जा रहे हैं।
मुख्य सवाल: क्या कार्रवाई के दो पैमाने हैं?
राजनीतिक गलियारों में यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि संगठन की कार्रवाई में पारदर्शिता और समानता क्यों नहीं दिखती। कई घटनाओं में ऐसा लगा कि छोटे पदों पर बैठे कार्यकर्ताओं को तुरंत नोटिस या पद से हटाने की कार्रवाई कर दी जाती है, जबकि सत्ता और प्रभाव रखने वाले नेताओं को केवल चेतावनी देकर छोड़ दिया जाता है।
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उज्जैन मामला: विधायक को सिर्फ हिदायत-
हाल ही में उज्जैन से बीजेपी विधायक अनिल जैन कालूखेड़ा का एक बयान चर्चा में रहा। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि प्रशासनिक अमला उनकी बात नहीं सुन रहा है और अपनी बात मुख्यमंत्री तक पहुंचाने के लिए उन्हें मीडिया का सहारा लेना पड़ रहा है।
यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और पार्टी की अंदरूनी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हुए। हालांकि मामला सुर्खियों में आने के बाद भाजपा संगठन ने उन्हें तलब जरूर किया, लेकिन बातचीत के बाद केवल हिदायत देकर मामला खत्म कर दिया गया।
सागर का मामला: कार्यकर्ता पर कड़ी कार्रवाई
इसके ठीक उलट सागर जिले में भाजपा के वरिष्ठ कार्यकर्ता देवेंद्र कटारे के मामले में संगठन का रुख काफी सख्त नजर आया। देवेंद्र कटारे को हाल ही में भाजपा की कार्यकारिणी में शामिल करते हुए कार्यालय मंत्री बनाया गया था। लेकिन इसके बाद सोशल मीडिया पर संगठन के फैसलों को लेकर कुछ आपत्तिजनक पोस्ट सामने आईं। इन पोस्ट को पार्टी ने अनुशासनहीनता मानते हुए तुरंत नोटिस जारी कर दिया। नोटिस का जवाब देने के बाद भी संगठन संतुष्ट नहीं हुआ और उन्हें कार्यालय मंत्री के पद से हटा दिया गया।
कार्यकर्ताओं में बढ़ी नाराजगी
इन दो अलग-अलग घटनाओं के बाद पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा तेज हो गई है।
कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि अनुभव और लंबे समय से संगठन के लिए काम करने के बावजूद उन्हें अपेक्षित सम्मान या अवसर नहीं मिल पाता। इसके उलट प्रभावशाली नेताओं को अक्सर विवादित बयानों के बावजूद संगठनात्मक संरक्षण मिल जाता है।
मंत्रियों की बयानबाजी पर भी उठते रहे सवाल
मध्यप्रदेश की राजनीति में कई बार ऐसे मौके आए हैं जब कुछ मंत्रियों के विवादित या अनर्गल बयान सुर्खियों में रहे। इन बयानों से सरकार और संगठन दोनों की छवि पर असर पड़ा, लेकिन अधिकतर मामलों में किसी बड़े नेता पर औपचारिक अनुशासनात्मक कार्रवाई देखने को नहीं मिली। यही वजह है कि संगठन के अंदर यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि अनुशासन की तलवार अक्सर छोटे कार्यकर्ताओं पर ही चलती है।
जमीनी कार्यकर्ता ही क्यों बनते हैं निशाना?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठन में पद और प्रभाव की राजनीति भी इस स्थिति के पीछे एक कारण हो सकती है। कई नेता अपने वर्चस्व को बनाए रखने की कोशिश में रहते हैं।
सत्ता में बैठे लोगों का प्रभाव संगठन पर भी दिखाई देता है। नतीजा यह होता है कि सख्ती का असर अक्सर नीचे के स्तर पर ही दिखता है।
सबसे बड़ा सवाल: अनुशासन या चयनात्मक कार्रवाई?
मध्यप्रदेश भाजपा संगठन लगातार अनुशासन और संगठनात्मक मर्यादा की बात करता है। लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अनुशासन की नीति सभी पर समान रूप से लागू हो रही है या फिर चयनात्मक तरीके से। जब तक संगठन इस पर स्पष्ट और पारदर्शी रुख नहीं दिखाता, तब तक यह बहस जारी रहना तय माना जा रहा है।
बीते दिनों में हुई कुछ चर्चित घटनाएं
मध्य प्रदेश भाजपा में अनुशासन के मामलों को लेकर संगठन की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं। सामान्य कार्यकर्ताओं पर तुरंत कार्रवाई होती है, लेकिन जब मामला विधायकों या रसूखदार नेताओं का आता है तो अक्सर कार्रवाई तलब और समझाइश तक ही सीमित नजर आती है।
कुछ समय पूर्व मऊगंज के भाजपा विधायक प्रदीप पटेल को पार्टी संगठन ने भोपाल तलब किया था। पटेल एक मामले में खुद “गिरफ्तारी देने” थाने पहुंच गए थे, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। इसके बाद भोपाल में मुख्यमंत्री मोहन यादव, प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा और संगठन मंत्री हितानंद शर्मा ने उनसे बंद कमरे में चर्चा की।
इसी तरह भिंड विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाह को भी संगठन ने भोपाल बुलाया था। कलेक्टर के साथ तीखी बहस और हाथापाई जैसे विवाद का वीडियो सामने आने के बाद उनसे प्रदेश प्रभारी और संगठन के वरिष्ठ नेताओं ने सवाल-जवाब कर समझाइश दी।
वहीं पिछोर विधायक प्रीतम लोधी को भी उनके बयानों को लेकर पार्टी संगठन ने भोपाल तलब किया था। लोधी के कई बयान पहले भी विवाद का कारण बने हैं, जिस पर संगठन को दखल देना पड़ा।
इन घटनाओं के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि भाजपा में अनुशासन को लेकर दोहरा पैमाना अपनाया जा रहा है। छोटे कार्यकर्ताओं पर जहां तुरंत नोटिस और कार्रवाई हो जाती है, वहीं विधायकों और प्रभावशाली नेताओं के मामलों में अक्सर कार्रवाई तलब और समझाइश तक सीमित रह जाती है।
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