संगठन के सामने फूटा मंत्रियों का असंतोष, क्या अब मंत्रियों को मिलेगा सम्मान?
समझें पूरा मामला...
- कई राज्यमंत्रियों ने विभागों में वास्तविक अधिकार न मिलने की शिकायत की।
- बड़े और प्रभावशाली मंत्री विभागों की पूरी कमान अपने हाथ में रखते हैं।
- जूनियर मंत्रियों को औपचारिक जिम्मेदारियां देकर किनारे कर दिया गया।
- संगठन ने परफॉर्मेंस रिपोर्ट कार्ड के आधार पर चेतावनी दी।
- मंत्रिमंडल विस्तार में कमजोर प्रदर्शन वाले नेताओं पर कार्रवाई संभव।
मध्यप्रदेश की डॉ. मोहन यादव सरकार में अब मंत्रियों के बीच खींचतान खुलकर सामने आने लगी है। लंबे समय से जिम्मेदारी संभाल रहे कई राज्यमंत्रियों ने सत्ता और संगठन के सामने अपनी नाराजगी दर्ज कराई है।
आरोप है कि बड़े और प्रभावशाली मंत्रियों ने विभागों की पूरी कमान अपने हाथ में रख ली है, जबकि जूनियर मंत्रियों को सिर्फ औपचारिक जिम्मेदारियां देकर किनारे कर दिया गया है।
सूत्रों के मुताबिक, कई राज्यमंत्रियों के पास न ट्रांसफर की शक्ति है, न विभागीय फैसलों में दखल। हालत यह है कि कुछ मंत्री मंत्रालय जाने तक से बच रहे हैं और कैबिनेट बैठकों में भी उनकी सक्रियता कम दिखाई दे रही है। अब बीजेपी संगठन ने इसे केवल नाराजगी नहीं, बल्कि सरकार की कार्यप्रणाली से जुड़ा गंभीर संकेत माना है।
संगठन की सख्ती के पीछे क्या है बड़ा कारण?
‘परफॉर्मेंस रिपोर्ट कार्ड’ ने मंत्रियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। बीजेपी संगठन ने हाल ही में मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा की। इसमें केवल प्रशासनिक प्रदर्शन ही नहीं, बल्कि बयानबाजी, विभागीय विवाद, जनता की शिकायतें और संगठनात्मक छवि को भी आधार बनाया गया।
आगामी मंत्रिमंडल विस्तार से पहले तैयार हुई इस रिपोर्ट ने कई दिग्गज मंत्रियों की चिंता बढ़ा दी है। संगठन का साफ संकेत है कि केवल राजनीतिक वजन के दम पर अब कुर्सी सुरक्षित नहीं रहने वाली।
बताया जा रहा है कि 17 और 18 तारीख को मंत्रियों से अलग-अलग स्तर पर फीडबैक लिया गया। इसके आधार पर सत्ता और संगठन ने अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत कर ली है, ताकि भविष्य में किसी बड़े नेता द्वारा दबाव बनाने की स्थिति में भी फैसले लेना आसान रहे।
राज्यमंत्रियों का दर्द
काम नहीं, सिर्फ नाम का पद है। राज्यमंत्रियों की सबसे बड़ी शिकायत यही बताई जा रही है कि उन्हें विभागों में कोई वास्तविक अधिकार नहीं दिए गए।
प्रमुख आरोप इस प्रकार हैं-
- विभागों में फैसले केवल कैबिनेट मंत्री ले रहे हैं।
- कई राज्यमंत्रियों के पास एक ट्रांसफर तक की शक्ति नहीं।
- फाइलों और बैठकों में भी सीमित भूमिका।
मंत्रालय में उपस्थिति सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई
कई मंत्री खुद को “सिर्फ बोर्ड पर लिखे नाम” जैसा महसूस कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, कुछ राज्यमंत्रियों ने सीधे संगठन के वरिष्ठ नेताओं और मुख्यमंत्री के सामने यह मुद्दा उठाया। इसके बाद संगठन ने इसे गंभीर राजनीतिक असंतोष के रूप में दर्ज किया है।
अब निशाने पर बड़े मंत्री
बयानबाजी, घोटाले और सुस्त कामकाज पर नाराजगी बढ़ गई है। समीक्षा बैठक में कई मंत्रियों के कामकाज और विवादों को लेकर संगठन ने कड़ा रुख अपनाया है। जिन मंत्रियों को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा है, उनमें विभागीय विवाद, सार्वजनिक बयान और क्षेत्रीय असंतोष जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।
राव उदय प्रताप सिंह का नाम परिवहन विभाग से जुड़े विवादों और स्कूल शिक्षा विभाग में खरीद मामलों को लेकर चर्चा में रहा। वहीं विजय शाह विवादित बयान और विभागीय सुस्ती को लेकर सवालों में हैं। प्रतिमा बागरी को पारिवारिक विवादों और अपने क्षेत्र में राजनीतिक पकड़ कमजोर होने के कारण आलोचना झेलनी पड़ी।
नागर सिंह चौहान पर क्षेत्र में अवैध शराब कारोबार को लेकर शिकायतें सामने आईं, जबकि संपतिया उइके के विभाग पर जल जीवन मिशन की धीमी प्रगति को लेकर सवाल उठे। नारायण सिंह पंवार की बयानबाजी भी संगठन की नाराजगी का कारण बनी।
बोट बैंक की राजनीति भी बनी वजह?
आदिवासी-OBC समीकरण के कारण सभी की नजर कार्रवाई पर है। बीजेपी संगठन के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब राजनीतिक संतुलन की मानी जा रही है। जिन नेताओं पर सवाल उठ रहे हैं, उनमें कई ऐसे चेहरे शामिल हैं जो आदिवासी, एससी, एसटी और ओबीसी वोट बैंक में प्रभाव रखते हैं।
यही वजह है कि संगठन की सख्ती और राजनीतिक मजबूरी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश चल रही है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या संगठन वास्तव में कार्रवाई करेगा या फिर सामाजिक समीकरणों के दबाव में मामला ठंडा पड़ जाएगा।
कई रसूखदार चेहरों पर भी खतरा
सूत्रों के मुताबिक अगले महीने मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल लगभग तय माना जा रहा है। बेहतर प्रदर्शन करने वाले नेताओं को प्रमोशन मिल सकता है, जबकि लगातार विवादों में रहने वाले या कमजोर प्रदर्शन वाले मंत्रियों की छुट्टी हो सकती है।
संगठन ने साफ संकेत दिए हैं कि केवल बयानबाजी, प्रचार और राजनीतिक लॉबिंग से अब काम नहीं चलेगा। जो मंत्री विभागीय कामकाज में कमजोर पाए गए या केवल वाहवाही लूटने तक सीमित रहे, उनकी भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
सत्ता बनाम संगठन!
अंदरूनी संघर्ष अब खुलकर सतह पर आ गया है। मध्यप्रदेश बीजेपी में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि सत्ता और संगठन के बीच यह खींचतान आखिर कहां जाकर रुकेगी। एक तरफ दिग्गज मंत्री अपनी पकड़ बचाने में जुटे हैं, तो दूसरी ओर संगठन “परफॉर्मेंस मॉडल” के जरिए नियंत्रण मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
राज्यमंत्रियों की नाराजगी ने यह भी साफ कर दिया है कि सरकार के भीतर सबकुछ सामान्य नहीं है। आने वाले दिनों में मंत्रिमंडल विस्तार केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि बीजेपी के अंदर शक्ति संतुलन की नई तस्वीर भी तय कर सकता
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