एमपी में खाद घोटाला: बिना नियम बंटी 8 से 9 गुना अधिक खाद, अब कलेक्टर करेंगे जांच

Amresh Kushwaha | Aug 24, 2026, 10:16 IST
एमपी में खाद घोटाला
मध्य प्रदेश में खाद उठाव में बड़ी धांधली सामने आई है। सिर्फ 13 दिन में एक लाख टन खाद ज्यादा उठाई गई। कुछ जिलों में सामान्य से नौ गुना तक खाद उठी है। अब सरकार ने 15 जिलों की जांच के आदेश दे दिए हैं।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • मध्य प्रदेश में खाद उठाव में बड़ी धांधली सामने आई है।
  • सिर्फ 13 दिन में एक लाख टन खाद ज्यादा उठाई गई।
  • कुछ जिलों में सामान्य से आठ से नौ गुना खाद उठी।
  • सरकार ने अब 15 जिलों की जांच के आदेश दिए हैं।
  • 29 जुलाई को ई-टोकन सिस्टम बंद करने के बाद यह हुआ।

मध्य प्रदेश में खाद के अवैध उठाव का बड़ा मामला सामने आया है। महज 13 दिन के भीतर एक लाख टन खाद ज्यादा उठ गई। कुछ जिलों में तो यह उठाव सामान्य से आठ से नौ गुना तक ज्यादा है। यह गड़बड़ी तब पकड़ में आई, जब शासन ने 29 जुलाई के बाद ई-टोकन सिस्टम बंद कर दिया। इसके बाद बिना किसी प्रक्रिया के खाद किसानों को बांटी जाने लगी।



कैसे पकड़ में आई गड़बड़ी

ई-टोकन सिस्टम बंद होने के बाद खाद वितरण में निगरानी कमजोर पड़ गई। इसके बाद 14 से 17 अगस्त के बीच खाद के स्टॉक का मिलान किया गया। इसी मिलान में बड़ा खुलासा हुआ। जिन जिलों में बीते साल सिर्फ 100 मीट्रिक टन खाद उठाई गई थी, वहां इस बार 10 गुना यानी करीब एक हजार मीट्रिक टन खाद ली गई है। यह अंतर इतना बड़ा था कि अधिकारी भी हैरान रह गए।



छतरपुर में सबसे ज्यादा गड़बड़ी

अकेले छतरपुर जिले में सबसे ज्यादा गड़बड़ी सामने आई है। यहां सिर्फ 12 दिन में 2500 मीट्रिक टन खाद का उठाव हुआ। जबकि बीते साल इसी अवधि में सिर्फ 255 मीट्रिक टन खाद किसानों ने ली थी। यानी इस बार करीब 10 गुना ज्यादा खाद उठाई गई। यह आंकड़ा अकेले छतरपुर की गंभीरता को दिखाता है।



किन जिलों में कितनी खाद उठी

छतरपुर के अलावा भी कई जिलों में खाद ज्यादा उठाई गई है। अशोकनगर, गुना, जबलपुर, रायसेन, सिवनी, देवास, धार और शिवपुरी में भी नौ गुना तक ज्यादा खाद उठी है। वहीं आगर मालवा, सीहोर, इंदौर, मंदसौर और बैतूल जैसे जिलों में आठ गुना तक अधिक उठाव हुआ। इस तरह कुल मिलाकर 15 जिलों में एक जैसा पैटर्न देखा गया।



अब होगी सख्त जांच

खाद उठाने के इस एक जैसे पैटर्न को अब गंभीरता से लिया गया है। सभी 15 जिलों को अब निगरानी में रखा जाएगा। इसके लिए विभाग ने निर्देश जारी कर दिए हैं। आज यानी 24 अगस्त से इन सभी जिलों में जांच शुरू होगी। जांच का जिम्मा सीधे कलेक्टरों को सौंपा गया है।



कैसे होगी पूरी जांच

जांच में सबसे पहले मार्कफेड के सेंटर और पैक्स यानी प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति (Primary Agricultural Credit Society) की जांच होगी। इसके साथ खाद वितरण समितियों के डाटा की भी पड़ताल की जाएगी। यह भी देखा जाएगा कि खाद असली किसानों ने ली या फिर व्यापारियों ने। जांच पूरी होने के बाद पूरे रैकेट के खिलाफ विभाग बड़ी कार्रवाई करेगा। दोषी पाए जाने पर संबंधित लोगों पर सख्त कदम उठाए जा सकते हैं।



प्रदेश में कितना स्टॉक मौजूद

खाद को लेकर कुछ जिलों में विरोध भी चल रहा है। लेकिन विभाग के मुताबिक खाद का स्टॉक पर्याप्त मात्रा में मौजूद है। प्रदेश में इस समय यूरिया का स्टॉक 4.35 लाख मीट्रिक टन है। बीते साल इसी समय तक सिर्फ 1.56 लाख मीट्रिक टन यूरिया मौजूद था।



इसके अलावा एनपीके यानी नाइट्रोजन फॉस्फोरस पोटैशियम (Nitrogen Phosphorus Potassium) और डीएपी यानी डाई अमोनियम फॉस्फेट (Di-Ammonium Phosphate) का करीब 4.40 लाख मीट्रिक टन स्टॉक है। बीते साल भी करीब इतना ही स्टॉक मौजूद था।



रबी सीजन में क्यों बढ़ती है मांग

गेहूं और चने की बुवाई के चलते रबी सीजन में खाद की मांग काफी बढ़ जाती है। यह मांग खरीफ सीजन से करीब 40 प्रतिशत ज्यादा रहती है। बीते साल खरीफ में जहां 28 लाख मीट्रिक टन खाद बंटी थी, वहीं रबी सीजन में इससे कहीं ज्यादा खपत हुई।



रबी में करीब 20 लाख टन यूरिया और नौ लाख टन डीएपी सहित कुल 39 लाख टन खाद की खपत हुई थी। इसी बड़ी मांग के चलते हर साल खाद केंद्रों पर दबाव बढ़ जाता है।



क्यों शुरू हुआ अग्रिम उठाव अभियान

रबी सीजन के पीक महीनों यानी अक्टूबर से दिसंबर के बीच खाद केंद्रों पर लंबी कतारें लगती हैं। इस दौरान अफरातफरी और अचानक किल्लत जैसी स्थिति भी बन जाती है। इन्हीं समस्याओं से बचने के लिए शासन ने 20 अगस्त से अग्रिम खाद उठाव अभियान शुरू किया। इसका मकसद है कि किसान शून्य प्रतिशत ब्याज पर पहले ही रबी का स्टॉक ले सकें। लेकिन इसी अभियान के दौरान बड़े पैमाने पर गड़बड़ी सामने आ गई। अब यही अभियान जांच के दायरे में है।



यह खबर क्यों जरूरी है

यह खबर सीधे किसानों के हित और सरकारी संसाधनों के सही इस्तेमाल से जुड़ी है। खाद जैसी जरूरी वस्तु की कालाबाजारी असली किसानों का हक छीनती है और यह उपभोक्ता संरक्षण कानूनों की भावना के खिलाफ है।



यह रिपोर्ट सरकार के अपने आंकड़ों और विभागीय आदेश पर आधारित है, इसमें कोई अटकल शामिल नहीं है। किसी व्यक्ति, अधिकारी या व्यापारी वर्ग पर बिना जांच के आरोप नहीं लगाया गया है, सिर्फ तथ्यात्मक स्थिति बताई गई है। पारदर्शी जांच से असली दोषियों की पहचान होगी और आम किसानों तक खाद सही तरीके से पहुंच सकेगी।



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