MP में अफसरों ने पद को बनाया काली कमाई का अड्डा! 1063 केस दर्ज, सजा सिर्फ 7 को
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्य प्रदेश में लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू ने कई अफसरों पर छापे मारे।
- जांच में अफसरों के पास आय से कई गुना ज्यादा संपत्ति मिली।
- भ्रष्टाचार के चार अलग-अलग तरीके सामने आए हैं।
- 2022 से अब तक लोकायुक्त में 1063 केस दर्ज हुए हैं।
- इनमें से सिर्फ 7 मामलों में आरोपियों को सजा मिली है।
चार अफसर, चार पैटर्न
मध्य प्रदेश में लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू (Economic Offences Wing) ने हाल ही में कई अफसरों पर छापे मारे। अलग-अलग विभागों के अधिकारी जांच के घेरे में आए।
जांच में कई अफसरों के पास आय से कई गुना ज्यादा संपत्ति मिली। कहीं करोड़ों की जमीन मिली तो कहीं नकदी और सोना-चांदी।
पड़ताल में भ्रष्टाचार के चार अलग-अलग तरीके सामने आए हैं। हर मामले में एक बात समान थी। अफसरों ने अपने पद का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए किया।
सवाल यह भी उठता है कि इतने लंबे समय तक विभागीय निगरानी तंत्र को इसकी भनक क्यों नहीं लगी। विधानसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक 2022 से अब तक लोकायुक्त ने 1063 मामले दर्ज किए हैं। इस दौरान 1379 अफसर जांच के दायरे में आए।
वहीं, इनमें से सिर्फ 7 मामलों में आरोप साबित हो सके। यानी सजा की दर सिर्फ 0.65 प्रतिशत रही। जानें भ्रष्टाचार रोकने वाली व्यवस्था में कहां खामियां हैं।
केस-1: बिजली का खेल
पहला मामला बिजली विभाग से जुड़ा है। यहां अधीक्षण यंत्री (SE - Superintending Engineer) शिवराम सोमिल के खिलाफ कार्रवाई हुई। वे मप्र पश्चिम क्षेत्र बिजली वितरण कंपनी में तैनात थे।
21 जुलाई को लोकायुक्त ने सोमिल के इंदौर, पीथमपुर और धार समेत नौ ठिकानों पर छापे मारे। सोमिल की 33 साल की नौकरी में वैध आय करीब दो करोड़ रुपए होनी चाहिए थी।
लेकिन जांच में उनकी कुल संपत्ति करीब 17 करोड़ रुपए मिली। यह अनुमानित आय से 258 प्रतिशत ज्यादा बताई गई। घर से चार किलो चांदी और 300 ग्राम सोना बरामद हुआ। इसके अलावा तीन लाख रुपए नकद भी मिले।
सिलिकॉन सिटी में उनका 1.20 करोड़ रुपए का तीन मंजिला मकान मिला। पीथमपुर में बेटे के नाम एक फैक्टरी भी सामने आई। बहू और रिश्तेदारों के नाम पर 'कर्नश पावरजोन' कंपनी से जुड़े दो औद्योगिक प्लांट भी मिले।
आरोप है कि तकनीकी विभाग का प्रमुख होने के कारण सोमिल के पास टेंडर की निगरानी की जिम्मेदारी थी। कहा जा रहा है कि इस पद का इस्तेमाल पसंदीदा फर्मों को फायदा पहुंचाने में हुआ। बिजली लाइन और ट्रांसफॉर्मर जैसे कामों में गुणवत्ता से समझौते के आरोप भी हैं। सूत्रों का कहना है कि कमीशन छिपाने के लिए रिश्तेदारों के नाम पर डमी कंपनियां बनाई गईं। इन कंपनियों को सीधे वर्क ऑर्डर दिए जाते थे।
केस-2: अस्पताल में घोटाला
दूसरा मामला इंदौर के एमवाय हॉस्पिटल से जुड़ा है। यहां फार्मासिस्ट राकेश गोरखे के घर पर कार्रवाई हुई। 5 अगस्त को ईओडब्ल्यू ने उनके घर छापा मारा।
गोरखे 2007 में भर्ती हुए थे। साल 2015 में उनका वेतन 18 हजार 711 रुपए था। 2025 में यह बढ़कर 54 हजार 664 रुपए हो गया।
उनकी पत्नी कीर्ति गोरखे एक दंत चिकित्सालय में लाइब्रेरियन हैं। उनका वेतन 42 हजार 402 रुपए है। जांच अवधि में दोनों की कुल वैध आय एक करोड़ 11 लाख रुपए के करीब आंकी गई। लेकिन उनके पास दो करोड़ 13 लाख रुपए से ज्यादा की चल-अचल संपत्ति मिली। यह वैध आय से 108 प्रतिशत ज्यादा है।
आरोप है कि सरकारी अस्पतालों में बड़ी दवा खरीद केंद्रीकृत तरीके से होती है। लेकिन इमरजेंसी के लिए स्थानीय स्तर पर भी खरीद होती है। कहा जा रहा है कि गोरखे ने इसी व्यवस्था का फायदा उठाया। स्थानीय फर्मों से मिलीभगत कर कागजों पर दवाइयों की आपूर्ति दिखाई गई। इसके आधार पर बिल तैयार किए गए।
जांच में गोरखे से जुड़ी पांच से छह डमी फर्में भी सामने आई हैं। आरोप है कि इन्हीं फर्मों के जरिए ऑर्डर और बिल की पूरी प्रक्रिया नियंत्रित की जाती थी।
केस-3: निगम में टैक्स चोरी
तीसरा मामला इंदौर नगर निगम से जुड़ा है। यहां सहायक राजस्व अधिकारी (ARO - Assistant Revenue Officer) जितेंद्र कुमार पांडेय पर कार्रवाई हुई। 14 अगस्त को लोकायुक्त ने उनके ठिकानों पर छापा मारा।
जांच में पांडेय के पास चार करोड़ 59 लाख रुपए की अनुपातहीन संपत्ति मिली। उनकी वैध आय करीब 80 लाख रुपए आंकी गई। यानी संपत्ति वैध आय से 474.84 प्रतिशत ज्यादा निकली। कार्रवाई के बाद निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल ने उन्हें निलंबित कर दिया।
पत्नी भावना पांडेय के नाम पर आनंद नगर एक्सटेंशन में एक बड़ी इमारत मिली। इसकी निर्माण लागत करीब एक करोड़ 20 लाख रुपए बताई गई। चितावद के गुलमोहर बगीचा क्षेत्र में भी पत्नी के नाम पर एक इमारत मिली। वहां हॉस्टल चलाया जा रहा था।
पांडेय के पास संपत्तियों के रिकॉर्ड और टैक्स वसूली की जिम्मेदारी थी। आरोप है कि नोटरी के आधार पर ही नामांतरण कर दिए जाते थे। इससे बिना रजिस्ट्री वाली संपत्तियों पर भी लोन लेना आसान हो जाता था। इसका सीधा नुकसान सरकार को स्टांप शुल्क के रूप में होता था।
कई जगह मौके पर मकान या कमर्शियल बिल्डिंग होने के बावजूद रिकॉर्ड में उसे खाली प्लॉट दिखाया गया। इससे बहुत कम टैक्स वसूला गया। बहुमंजिला इमारतों में 20 से 40 किराएदार रहने के बावजूद एक ही टैक्स लगाने का आरोप भी है। बाकी रकम कथित तौर पर रिश्वत के रूप में ली जाती थी।
केस-4: आंगनवाड़ी में सेंध
चौथा मामला महिला एवं बाल विकास विभाग से जुड़ा है। यहां संयुक्त संचालक लक्ष्मीनारायण कंडवाल पर कार्रवाई हुई। 10 जून को लोकायुक्त ने उनके ठिकानों पर छापा मारा।
जांच में कंडवाल के पास करीब 9.5 करोड़ रुपए की संपत्ति मिली। इसमें पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र के पास 12 प्लॉट शामिल हैं। इंदौर में एक कमर्शियल प्लॉट भी मिला। उनके घर में हाईटेक जिम और डिपार्टमेंटल स्टोर भी चल रहा था। शुरुआती जांच में यह संपत्ति उनकी वैध आय से 241 प्रतिशत ज्यादा पाई गई।
आरोप है कि कुपोषण और आंगनवाड़ी मेंटेनेंस के बजट में गड़बड़ी की गई। बच्चों को मिलने वाले मिड-डे मील की गुणवत्ता को भी नजरअंदाज किए जाने के आरोप हैं। संभाग स्तर के अधिकारी होने के कारण कई जिलों के अधिकारी उनके अधीन काम करते थे।
कंडवाल के पास सीआर (Confidential Report) लिखने और ट्रांसफर-पोस्टिंग में भूमिका थी। आरोप है कि जिला स्तर की वित्तीय गड़बड़ियों को दबाने के बदले अधिकारियों से रकम ली जाती थी।
एक्सपर्ट की राय
इन चारों मामलों ने विभागीय निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं। लोकायुक्त के जांच अधिकारी आशुतोष मिठास कहते हैं कि इन अफसरों की संपत्ति के स्रोत जांच का विषय हैं। उनका कहना है कि सभी मामलों में जांच जारी है और सबूत मिलने पर उचित कार्रवाई होगी।
रिटायर्ड आईएएस डॉ. मोहन गुप्ता का मानना है कि भ्रष्टाचार करने वालों में कानून का डर जरूरी है। वे कहते हैं कि मामलों में जल्द सजा का प्रावधान होना चाहिए। वे उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की अपराध नियंत्रण नीति का उदाहरण देते हैं।
डॉ. गुप्ता कहते हैं कि वे नीति सही है या गलत, इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहते। लेकिन उनका कहना है कि अपराधियों में कार्रवाई का डर साफ दिखता है। उनके मुताबिक भ्रष्टाचार के मामलों में केस दर्ज होने के बाद लंबे समय तक मुकदमे नहीं चलने चाहिए।
उनका कहना है कि अगर दोषी अफसरों को सिस्टम से बाहर करने जैसी सख्त कार्रवाई हो, तो इससे दूसरों में भी कानून का डर पैदा होगा। जल्द सजा मिलने से भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी।
ईओडब्ल्यू के आंकड़े
विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने भ्रष्टाचार से जुड़े आंकड़े पेश किए। 2020 से जनवरी 2026 तक ईओडब्ल्यू को कुल 19 हजार 775 शिकायतें मिलीं। यानी हर साल औसतन तीन हजार से ज्यादा शिकायतें आईं।
जनवरी 2026 में अकेले 437 शिकायतें दर्ज हुईं। लेकिन करीब बीस हजार शिकायतों में से सिर्फ दो हजार 624 शिकायतें औपचारिक रूप से दर्ज हो सकीं। यह कुल शिकायतों का करीब 14 प्रतिशत है।
इससे भी चौंकाने वाला आंकड़ा एफआईआर का है। सिर्फ 566 मामलों में ही एफआईआर दर्ज हुई। यह कुल शिकायतों का महज 2.8 प्रतिशत है।
लोकायुक्त: सिर्फ 7 को सजा
लोकायुक्त के आंकड़े भी कुछ ऐसी ही तस्वीर दिखाते हैं। विधानसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक 2022-23 से अब तक लोकायुक्त को एक हजार 884 शिकायतें मिलीं। इनमें से एक हजार 63 आपराधिक मामले दर्ज किए गए।
इन मामलों में से 393 की जांच पूरी हो चुकी है। लेकिन 134 मामले अब भी अभियोजन की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं। सिर्फ 39 मामलों में प्रारंभिक अभियोजन कार्रवाई शुरू हो सकी है।
208 मामलों में चालान पेश हो चुका है। लेकिन दोषसिद्धि यानी सजा सिर्फ सात मामलों में हुई है। यह आंकड़ा साफ बताता है कि जांच से सजा तक का रास्ता कितना लंबा और कमजोर है।
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