MP आबकारी विभाग में फर्जी FDR का खेल,डिप्टी सीएम के पूर्व ओएसडी दीपम रायचुरा सस्पेंड, जांच में सामने आईं कई गड़बड़ियां
आबकारी आयुक्त दीपक सक्सेना ने 12 अक्टूबर 2026 को निलंबन आदेश जारी किया। आदेश के मुताबिक जांच में सात तरह की अनियमितताएं प्रथम दृष्टया सामने आई हैं। यह मामला भोपाल के पी एंड टी चौराहा शराब समूह से जुड़ा है।
सबसे बड़ा सवाल करीब 2.75 करोड़ रुपए की बैंक एफडीआर को लेकर है। जांच में संबंधित बैंक ने इस एफडीआर को जारी करने से इनकार किया है। विभाग ने मामले में सरकारी राजस्व की सुरक्षा प्रभावित होने की बात कही है।
खबर सामने आई तो विभाग ने शुरू की जांच
मामले की शुरुआत अक्टूबर 2026 में सामने आई कुछ मीडिया रिपोर्टों से हुई थी। मीडिया में इस मामले से जुड़ी खबरें प्रकाशित हुई। इन रिपोर्टों में आबकारी अधिकारी दीपम रायचुरा पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। आरोप था कि साल 2024-25 में फर्जी एफडीआर के जरिए ठेका स्वीकार किया गया। रिपोर्टों में रिश्वत लेकर ठेका स्वीकृत करने का आरोप भी लगाया गया था।
इन खबरों के बाद आबकारी विभाग ने मामले को गंभीरता से लिया। नौ अक्टूबर 2026 को दो सदस्यीय जांच दल बनाया गया। इस दल को पूरे मामले की जांच करने की जिम्मेदारी दी गई।
इधर इस जांच से पहले राज्य सरकार ने उन्हें डिप्टी सीएम जगदीश देवड़ा के ओएसडी के पद से भी हटा दिया था।
फर्जी FDR पर बैंक ने क्या बताया?
जांच में सबसे महत्वपूर्ण मामला 2 करोड़ 75 लाख रुपए से ज्यादा की एफडीआर का है। यह एफडीआर AU Small Finance Bank के नाम पर जमा दिखाई गई थी।
विभागीय फाइल में एफडीआर की तारीख 12 मई 2024 दर्ज थी। इसके सत्यापन की रिपोर्ट 20 मई 2024 की बताई गई थी।
जांच दल ने संबंधित बैंक से इस एफडीआर की दोबारा पुष्टि कराई। बैंक ने 12 अक्टूबर 2026 को अपने आधिकारिक लेटरहेड पर जवाब दिया। बैंक के अनुसार संबंधित ई-एफडीआर उसकी ओर से जारी नहीं की गई थी।
जांच में एफडीआर और उसके सत्यापन की रिपोर्ट फर्जी पाई गई। यह निष्कर्ष आबकारी विभाग के निलंबन आदेश में दर्ज किया गया है।
FDR सत्यापन में कैसे सामने आई गड़बड़ी?
जांच रिपोर्ट में सत्यापन की पूरी प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। रिकॉर्ड के अनुसार आबकारी उपनिरीक्षक वर्षा उईके को सत्यापन कराने का निर्देश दिया गया था।
वर्षा उईके ने जांच दल के सामने अपना बयान दर्ज कराया। उन्होंने बताया कि सत्यापन कराने संबंधी पत्र उन्हें मिला ही नहीं था। विभागीय फाइल में भी पत्र मिलने का कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं था।
जांच में बैंक को पत्र भेजे जाने का प्रमाण भी नहीं मिला। इसके बावजूद एफडीआर के सत्यापन की रिपोर्ट कार्यालय में स्वीकार कर ली गई। जांच में सामने आया कि सत्यापन रिपोर्ट लाइसेंसी जसवंत के ईमेल से आई थी। विभाग ने इसी रिपोर्ट को मान्य मानकर आगे की प्रक्रिया पूरी की।
आदेश के मुताबिक दीपम रायचुरा ने जरूरी तथ्यों को नजरअंदाज करके एफडीआर स्वीकार की।
बैंक की श्रेणी को लेकर भी उठे सवाल
जांच में सिर्फ एफडीआर के फर्जी होने की बात सामने नहीं आई। बैंक की श्रेणी को लेकर भी नियमों के उल्लंघन का मामला सामने आया। मध्यप्रदेश की आबकारी नीति में ठेका सुरक्षा राशि के लिए बैंक श्रेणियां निर्धारित थीं। जांच आदेश के अनुसार संबंधित बैंक उस समय अलग लघु वित्त बैंक श्रेणी में था।
इस कारण उसकी एफडीआर निर्धारित नियमों के तहत स्वीकार योग्य नहीं थी। जांच रिपोर्ट में इसे राजपत्र के प्रावधानों का उल्लंघन बताया गया है।
शराब ठेके की सुरक्षा राशि जमा करने में देरी
जांच में ठेके की सुरक्षा राशि जमा कराने से जुड़ी गड़बड़ी भी सामने आई। लाइसेंसी ने कुल निर्धारित सुरक्षा राशि का आधा हिस्सा नकद जमा किया था।
यह रकम 1 करोड़ 37 लाख 76 हजार 768 रुपए थी। बाकी आधी राशि तय समय तक जमा करना जरूरी था।
विभागीय आदेश में शेष राशि जमा करने की अंतिम तारीख 30 अप्रैल 2024 बताई गई। इसके बावजूद एफडीआर 12 मई 2024 की तारीख से जमा दिखाई गई। आदेश में इस सुरक्षा राशि को 22 दिन की देरी से जमा बताया गया है। देरी के बावजूद संबंधित नियमों के तहत कार्रवाई नहीं की गई।
जांच दल ने इसे आबकारी नियमों के उल्लंघन का मामला माना है।
शराब ठेके के ट्रांसफर में भी मिली गड़बड़ी
जांच में शराब ठेके को दूसरी फर्म के नाम ट्रांसफर करने की प्रक्रिया भी संदिग्ध मिली। यह मामला मेसर्स मां माइंस नाम की फर्म से जुड़ा हुआ है। दस जुलाई 2024 को इस फर्म के पक्ष में ट्रांसफर का आवेदन मिला था। भोपाल कलेक्टर ने 27 दिसंबर 2024 को ट्रांसफर आदेश जारी किया था।
जांच में सामने आया कि जरूरी पार्टनरशिप डीड पहले प्रस्तुत नहीं कराई गई थी। दस्तावेजों में विजय सिंह को फर्म का भागीदार बताया गया था। आबकारी पोर्टल पर उपलब्ध रिकॉर्ड में विजय सिंह का नाम भागीदार के रूप में नहीं था। जांच दल ने इस अंतर को गंभीर प्रक्रिया संबंधी गड़बड़ी माना।
76 लाख की बैंक गारंटी पर सवाल
मामले में 76 लाख रुपए की बैंक गारंटी भी जांच के घेरे में आई। यह गारंटी विजय सिंह के नाम से जमा कराई गई थी। गारंटी ICICI बैंक की भिलाई स्थित शाखा से संबंधित बताई गई है। विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार यह गारंटी 15 जुलाई 2024 को जमा हुई।
जांच में विजय सिंह का संबंधित फर्म से वैध भागीदारी संबंध दर्ज नहीं मिला। इसके बावजूद उनकी बैंक गारंटी को स्वीकार कर लिया गया। विभागीय निर्देशों के मुताबिक गारंटी संबंधित फर्म की ओर से जमा होनी चाहिए थी। जांच दल ने इसे भी नियमों का उल्लंघन माना।
आबकारी अधिकारी दीपम रायचुरा पर क्या कार्रवाई हुई?
जांच रिपोर्ट मिलने के बाद आबकारी आयुक्त दीपक सक्सेना ने निलंबन की कार्रवाई की। दीपम रायचुरा उस समय राज्य स्तरीय उड़नदस्ते में प्रभारी सहायक आबकारी आयुक्त थे।
विभाग ने मध्यप्रदेश सिविल सेवा नियम 1966 के नियम-9 के तहत कार्रवाई की। निलंबन आदेश 12 अक्टूबर 2026 से तत्काल प्रभावी किया गया। निलंबन अवधि में रायचुरा का मुख्यालय आबकारी आयुक्त कार्यालय ग्वालियर निर्धारित किया गया है। इस दौरान उन्हें नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता दिया जाएगा।
विभाग ने अपने आदेश में गंभीर लापरवाही और पद की जिम्मेदारी नहीं निभाने का उल्लेख किया है।
अब इस मामले में आगे क्या होगा?
निलंबन के बाद मामले में आगे की विभागीय कार्रवाई पर नजर रहेगी। जांच रिपोर्ट में कई दस्तावेजों और बैंक गारंटी पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
सबसे अहम सवाल सरकारी राजस्व की सुरक्षा और ठेका स्वीकृति की प्रक्रिया का है। यह भी देखना होगा कि अनियमितताओं में दूसरे लोगों की भूमिका सामने आती है या नहीं।
फिलहाल उपलब्ध आदेश में अन्य अधिकारियों के खिलाफ नई कार्रवाई का उल्लेख नहीं है। किसी आपराधिक मुकदमे या एफआईआर की पुष्टि भी इस आदेश से नहीं होती। इस पूरे मामले ने शराब ठेकों की जांच और बैंक गारंटी व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।
- आबकारी आयुक्त दीपक सक्सेना ने किस कारण से निलंबन आदेश जारी किया?
आबकारी आयुक्त दीपक सक्सेना ने जांच में सामने आई सात प्रकार की अनियमितताओं के चलते 12 अक्टूबर 2026 को निलंबन आदेश जारी किया। - जांच में 2.75 करोड़ रुपए की बैंक एफडीआर के बारे में क्या जानकारी सामने आई?
जांच में AU Small Finance Bank के नाम पर जमा दिखाई गई 2.75 करोड़ रुपए की एफडीआर को बैंक ने अपनी ओर से जारी करने से इंकार कर दिया, जिससे यह साबित हुआ कि एफडीआर और उसके सत्यापन की रिपोर्ट फर्जी थीं। - इस मामले में आगे की कार्रवाई क्या होगी?
निलंबन के बाद विभागीय कार्रवाई पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा, जिसमें अवैधताओं में अन्य अधिकारियों की भूमिका की जांच भी शामिल हो सकती है। वर्तमान में अन्य अधिकारियों के खिलाफ कोई नई कार्रवाई नहीं की गई है।