अफसरों की गलती से मध्यप्रदेश के युवाओं की नौकरी पर संकट! कहीं मान्य, कहीं अमान्य जाति प्रमाणपत्र, आखिर जिम्मेदार कौन?
इसकी वजह से मध्यप्रदेश के बाहर दस्तावेज सत्यापन कराने पहुंचे उम्मीदवारों की दावेदारी खारिज हो रही है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, केंद्रीय विद्यालय संगठन और नवोदय विद्यालय समिति की एक भर्ती परीक्षा हुई थी। साल 2025 में टीचिंग और नॉन-टीचिंग पदों पर भर्ती निकली थी। इसमें मध्यप्रदेश के भी कुछ युवाओं का चयन हुआ था। लिखित परीक्षा पास करने के बाद उम्मीदवारों को इंटरव्यू देना था। इसके लिए भुवनेश्वर के गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ फिजिकल एजुकेशन (Government College of Physical Education) बुलाया गया। मध्यप्रदेश के लगभग 12 उम्मीदवार भी यहां इंटरव्यू देने पहुंचे थे।
उम्मीदवारों ने बताया कि भर्ती में केंद्र सरकार की ओबीसी सूची को मान्यता दी गई थी। यानी केंद्र सरकार की ओबीसी सूची में शामिल जातियों का वैध प्रमाणपत्र होना जरूरी था। नोटिफिकेशन के मुताबिक प्रमाणपत्र एक जनवरी 2025 से चार दिसंबर 2025 के बीच जारी होना चाहिए। दूसरी शर्त के मुताबिक जाति प्रमाणपत्र भारत सरकार के निर्धारित प्रारूप में होना जरूरी था।
पुराने प्रमाणपत्र के संदर्भ पर जताई आपत्ति
उम्मीदवारों का आरोप है कि उनके ओबीसी प्रमाणपत्रों को मान्य नहीं किया गया। इसकी वजह नए प्रमाणपत्रों में पुराने ओबीसी प्रमाणपत्रों का संदर्भ दर्ज होना बताया गया। उदाहरण के लिए किसी उम्मीदवार का पुराना ओबीसी प्रमाणपत्र साल 2015 में बना था। उसके नए प्रमाणपत्र में उसी पुराने प्रमाणपत्र का संदर्भ दर्ज किया गया था। प्रमाणपत्र अमान्य करने की दूसरी वजह उनके ऑनलाइन जारी नहीं होने को बताया गया। उम्मीदवारों को कहा गया कि प्रमाणपत्र ऑनलाइन जारी नहीं हुए हैं। इसलिए इन्हें मान्य नहीं किया जा सकता।
सभी उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित
इसी आधार पर सभी उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित कर दिया गया। हालांकि, उम्मीदवारों ने द सूत्र को दूसरी जगहों पर हुए इंटरव्यू की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि चंडीगढ़ और लखनऊ में मध्यप्रदेश के अन्य उम्मीदवारों का चयन हुआ था। वहां इसी तरह हाथ से बने प्रमाणपत्रों के आधार पर उम्मीदवारों को चयनित किया गया। यानी एक ही परीक्षा में दस्तावेज सत्यापन के अलग-अलग नियम अपनाए जा रहे हैं।
द सूत्र की पड़ताल में क्या सामने आया?
द सूत्र ने इस मामले की पड़ताल की। इसमें पता चला कि मध्यप्रदेश में लोक सेवा गारंटी कानून(Public Service Guarantee Act) लागू होने के बाद प्रक्रिया बदली थी। इसके बाद जाति प्रमाणपत्र ऑनलाइन जारी किए जाने लगे थे। यानी साल 2010 के बाद जाति प्रमाणपत्र ऑनलाइन बनाए जाते हैं। इनमें एसडीएम के डिजिटल हस्ताक्षर और अन्य जरूरी जानकारियां दर्ज होती हैं। इससे प्रमाणपत्र की प्रामाणिकता सुनिश्चित होती है। साथ ही यह स्पष्ट होता है कि प्रमाणपत्र नियमानुसार जारी किया गया है।
उम्मीदवारों ने क्या कहा?
उम्मीदवारों ने द सूत्र को बताया कि मध्यप्रदेश के सभी ओबीसी अभ्यर्थियों को अयोग्य घोषित किया गया। उनका आरोप है कि यह कार्रवाई गलत तरीके से की गई। उम्मीदवारों ने कहा, हमारे पास भारत सरकार के निर्धारित प्रारूप वाला वैध केंद्रीय ओबीसी प्रमाणपत्र है। यह प्रमाणपत्र नोटिफिकेशन की कटऑफ तारीख से पहले जारी हुआ था। इसके बावजूद भुवनेश्वर के पैनल ने सभी को रिजेक्ट कर दिया। पैनल ने कहा कि प्रमाणपत्र साल 2015 के पुराने जाति प्रमाणपत्र के आधार पर बना है।
कॉलेज से क्या जानकारी मिली?
द सूत्र को इस मामले में एक और जानकारी मिली है। मामला तूल पकड़ने के बाद भुवनेश्वर के गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ फिजिकल एजुकेशन (Government College of Physical Education) ने कदम उठाया है। कॉलेज ने इन उम्मीदवारों को इंटरव्यू के लिए फिर बुला लिया है। हालांकि, इस पूरे मामले में कई सवाल खड़े हो रहे हैं। किसी अधिकारी की गलती का खामियाजा उम्मीदवारों को क्यों भुगतना पड़ा?
इन उम्मीदवारों के जाति प्रमाणपत्र पुराने तरीके से क्यों जारी किए गए? अगर उम्मीदवारों को दोबारा इंटरव्यू के लिए नहीं बुलाया जाता, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेता? जिन उम्मीदवारों की जॉइनिंग अटकी है, उनमें शहडोल जिले की एक महिला उम्मीदवार भी शामिल है। द सूत्र ने मामले की जानकारी के लिए शहडोल कलेक्टर पार्थ जायसवाल से संपर्क किया। हालांकि, उनसे बात नहीं हो सकी।