एमपी पायलट भर्ती घोटाला: जिसने कभी बॉम्बार्डियर उड़ाया ही नहीं, उसे बना दिया सीएम मोहन यादव के विमान का पायलट
मध्यप्रदेश के विमानन विभाग का पायलट भर्ती घोटाला गहराता जा रहा है। द सूत्र की पड़ताल में एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। आउटसोर्स कंपनी के जरिए जिस पायलट को 235 करोड़ रुपए के नए विमान का पायलट इन कमांड (PIC) बनाया गया है, उसके पास इसे उड़ाने का अनुभव ही नहीं है। अब मध्य प्रदेश सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर इस पायलट को ट्रेनिंग दिलवाएगी और विमान उड़ाने का अनुभव दिलवाएगी। ऊपर से इस बात की कोई गारंटी नहीं कि पायलट कब तक इस काम को करेगा!
इतना ही नहीं, 27 मार्च 2026 की डीजीसीए गाइडलाइन के अनुसार वीआईपी और वीवीआईपी उड़ानों के लिए तय पात्रता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यानी जिस पायलट पर सरकार हर महीने करीब 27 से 29 लाख रुपए खर्च करेगी, वह नियुक्ति के साथ ही मुख्यमंत्री का विमान नहीं उड़ा सकेगा। पहले उसे विदेश में विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। उसके बाद भी वीआईपी उड़ानों के लिए अतिरिक्त उड़ान अनुभव हासिल करना होगा।
द सूत्र ने अपनी पहली पड़ताल में खुलासा किया था कि जिस पायलट को सरकार सीधे करीब 4 लाख रुपए प्रतिमाह में नियुक्त कर सकती थी, उसी पद के लिए आउटसोर्स कंपनी को कई गुना अधिक भुगतान का रास्ता बनाया गया है। भर्ती नियमों, टेंडर प्रक्रिया और बढ़े हुए भुगतान पर गंभीर सवाल उठे थे। अब दूसरी पड़ताल उन सवालों को और गहरा करती है।
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समझिए पूरा मामला
मध्यप्रदेश सरकार अगस्त 2026 में अपने विमानन बेड़े में 235 करोड़ रुपए का बॉम्बार्डियर चैलेंजर-3500 बिजनेस जेट शामिल करने जा रही है। डीजीसीए की सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं। इसके अलावा सरकार करीब 170 करोड़ रुपए का अत्याधुनिक H160 हेलिकॉप्टर भी खरीद रही है, जिसे जनवरी 2027 तक बेड़े में शामिल किया जाना है।
इन दोनों के संचालन के लिए विमानन विभाग ने एयरो एयरक्राफ्ट सेल्स एंड चार्टर्स प्राइवेट लिमिटेड को आउटसोर्स टेंडर दिया है। इसी कंपनी को पायलट इन कमांड, फर्स्ट ऑफिसर, फ्लाइट ऑपरेशन मैनेजर और डिस्पैचर जैसे तकनीकी कर्मचारी उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी दी गई है।
किसे बनाया पायलट इन कमांड?
दस्तावेजों के अनुसार, कंपनी ने कैप्टन अरविंद सिंह का चयन किया है, जो पहले अकासा एयरलाइंस में कार्यरत थे। सरकार आउटसोर्स पायलट अरविंद सिंह पर हर महीने करीब 27 से 28 लाख रुपए खर्च करेगी। इसके बावजूद वे नए सरकारी जेट को तुरंत नहीं उड़ा सकेंगे, क्योंकि उन्हें पहले बॉम्बार्डियर चैलेंजर-3500 की विशेष ट्रेनिंग के लिए अमेरिका भेजा जाएगा।
सूत्रों के अनुसार, इस प्रशिक्षण पर करीब 80 लाख रुपए खर्च होने का अनुमान है। यानी सरकार पहले हर महीने लाखों रुपए देगी, फिर प्रशिक्षण का पूरा खर्च भी उठाएगी।
ट्रेनिंग के बाद भी मुख्यमंत्री के साथ उड़ान नहीं
अमेरिका में प्रशिक्षण पूरा होने के बाद भी कैप्टन अरविंद सिंह तत्काल मुख्यमंत्री या अन्य वीवीआईपी के साथ उड़ान नहीं भर सकेंगे। इसके लिए उन्हें पहले खाली विमान पर करीब 100 घंटे अतिरिक्त उड़ान भरनी होगी, क्योंकि उन्होंने पहले कभी बॉम्बार्डियर चैलेंजर-3500 नहीं उड़ाया है।
इस पूरी प्रक्रिया पर करीब 8 से 10 करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च आने का अनुमान है। एक घंटे की उड़ान की लागत करीब 8 लाख रुपए बताई गई है।यानी जिस पायलट को करोड़ों रुपए खर्च कर तैयार किया जाएगा, वह नियुक्ति के समय वीआईपी उड़ानों के लिए तैयार नहीं होगा।
क्या कहते हैं डीजीसीए के नियम
डीजीसीए यानी डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन के 27 मार्च 2026 के नियमों के हिसाब से भी कैप्टन अरविंद सिंह फिट नहीं बैठते हैं। दरअसल, विमानों के लिए डीजीसीए ने गाइड लाइन दी है कि पायलट के पास 3000 घंटे की फ्लाइंग होनी चाहिए, मतलब सफर किया हो। यदि पायलट इसे उड़ा रहा है तो उसके पास इसी विमान में पायलट इन कमांड के रूप में 2000 घंटे अनुभव होना चाहिए। अरविंद सिंह इन योग्यताओं को पूरा नहीं करते हैं।
वहीं बॉम्बार्डियर चैलेंजर जैसे विमानों के लिए गाइड लाइन है कि इस पर पायलट इन कमांड के रूप में 75 घंटे का अनुभव होना चाहिए, जो अरविंद सिंह पूरा नहीं करते हैं, क्योंकि अभी तक उन्होंने बॉम्बार्डियर चैलेंजर में उड़ान ही नहीं भरी है।
अब उन्हें इन्स्ट्रक्टर के साथ कम से कम 100 घंटे की उड़ान भरनी होगी और 75 घंटे का अनुभव लेना होगा, तब कहीं जाकर वे सीएम का विमान उड़ा सकेंगे। अब सोचिए, ये कितनी लंबी और खर्ची प्रक्रिया है।
दो वर्षों से उड़ान नहीं भरी?
नवनियुक्त पायलट अरविंद सिंह की नियुक्ति मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव के विमान के लिए की गई है, लेकिन दस्तावेजों और सूत्रों के आधार पर कई सवाल सामने आ रहे हैं।
- क्या उनका पुलिस वेरिफिकेशन कराया गया?
- क्या पिछली कंपनी से एनओसी ली गई?
- क्या उन्होंने आवश्यक नोटिस अवधि पूरी की?
- वीआईपी और वीवीआईपी उड़ानों की पात्रता की जांच किस आधार पर की गई?
यदि यह सही है कि पिछले दो वर्षों से उन्होंने उड़ान नहीं भरी, तो ऐसे पायलट का चयन क्यों किया गया? इन सवालों के जवाब अब तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।
सीनियर पायलट को जूनियर ट्रेनिंग क्यों?
एक और सवाल विभाग के वरिष्ठ पायलट कैप्टन विश्वास राय को लेकर भी उठ रहा है। वे पहले से सीनियर पायलट के पद पर कार्यरत हैं और उसी पद का वेतन भी प्राप्त कर रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें जूनियर पायलट या को-पायलट स्तर की ट्रेनिंग पर भेजने की तैयारी क्यों की जा रही है? उन्हें शासन स्तर पर पायलट की ट्रेनिंग की अनुमति पहले ही मिल चुकी है और वे डीजीसीए के मानकों के अनुसार भी पात्र बताए जाते हैं।
करोड़ों खर्च... फिर भी बैकअप नहीं?
इस मामले का एक और अहम पहलू भी सामने आया है। यदि किसी कारण से आउटसोर्स पायलट उपलब्ध नहीं रहता, तो क्या कंपनी के पास उसका प्रशिक्षित विकल्प मौजूद है? कंपनी के पास अपना बॉम्बार्डियर चैलेंजर विमान नहीं है। पहले से प्रशिक्षित वैकल्पिक पायलट उपलब्ध होने की भी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। ऐसी स्थिति में यदि अचानक पायलट की जरूरत पड़ती है तो सरकार को फिर किसी दूसरे पायलट या किराए के विमान पर निर्भर होना पड़ सकता है।
बड़ी चिंता- कंपनी से करार, पायलट पर खर्चा
एमपी सरकार पायलट पर करोड़ों रुपए खर्च करेगी। पहले ट्रेनिंग पर 75 लाख खर्च होंगे, फिर उड़ान के लिए कुल 175 घंटे निर्धारित हैं। प्राइवेट ऑपरेटर के हिसाब से प्रति घंटा किराया 8 लाख रुपये मानें तो 175 घंटे के लिए यह लगभग 14 करोड़ रुपए बनते हैं। अब बड़ा सवाल ये है कि पांच साल के लिए सरकार का करार आउटसोर्स कंपनी से हुआ है, पायलट से नहीं। ऐसे में सरकारी खर्चे पर ट्रेनिंग और अनुभव लेने के बाद भी पायलट पांच साल तक रुकेगा, इसकी कोई ग्यारंटी नहीं है।
विभाग ने क्या कहा?
इस मामले में विमानन विभाग के अपर मुख्य सचिव आईएएस संजय शुक्ला ने कहा कि उन्हें इस संबंध में जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि आपने मामला हमारे संज्ञान में लाया है, हम इसे दिखवाते हैं। द सूत्र ने उनसे इस मामले से जुड़े सभी सवालों के जवाब मांगे थे, लेकिन विभाग की ओर से विस्तृत जवाब नहीं मिला है।
चैलेंजर 3500 की खासियतें
यह सुपर-मिड साइज बिजनेस जेट है। इसकी नॉन-स्टॉप रेंज छह हजार 297 किलोमीटर है। इससे भोपाल से जापान के टोक्यो तक सीधी उड़ान संभव होगी। दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई, कोच्चि और गुवाहाटी तक भी बिना रीफ्यूलिंग उड़ान भरी जा सकेगी।
विमान में बॉम्बार्डियर की पेटेंटेड नुआज सीटें लगी हैं। इन्हें बिजनेस जेट श्रेणी की सबसे आरामदायक सीटों में गिना जाता है। यात्री आवाज से लाइट, तापमान और एंटरटेनमेंट सिस्टम नियंत्रित कर सकेंगे।
साथ ही साउंड इंसुलेशन के कारण केबिन में बाहरी शोर बेहद कम महसूस होगा। हर यात्री के लिए 4K डिस्प्ले, वायरलेस चार्जिंग और हाई-स्पीड इंटरनेट उपलब्ध होगा।
केबिन की ऊंचाई 6 फीट से अधिक है। इसमें छोटा किचन और निजी शौचालय भी है। कॉन्फिगरेशन के अनुसार 8 से 10 यात्री बैठ सकते हैं, अधिकतम सीमा 9-11 तक है। विमान में दो इंजन, 8 यात्री सीटें और 2 केबिन क्रू सीटें हैं।
इसकी अधिकतम गति 870 किमी/घंटा यानी Mach 0.83 है। यह 45 हजार फीट तक उड़ान भर सकता है, जिससे टर्बुलेंस का असर कम होता है।
कहां उतर सकेगा जेट
इस जेट को उतरने के लिए कम से कम पांच हजार 500 फीट लंबे रनवे की जरूरत होगी। इसलिए यह प्रदेश की सभी हवाई पट्टियों पर संचालित नहीं हो सकेगा।
भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर और खजुराहो के प्रमुख एयरपोर्ट पर यह उतर सकेगा। इसके अलावा दतिया, सिवनी, मंदसौर, नीमच, छिंदवाड़ा, रीवा, सतना और मंडला की हवाई पट्टियों पर भी संचालन संभव होगा।
वहीं उज्जैन, गुना, खरगोन, नागदा, रतलाम, खंडवा, सागर, सीधी, मैहर और टेकनपुर की हवाई पट्टियों पर रनवे की लंबाई पर्याप्त न होने के कारण यह विमान नहीं उतर सकेगा।
पुराने विमान से तुलना
पुराना विमान बी-200जीटी टर्बोप्रॉप श्रेणी का था। इसकी अधिकतम गति 570 किमी/घंटा और रेंज तीन हजार 300 से तीन हजार 500 किलोमीटर थी। इसमें 7 से 9 यात्री बैठ सकते थे और यह 35 हजार फीट तक उड़ान भर सकता था।
नया चैलेंजर 3500 लगभग 50 प्रतिशत तेज है। इसकी रेंज भी लगभग दोगुनी है। इसका केबिन बड़ा, शांत और वॉयस-कंट्रोल वाला है। यह देश के अधिकांश शहरों और कई विदेशी गंतव्यों तक नॉन-स्टॉप उड़ान भर सकता है।
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