हेमंत खंडेलवाल की दिल्ली मुलाकात के बाद MP BJP में बड़े फेरबदल के संकेत
समझें क्या है पूरा मामला...
- दतिया हार के बाद संगठन की समीक्षा तेज
- हेमंत-नितिन मुलाकात से चर्चाओं को हवा
- कई जिलों में बदलाव की अटकलें तेज
- सूखदार नेताओं के प्रभाव पर उठे सवाल
- निकाय चुनाव से पहले संगठन का टेस्ट
दतिया उपचुनाव में हार के बाद मध्यप्रदेश भाजपा संगठन में अब सिर्फ समीक्षा नहीं, बल्कि बड़े बदलाव की आहट सुनाई दे रही है। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात के बाद संगठन के भीतर चर्चाएं तेज हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक कई जिलों में संगठनात्मक प्रदर्शन का आकलन चल रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अब रसूख नहीं, सीधे परफॉर्मेंस जिलाध्यक्षों का भविष्य तय करेगी?
दिल्ली से MP संगठन तक हलचल
दतिया के नतीजे ने मध्यप्रदेश भाजपा के संगठनात्मक ढांचे को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं। उपचुनाव में पार्टी को मिली हार के बाद प्रदेश नेतृत्व लगातार मंथन में जुटा है।
इसी सिलसिले में हेमंत खंडेलवाल ने दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात की। सार्वजनिक तौर पर इसे संगठन और आगामी रणनीति पर चर्चा बताया गया है। लेकिन राजनीतिक संकेत इससे कहीं आगे जाते दिखाई दे रहे हैं।
पार्टी के भीतर चर्चा है कि अब प्रदेश संगठन को ज्यादा स्वतंत्र तरीके से फैसले लेने की गुंजाइश मिल सकती है। अगर ऐसा हुआ तो लंबे समय से प्रभावशाली नेताओं के भरोसे चल रही स्थानीय संगठनात्मक राजनीति को झटका लगना तय माना जा रहा है।
‘रसूख’ बनाम ‘रिपोर्ट कार्ड’ की लड़ाई
भाजपा के भीतर जिलाध्यक्षों की नियुक्ति को लेकर हमेशा से स्थानीय समीकरण महत्वपूर्ण रहे हैं। पिछले संगठनात्मक फेरबदल में भी जिलाध्यक्षों की बड़ी संख्या में नियुक्तियां हुई थीं। अब चर्चा यह है कि अगले चरण में सिर्फ राजनीतिक सिफारिश या किसी बड़े नेता की पसंद पर्याप्त नहीं होगी।
यही बदलाव उन नेताओं के लिए परेशानी पैदा कर सकता है, जिनका संगठन में प्रभाव तो मजबूत है, लेकिन जमीनी रिपोर्ट उतनी मजबूत नहीं मानी जा रही।
कई जिलों पर क्यों टिकी नजर?
पार्टी से जुड़े सूत्रों के मुताबिक कई जिलों में संगठन की स्थिति को लेकर अंदरूनी समीक्षा की चर्चा है। इनमें सिवनी, नर्मदापुरम, टीकमगढ़, उमरिया, रायसेन और खरगोन जैसे जिलों के नाम चर्चा में बताए जा रहे हैं। हालांकि इन जिलों में बदलाव का कोई आधिकारिक फैसला अभी सामने नहीं आया है।
दतिया ने खोली संगठन की कमजोर कड़ी?
दतिया का घटनाक्रम इस पूरी कवायद का बड़ा ट्रिगर माना जा रहा है। उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार को कांग्रेस के घनश्याम सिंह से 6,016 वोटों से हार मिली। इसके बाद दतिया की जिला इकाई को भंग कर नए सिरे से संगठन खड़ा करने की प्रक्रिया शुरू होने की खबर सामने आई।
अब सवाल दतिया से आगे निकल चुका है। प्रदेश नेतृत्व यह देखना चाहता है कि कहीं दूसरे जिलों में भी संगठन कागज पर मजबूत और जमीन पर कमजोर तो नहीं है।
महिला नेताओं और नए चेहरों पर दांव?
संभावित फेरबदल में कुछ महिला पदाधिकारियों को प्रदेश स्तर पर बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने की चर्चा भी है। ऐसा हुआ तो उनके जिलों में नए चेहरों को मौका मिल सकता है। यह रणनीति संगठन में पीढ़ीगत बदलाव और नए कार्यकर्ताओं को आगे लाने की कोशिश के रूप में देखी जा सकती है। हालांकि इस पर भी अंतिम फैसला सामने नहीं आया है।
निकाय चुनाव से पहले बड़ा संगठनात्मक टेस्ट
आने वाले नगरीय निकाय चुनाव भाजपा संगठन के लिए बड़ा टेस्ट होंगे। विधानसभा चुनाव से पहले स्थानीय स्तर पर बूथ नेटवर्क और कार्यकर्ताओं की सक्रियता मजबूत रखना पार्टी के लिए जरूरी होगा।
अगर जिलाध्यक्ष जमीन पर संगठन को सक्रिय नहीं कर पा रहे हैं, तो प्रदेश नेतृत्व के पास बदलाव का आधार तैयार हो सकता है। यानी आने वाले दिनों में सिर्फ चेहरा नहीं बदलेगा, बल्कि यह संदेश भी दिया जा सकता है कि संगठन में पद अब प्रदर्शन से जुड़ा है।
अब असली सवाल: किसका चलेगा प्रभाव?
हेमंत खंडेलवाल की दिल्ली मुलाकात को फिलहाल संगठनात्मक चर्चा के रूप में ही सामने रखा गया है। लेकिन दतिया हार के बाद जिस तरह संगठन की समीक्षा और बदलाव की चर्चाएं तेज हुई हैं, उससे प्रदेश भाजपा में नई राजनीतिक पटकथा लिखे जाने के संकेत जरूर मिल रहे हैं।
अगर प्रदेश नेतृत्व को वास्तव में व्यापक स्वतंत्रता मिलती है, तो आने वाले दिनों में कई जिलों में चेहरे बदल सकते हैं। और सबसे बड़ा संदेश यही होगा कि संगठन में अब रसूख चलेगा या रिपोर्ट कार्ड?
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