दमोह फर्जी डॉक्टर कांड के बाद MP में संविदा डॉक्टरों की डिग्री जांच शुरू
समझें क्या है पूरा मामला...
- दमोह में फर्जी डॉक्टरों के पकड़ाने के बाद प्रदेशभर में जांच शुरू हो गई है।
- MP में दो हजार से ज्यादा संविदा डॉक्टरों की डिग्री खंगाली जा रही है।
- जांच में अब तक 9 और डॉक्टरों के रजिस्ट्रेशन फर्जी निकले हैं।
- इन सभी ने नकली दस्तावेजों के दम पर सरकारी नौकरी पाई थी।
- फर्जी कागजात मिलने पर एफआईआर (FIR) और नौकरी जाना तय है।
दमोह कांड से हिला स्वास्थ्य महकमा
मध्य प्रदेश में फर्जी डॉक्टरों का मामला अब बड़ा रूप लेता जा रहा है। दमोह के संजीवनी क्लीनिक में तीन नकली डॉक्टरों का पर्दाफाश हुआ था। उस खुलासे के बाद सरकार हरकत में आई है। पूरे प्रदेश में संविदा पर काम कर रहे दो हजार से अधिक डॉक्टरों की डिग्री और मेडिकल रजिस्ट्रेशन खंगाले जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग ने अपने सभी संस्थानों में तैनात संविदा डॉक्टरों के शैक्षणिक और सेवा रिकॉर्ड दोबारा जांचने का आदेश दे दिया है।
2000 डॉक्टरों की जांच
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM - National Health Mission) ने इस जांच की अगुआई की है। जांच का मकसद साफ है: यह सुनिश्चित करना कि सरकारी स्वास्थ्य संस्थाओं में काम कर रहे सभी डॉक्टर असली डिग्रीधारी हों और उनका मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण वैध हो। इसके लिए सभी संविदा डॉक्टरों का रिकॉर्ड नए सिरे से खंगाला जा रहा है।
विभागीय सूत्रों के मुताबिक जांच में यह देखा जा रहा है कि संबंधित डॉक्टर ने किस मेडिकल कॉलेज से डिग्री ली, पढ़ाई कब पूरी हुई है। साथ ही, मध्य प्रदेश मेडिकल काउंसिल (MPMC - Madhya Pradesh Medical Council) में रजिस्ट्रेशन कब हुआ और अभी किस सरकारी संस्था में तैनात है।
9 और फर्जी डॉक्टर पकड़ाए
इसी जांच के दौरान 9 और डॉक्टरों की पोल खुली है। एनएचएम के वरिष्ठ संयुक्त संचालक डॉ. राकेश बोहरे ने इनकी शिकायत पुलिस में दर्ज कराई थी। एमपीएमसी के वेरिफिकेशन में इन सभी के सर्टिफिकेट नकली पाए गए थे।
पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS - Bharatiya Nyaya Sanhita) की धाराओं के तहत धोखाधड़ी और जालसाजी का मुकदमा दर्ज कर लिया है। इन डॉक्टरों में डॉ. आकाश चंदेलकर, डॉ. मोहर सिंह, डॉ. कमल किशोर, डॉ. मोनिका, डॉ. अरुण कुमार, डॉ. शांति साहू, डॉ. सोनम यादव, डॉ. बुद्धिमान और डॉ. पवन सोलंकी शामिल हैं। सभी ने फर्जी रजिस्ट्रेशन नंबर के सहारे सरकारी नौकरी पाई थी और सरकारी वेतन भी उठाते रहे।
दस्तावेज गड़बड़ी पर होगी FIR
विभागीय अधिकारियों ने साफ कह दिया है कि जांच में किसी भी डॉक्टर की डिग्री, रजिस्ट्रेशन या अन्य कागजात नकली निकले तो उस पर तुरंत एफआईआर होगी। इसके साथ ही उसकी सेवाएं भी समाप्त कर दी जाएंगी। यानी कोई भी राहत नहीं मिलेगी।
इस घोषणा के बाद उन तमाम संविदा डॉक्टरों में हड़कंप है जिनके दस्तावेज संदिग्ध हो सकते हैं। अब हर किसी को अपनी असली डिग्री और रजिस्ट्रेशन साबित करनी होगी।
मरीजों की जान दांव पर
यह मामला सिर्फ दस्तावेजों की धोखाधड़ी तक सीमित नहीं है। सरकारी अस्पतालों और क्लीनिक में जाने वाले आम मरीज, खासकर गांवों के लोग, यही मानते हैं कि सामने बैठा डॉक्टर पढ़ा-लिखा और काबिल है।
जब कोई बिना असली डिग्री के इलाज करता है, तो गलत दवा, गलत इंजेक्शन या गलत सर्जरी से जान भी जा सकती है। दमोह कांड यह सवाल उठाता है कि यह फर्जीवाड़ा कितने सालों से चल रहा था और इस दौरान कितने मरीजों ने झेला होगा।
FAQ
- दमोह फर्जी डॉक्टर कांड क्या है?
दमोह के संजीवनी क्लीनिक में तीन डॉक्टर बिना असली डिग्री और वैध रजिस्ट्रेशन के सरकारी नौकरी कर रहे थे। जब इनका भंडाफोड़ हुआ, तो सरकार ने पूरे मध्य प्रदेश में संविदा पर काम कर रहे 2 हजार से ज्यादा डॉक्टरों की जांच का आदेश दे दिया। एनएचएम ने यह जांच शुरू की और एमपीएमसी से सभी के रजिस्ट्रेशन का सत्यापन कराया जा रहा है। - MP में संविदा डॉक्टरों की जांच में क्या देखा जा रहा है?
जांच में मुख्य रूप से चार बातें जांची जा रही हैं: डॉक्टर ने किस मेडिकल कॉलेज से डिग्री ली, पढ़ाई किस साल पूरी हुई, मध्य प्रदेश मेडिकल काउंसिल में रजिस्ट्रेशन कब हुआ और अभी वे किस सरकारी संस्था में तैनात हैं। अगर किसी भी दस्तावेज में गड़बड़ी मिली तो तुरंत एफआईआर होगी और नौकरी भी जाएगी।
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