एमपी में पर्यावरण मंजूरी को लेकर विवाद: सिया ने SC का हवाला देकर ACS का आदेश लौटाया

Amresh Kushwaha | Apr 28, 2026, 10:25 IST
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मध्यप्रदेश में 237 डीम्ड पर्यावरण मंजूरियों को लेकर सिया और शासन के बीच टकराव गहरा गया है। एसीएस के आदेश को दरकिनार कर सिया ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक फाइलों को रोक दिया है।

मध्यप्रदेश में खनन क्षेत्र में पर्यावरण मंजूरी को लेकर सरकार और अथॉरिटी के बीच पावर वॉर छिड़ गई है। राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण यानी सिया (SEIAA) ने राज्य शासन के आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।



मामला 237 विवादित डीम्ड मंजूरियों से जुड़ा है। इस पर सिया ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आता, वे कदम आगे नहीं बढ़ाएंगे।



एसीएस के आदेश पर सिया का ब्रेक

विवाद की शुरुआत तब हुई जब पर्यावरण विभाग के अपर मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल ने एक आदेश जारी किया। उन्होंने हाल ही में एक पत्र लिखकर निर्देश दिए थे कि 28 मई 2025 को जारी की गई डीम्ड मंजूरियां ईआईए नोटिफिकेशन-2006 (EIA Notification-2006) के तहत पूरी तरह वैध हैं।



एसीएस का तर्क था कि चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने इन पर कोई स्टे यानी स्थगन नहीं दिया है, इसलिए विभाग को इन्हें सामान्य प्रक्रिया की तरह आगे बढ़ाना चाहिए। वहीं, सिया ने इस तर्क को मानने से साफ इनकार कर दिया है।



बैठक में उठा मंदसौर की खदान का मामला

टकराव की यह स्थिति 17 अप्रैल को हुई सिया की 946वीं बैठक में खुलकर सामने आई। इस बैठक में मंदसौर जिले की नारायणगढ़ स्टोन क्वारी का मामला चर्चा के लिए आया था। राज्य स्तरीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (SEAC - सिएक) ने डीम्ड टर्म ऑफ रेफरेंस (ToR) के आधार पर इस खदान को पर्यावरण मंजूरी देने की सिफारिश की थी। हालांकि, सिया ने इस सिफारिश को सिरे से खारिज कर दिया और फाइल वापस सिएक को भेज दी।



सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी की चौखट पर मामला

सिया ने अपनी सख्ती के पीछे कानून और प्रक्रिया का हवाला दिया है। अथॉरिटी का कहना है कि ये 237 डीम्ड मंजूरियां पहले से ही सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी (National Green Tribunal) में विचाराधीन हैं।



ऐसी स्थिति में, किसी भी फाइल को आगे बढ़ाना कानूनी रूप से जोखिम भरा हो सकता है। सिया ने स्पष्ट संदेश दिया है कि माननीय न्यायालय का अंतिम फैसला आने तक वह इन विवादित प्रकरणों पर कोई विचार नहीं करेगी।



चेयरमैन की दो टूक: गलत है यह कदम

दूसरी ओर, सिया चेयरमैन शिवनारायण सिंह चौहान एसीएस के आदेश को गलत कदम बताया है। सिया चेयरमैन एसएस चौहान ने कड़े शब्दों में कहा कि यह आदेश वैधानिक रूप से गलत है। चेयरमैन का तर्क है कि जब मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में लंबित है, तो ऐसे निर्देश देना नियमों की अनदेखी है।



क्या है 237 डीम्ड मंजूरियों का सच?

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ था जब पर्यावरण विभाग के तत्कालीन अधिकारियों ने ईआईए नोटिफिकेशन 2006 (EIA Notification 2006) की कंडिका 8 (iii) का हवाला देकर 237 परियोजनाओं को डीम्ड मंजूरी दे दी थी।



नियम कहता है कि यदि सिया 45 दिनों के भीतर आवेदन पर निर्णय नहीं लेता, तो उसे स्वतः मंजूर मान लिया जाता है। लेकिन चेयरमैन चौहान ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर गंभीर आरोप लगाए थे कि अधिकारियों ने जानबूझकर बैठकें नहीं बुलाईं, ताकि फाइलों को पेंडिंग (Pending) रखकर माइनिंग लॉबी को फायदा पहुंचाया जा सके।



एनजीटी की फटकार और माइनिंग लॉबी का कनेक्शन

इस मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की भोपाल बेंच पहले ही कड़ा रुख अपना चुकी है। 3 फरवरी को एनजीटी ने पन्ना जिले की रेत खदानों से जुड़ी नौ डीम्ड मंजूरियों को शून्य (Null and Void) घोषित कर दिया था।



ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में तीखी टिप्पणी करते हुए इसे माइनिंग लॉबी (Mining Lobby) को लाभ पहुंचाने का एक क्लासिक उदाहरण बताया था। एनजीटी का मानना है कि बिना किसी सामूहिक निर्णय और तकनीकी जांच (Appraisal) के ऐसी मंजूरियां देना पर्यावरण नियमों का खुला उल्लंघन है।



जांच के घेरे में अफसर, दिल्ली तक पहुंची आंच

फिलहाल, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) ने भी इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी (Fact Finding Committee) का गठन किया है जो इसकी बारीकी से जांच कर रही है।



एक तरफ जहां सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है, वहीं दूसरी तरफ विभाग के नए आदेश ने आग में घी डालने का काम किया है। अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार इस प्रशासनिक टकराव को कैसे सुलझाती है।



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