MP छात्रसंघ चुनाव डायरेक्ट या इनडायरेक्ट? सस्पेंस के बीच तैयारियों में कूदे छात्र संगठन

Amresh Kushwaha | Sept 01, 2026, 14:15 IST
MP छात्रसंघ चुनाव की तैयारी
मध्य प्रदेश में 2017 के बाद 2026 में छात्रसंघ चुनाव की वापसी होने जा रही है। हाईकोर्ट के कड़े रुख के बाद सितंबर 2026 के अकादमिक कैलेंडर में चुनाव कराने का निर्णय लिया गया है। हालांकि, चुनाव प्रत्यक्ष होंगे या अप्रत्यक्ष यह सस्पेंस अब भी बरकरार है।

समझें क्या है मामला...

  • मध्य प्रदेश में 2017 के बाद से छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए हैं।
  • हाईकोर्ट के आदेश पर सरकार ने 2026-27 का अकादमिक कैलेंडर पेश किया है।
  • इसमें सितंबर 2026 में चुनाव कराने का प्रावधान है।
  • कांग्रेस ने पहले ही 13 जोन इंचार्ज नियुक्त कर दिए हैं।
  • ABVP, NSUI के अलावा अब जयस भी उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है।
  • चुनाव प्रत्यक्ष होंगे या अप्रत्यक्ष, यह अभी तय नहीं हुआ है।

यह आपसे क्यों जुड़ा है?

अगर आपके घर में कोई कॉलेज जाने वाला बच्चा है, तो यह खबर सीधे उससे जुड़ी है। छात्रसंघ चुनाव सिर्फ एक पद की लड़ाई नहीं होते। यह वो मंच है जहां हॉस्टल की खराब सुविधा, फीस बढ़ोतरी और लैब में उपकरणों की कमी जैसे मुद्दे उठाए जाते हैं। नौ साल से यह आवाज दबी हुई थी। अब वो लौटने वाली है।



पहले क्या था

2003 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने प्रत्यक्ष छात्रसंघ चुनाव बंद कर दिए थे। इसके बाद कक्षा प्रतिनिधियों के जरिए अप्रत्यक्ष चुनाव होते रहे।



2006 में उज्जैन के माधव कॉलेज में प्रोफेसर एच एस सभरवाल की चुनाव को लेकर हुए विवाद में हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने पूरे प्रदेश को हिला दिया। इसके बाद चुनाव पूरी तरह रोक दिए गए। सुप्रीम कोर्ट ने इसी दौर में लिंगदोह समिति की सिफारिशें लागू करवाईं, ताकि चुनावों में हिंसा और राजनीतिक दखल कम हो सके।



एमपी में छात्रसंघ चुनाव पर क्या हुआ और क्यों

2017 में चुनाव दोबारा शुरू तो हुए, लेकिन उसके बाद फिर सन्नाटा छा गया था। कोरोना और दूसरी वजहों से नौ साल तक कोई चुनाव नहीं हुआ था। इस बीच छात्रों से छात्रसंघ के नाम पर फीस वसूली जाती रही, जबकि कोई निर्वाचित प्रतिनिधि था ही नहीं।



यहीं से मामला अदालत तक पहुंचा था। जबलपुर के छात्र नेता अदनान अंसारी ने जनहित याचिका दाखिल की थी। उन्होंने अदालत को बताया कि 2017 के बाद चुनाव नहीं हुए, फिर भी शुल्क वसूला जाता रहा है।



15 जुलाई 2026 को हाईकोर्ट ने सरकार से अकादमिक कैलेंडर मांगा था। 3 अगस्त को सरकार ने कैलेंडर पेश किया, जिसमें सितंबर में चुनाव का प्रावधान था। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की बेंच ने इसे रिकॉर्ड पर लेते हुए सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में चुनाव कराने के निर्देश दिए थे।



इसे एक सिस्टम रीबूट की तरह समझिए। जैसे कोई कंप्यूटर सालों से बंद पड़ा हो और अचानक ऑन करने का आदेश आ जाए। सॉफ्टवेयर तो वही पुराना है, लेकिन उसे चलाने वाले हाथ नए हैं। आज के ज्यादातर कॉलेज छात्रों ने कभी वोट ही नहीं डाला।



राष्ट्रीय स्तर पर भी छात्र राजनीति गरम है। दिल्ली में नीट पेपर लीक को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के दबाव में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 25 जुलाई 2026 को इस्तीफा दे दिया था। इस माहौल का असर मध्य प्रदेश की कैंपस राजनीति पर भी दिख रहा है।



छात्रसंघ चुनाव में कौन कौन शामिल है?

ABVP प्रदेश की सबसे पुरानी छात्र ताकत है और साल भर कैंपस में सक्रिय रहने के दावे पर चुनाव लड़ने जा रही है। इंदौर में कलेक्टर दफ्तर के बाहर बैरिकेड तोड़ने वाला प्रदर्शन इसी अभियान का हिस्सा था।



NSUI कांग्रेस का छात्र संगठन है और प्रत्यक्ष चुनाव तथा महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग कर रहा है। कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के निर्देश पर 13 जोन में इंचार्ज नियुक्त किए हैं।



जय आदिवासी युवा शक्ति यानी जयस पहली बार सीधे छात्र राजनीति में उतरा है। संगठन का फोकस आदिवासी बहुल मालवा निमाड़ इलाके पर है।



करणी सेना परिवार जैसे छोटे संगठन भी भोपाल के कुछ कॉलेजों में उम्मीदवार उतारने की तैयारी में हैं।



दोनों साइड की बात

NSUI का कहना है कि सरकार ने अभी तक चुनाव के लिए जरूरी अधिसूचना जारी नहीं की, इसलिए उसकी मंशा पर सवाल है। यह संगठन का आरोप है, आधिकारिक पुष्टि नहीं।



दूसरी ओर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का कहना है कि चुनाव प्रणाली पर फैसला छात्र संगठनों से बातचीत के बाद होगा। यानी सरकार का पक्ष है कि प्रक्रिया चल रही है, देरी जानबूझकर नहीं है।



तो सवाल यह है, प्रत्यक्ष चुनाव होंगे या अप्रत्यक्ष? इसका जवाब अभी किसी के पास नहीं है।



आगे क्या होगा

सितंबर नजदीक है, लेकिन चुनाव की तारीख अभी तय नहीं हुई है। अगर सरकार जल्द अधिसूचना जारी नहीं करती, तो एनएसयूआई पहले ही आंदोलन की चेतावनी दे चुका है। चुनाव प्रणाली पर फैसला आते ही असली मुकाबला शुरू होगा, खासकर उन कॉलेजों में जहां आदिवासी विद्यार्थियों की संख्या बड़ी है।



एक बात जो आप नहीं जानते थे

2017 में जो चुनाव हुए थे, वो पूरी तरह प्रत्यक्ष नहीं थे। कक्षा प्रतिनिधि चुने जाते थे और फिर वही आगे अध्यक्ष जैसे पदों के लिए वोट करते थे। यानी आम छात्र का सीधा वोट कभी अध्यक्ष पद तक पहुंचा ही नहीं। इस बार यही मांग सबसे ज्यादा जोर पकड़ रही है।



अब आप क्या करें: अगर आपके परिवार में कोई छात्र है, तो कॉलेज से चुनाव अधिसूचना की जानकारी जरूर लें।


क्यों अभी: नामांकन की तारीखें बिना पूर्व सूचना के जल्दी आ सकती हैं।


आगे देखें: सरकार की चुनाव अधिसूचना और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रणाली का फैसला।



यह खबर क्यों जरूरी है?

यह मामला सीधे संविधान के प्रतिनिधित्व और अभिव्यक्ति के अधिकार से जुड़ा है। लाखों छात्रों को नौ साल तक निर्वाचित प्रतिनिधि के बिना रखा गया, जबकि शुल्क वसूला जाता रहा। यह पारदर्शिता और जवाबदेही का सवाल है। हाईकोर्ट का हस्तक्षेप दिखाता है कि संस्थागत जवाबदेही न्यायिक निगरानी से ही सुनिश्चित हो पाई। सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था में युवाओं की आवाज बहाल करना लोकतांत्रिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।



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